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जादूगर के जाल में पंफसा आलाकमान!

कांग्रेस अध्यक्ष चुनाव की तैयारियों के बीच मुख्यमंत्री पद को लेकर छिड़े घमासान की आंच गांधी परिवार तक भी पहुंच गई है। कहा जा रहा है कि अशोक गहलोत के प्रति जो मोह वर्षों से कायम था आज वही मोह उसके गले की फांस बनता दिखाई दे रहा है। इससे बाहर निकलने के लिए उसकी छटपटाहट देखते ही बनती है। ऐसे में सोनिया गांधी और राहुल गांधी के लिए यह स्थिति न निगलते बन रही और न उगलते। देखना होगा कि गांधी परिवार राजस्थान में फंसी नाव को कैसे पार करा पाता है

कांग्रेस में एक बार फिर तनाव जगह लेता दिख रहा है। इस बार वजह गांधी परिवार के करीबी माने जाने वाले अशोक गहलोत के नेतृत्व वाला राजस्थान बना है। कांग्रेस अध्यक्ष चुनाव की तैयारियों के बीच मुख्यमंत्री पद को लेकर छिड़े घमासान की आंच गांधी परिवार तक भी पहुंच गई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि गांधी परिवार का अशोक गहलोत के प्रति जो मोह वर्षों से कायम था, आज वही मोह उसके गले की फांस बनता दिखाई दे रहा है। इससे बाहर निकलने के लिए उसकी छटपटाहट देखते ही बनती है।

हालांकि यह पहली बार नहीं है, जब कांग्रेस में दो नेताओं के बीच तल्खी की खबर हो और कांग्रेस जैसी बड़ी पार्टी में यह आम बात भी है, लेकिन एक ओर जहां पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी जहां ‘भारत जोड़ो यात्रा’ पर हैं वहीं दूसरी तरफ बीते एक हफ्ते से राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का उत्तराधिकारी तय करने को लेकर मचे घमासान ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि कांग्रेस खुद ही अपने लिए राजनीतिक संकट पैदा करने का पर्याय बन गई है। बीते एक साल के दौरान पहले पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह और अब राजस्थान में अशोक गहलोत का उत्तराधिकारी तय करने में पार्टी हाईकमान की रणनीतिक चूक ने कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।

राजस्थान में सचिन पायलट से किया गया वायदा निभाने के प्रयास में कांग्रेस हाईकमान की साख दांव पर लग गई है और कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव प्रक्रिया के बीच पार्टी गहरे संकट में घिर गई है। दिलचस्प बात यह है कि पिछले साल नवजोत सिंह सिद्धू से वायदा निभाने के प्रयास में हाईकमान ने पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह को आनन-फानन में हटाया और यहां से कांग्रेस का जो सियासी ग्राफ लुढ़का उसने चुनाव में पार्टी का सफाया कर दिया।

राजनीतिक पंडितों का कहना है कि कांग्रेस नेतृत्व के इन दोनों फैसलों की सियासी पृष्ठभूमि से साफ है कि जमीनी राजनीतिक स्थिति का पूरी तरह से आकलन किए बिना बड़े बदलाव की पहल पार्टी के लिए घातक साबित हो रही है। इतना ही नहीं नई पीढ़ी के नेताओं को राज्यों का सिरमौर बनाने की हाईकमान के प्रयासों को पुराने धुरंधर और दिग्गज नेता सहजता से स्वीकार नहीं कर रहे हैं।

कांग्रेस की राष्ट्रीय राजनीति में सचिन पायलट की क्षमता और राजनीतिक लोकप्रियता पर किसी को संदेह नहीं है। लेकिन
राजस्थान में कांग्रेस के ढांचे की सियासी वास्तविकता यही है कि अशोक गहलोत के बिना वहां पत्ता भी नहीं हिलता। पार्टी के 108 में से करीब 90 से ज्यादा विधायकों का हाईकमान के फरमान को मानने से इनकार करना इसका साफ संदेश देते हैं कि कांग्रेस राष्ट्रीय और राज्यों की सियासत में कमजोर हुई स्थिति के बाद उसके बचे खुचे चुनिंदा क्षत्रप मजबूत हुए हैं और आंख मूंदकर हाईकमान का फैसला स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं।

गहलोत तो शुरुआत में राजस्थान की सियासत छोड़ने के लिए तैयार ही नहीं थे। सोनिया गांधी ने काफी प्रयास के बाद कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव लड़ने के लिए उन्हें राजी किया। लेकिन गहलोत किसी सूरत में राजस्थान की कमान अपने प्रतिद्वंद्वी विरोधी सचिन पायलट को देने के लिए तैयार नहीं है। यह जानते हुए भी कांग्रेस नेतृत्व ने पायलट को कमान सौंपने की त्वरित पहल कर दी।
हाईकमान की यह त्वरित पहल अकारण भी नहीं थी क्योंकि उसे मालूम था कि गहलोत के कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद पायलट का राजतिलक लगभग असंभव होगा।

इस आशंका को देखते हुए ही नेतृत्व ने अपना वायदा पूरा करने का जोखिम उठाया, लेकिन कांग्रेस की राजनीति में जादूगर कहे जाने वाले गहलोत और उनके समर्थक विधायकों ने हाईकमान के इस सियासी दांव को पढ़ लिया। राजस्थान में नेतृत्व परिवर्तन के लिए जिस तरह हाईकमान के सामने तीन शर्तें रखी गई हैं उससे साफ है कि गहलोत समर्थकों ने पायलट को सत्ता सौंपने के नेतृत्व के इरादे को फिलहाल नाकाम कर दिया है। विश्लेषकों का मानना है कि इस घटनाक्रम के बाद कांग्रेस के अंदरूनी सियासी समीकरण पर गहरा असर होगा और गहलोत के कांग्रेस अध्यक्ष बनने पर ही अब संशय गहरा गया है। यह भी साफ हो गया है कि चाहे पंजाब हो या राजस्थान राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा का अपने नेताओं से किया गया वायदा निभाने का प्रयास कांग्रेस के गले की फांस बना है। राहुल और प्रियंका गांधी ने राजस्थान कांग्रेस में वर्ष 2020 में हुई बगावत से सचिन पायलट को वापस लाते हुए उन्हें समय आने पर मुख्यमंत्री बनाने का वायदा किया था। इसी तरह का वायदा इन दोनों शीर्ष नेताओं ने सिद्धू से भी किया था।

राहुल गांधी के साथ सचिन पायलट (फाइल फोटो)

बीते सालों में कुछ प्रमुख राजनीतिक घटनाओं को देखा जाए तो कांग्रेस अपने राजनीतिक संकट के लिए बहुत हद तक खुद ही जिम्मेदार रही है। गोवा में 2017 के विधानसभा चुनाव में 17 सीटें जीतने के बावजूद हाईकमान से संवाद में देरी ने सूबे में पार्टी की लुटिया डूबो दी और भाजपा ने उसके जबड़े से सत्ता छीन ली। मणिपुर में दो-तीन सीटें बहुमत से कम रहने के बावजूद रणनीतिक प्रबंधन की कमजोरी ने उसे सत्ता से बेदखल कर दिया।

यही नहीं करीब ढाई साल पहले मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया की बगावत को कांग्रेस नहीं संभाल पाई और सूबे की सत्ता विधायकों के टूटने के साथ गंवा बैठी। अभी पिछले ही साल मेघालय में कांग्रेस के 13 विधायकों ने पूर्व सीएम मुकुल संगमा के नेतृत्व में पाला बदलकर तृणमूल कांग्रेस का दामन थाम लिया। इसी महीने गोवा में पार्टी के 11 में से आठ विधायक भाजपा में शामिल हो गए।

गौरतलब है कि इस पूरे घटनाक्रम के दौरान अशोक गहलोत हमेशा कांग्रेस को छोड़ने वाले नेताओं पर हमला करते दिखे। गुलाम नबी आजाद पर हाल ही में अटैक करते हुए उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने उनको सब कुछ दिया था, लेकिन फिर भी ऐसा कदम उठाना दुर्भाग्यपूर्ण है। गहलोत की छवि हमेशा पार्टी मैन और गांधी फैमिली के वफादार की रही। इंदिरा के दौर से अब तक वह परिवार के करीबी ही रहे और दूसरे नेताओं के मुकाबले राहुल गांधी और प्रियंका गांधी से भी बेहतर रिश्ते रखे। यही वजह थी कि सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने जब गैर-गांधी अध्यक्ष पर विचार किया तो पहला नाम अशोक गहलोत का ही आया। लेकिन सीएम पद के मोह में अशोक गहलोत ने जो 82 विधायकों के इस्तीफे वाला जो दांव चला है, उससे गांधी परिवार हैरान है। कहा जा रहा है कि अपने दूतों से न मिलने और अलग बैठक करने को सोनिया गांधी ने हाईकमान के अपमान और अनुशासनहीनता के तौर पर लिया है। ऐसे में अब यह सवाल है कि आखिर गांधी परिवार के पास अशोक गहलोत को लेकर क्या विकल्प है।

पहला विकल्प गांधी फैमिली के पास यह है कि वह अशोक गहलोत को अध्यक्ष बनाने का विचार टाल दे और उन्हें राज्य के विधानसभा चुनाव तक सीएम रहने दे। यदि पार्टी जीतती है तो बाद में फैसला लिया जाए और यदि हार मिलती है तो अशोक गहलोत के लिए यह आखिरी मौका खत्म होने जैसा होगा। इसके अलावा एक विकल्प यह भी है कि गहलोत को अध्यक्ष पद की रेस से बाहर किया जाए और हाईकमान दखल देकर पंजाब की तरह उनसे इस्तीफा ले ले। हालांकि ऐसा करने पर राजस्थान में भी पंजाब वाली कहानी हो सकती है। जो कैप्टन अमरिंदर के इस्तीफे के बाद हुई थी। ऐसे में सोनिया गांधी और राहुल गांधी के लिए यह स्थिति न निगलते बन रही और न उगलते बनने वाली हो गई है। देखना होगा कि गांधी परिवार राजस्थान में फंसी नाव को कैसे पार करा पाती है।

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