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भाजपा पर भारी रावत की गुगली

कैबिनेट मंत्री यशपाल आर्या और उनके विट्टाायक पुत्र संजीव का भाजपा छोड़ दोबारा कांग्रेस में शामिल होना राज्य की दलित आबादी को रिझाने का एक ऐसा कदम है जिसे परवान चढ़ा कांग्रेस महासचिव हरीश रावत ने 2017 में पूरी तरह भाजपा को शिफ्ट हो चुके 14 प्रतिशत दलित वोट बैंक को कांग्रेस के लिए साट्टाने का दांव चला है। भाजपा इस दांव से बौखला अब कांग्रेस के गढ़ में सेंधमारी का बड़ा एक्शन प्लान बनाने में जुट गई हैं

कुछ दिनों पूर्व दो निर्दलीय और एक कांग्रेसी विधायक की पार्टी में इन्ट्री करा उत्तराखण्ड में भाजपा कांग्रेस को डूबता हुआ जहाज कह पुकारने लगी थी। भाजपा का लक्ष्य था नेतृत्व के प्रश्न पर बुरी तरह खेमेबाजी की शिकार उत्तराखण्ड कांग्रेस में तोड़फोड़ कर अपनी डबल इंजन की सरकार के प्रति जनता के आक्रोश को ठंडा करना। उसकी यह राजनीति अभी परवान चढ़ने लगी ही थी कि पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने एक ऐसी गुगली फैंक डाली जिससे पूरा परिदृश्य बदल गया और
भाजपा बैकफुट पर आ खड़ी हुई है। रावत ने राज्य सरकार में कैबिनेट मंत्री यशपाल आर्या और उनके विधायक बेटे संजीव की कांग्रेस में रिइन्ट्री करा 18 प्रतिशत दलित वोट बैंक को साधने की गुगली फैंकी है। 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को 47 प्रतिशत वोट मिला जिसके चलते उसे 57 सीटें मिली थी। कांग्रेस के पास 33 ़8 प्रतिशत वोट और मात्र 11 सीटें आईं। बसपा इन चुनावों में शून्य पर रही। 2002 में बसपा का वोट प्रतिशत 10 ़93 प्रतिशत था। तब उसे सात सीटों पर जीत हासिल हुई थी। 2012 के चुनाव में बसपा का वोट प्रतिशत बढ़कर 12 ़19 प्रतिशत पहुंच गया। खाते में आईं 03 सीटें। 2017 में यह वोट शेयर मात्र 7 प्रतिशत रह गया और उसका एक भी कैंडिडेट विधानसभा नहीं पहुंच पाया। हरीश रावत की निगाहें इसी वोट प्रतिशत पर है जो 2017 में भाजपा की तरफ माइग्रेट कर गया था। उत्तराखण्ड की राजनीति में हमेशा से ही यशपाल आर्या हरीश रावत के विरोधी गुट का हिस्सा रहे। स्व ़ एनडी तिवारी के शार्गिद यशपाल की कांग्रेस में रिइन्ट्री कराना रावत का ऐसा मास्टर स्ट्रोक है जिसके सहारे वे 2022 का मैच जीतने की तरफ बढ़त बनाने में सफल होते नजर आने लगे हैं। कहा जा रहा है कि 2022 का कप्तान बनने के लिए हरीश रावत हर दांव आजमाना चाहते है। जिस तरह से उनकी ही पार्टी के नेता उनके सीएम चेहरा बनने में बाधक बने हुए है, हो सकता है पार्टी के बहुमत में आने के बाद विरोधी उनके सीएम बनने में भी रोड़ा बने। ऐसे में रावत आर्या को आगे कर एक तीर से दो निशाने साध सकते हैं। राजनीति के चतुर खिलाड़ी हरीश रावत ने पंजाब का प्रभारी रहते गत् दिनों जब राज्य का सीएम एक दलित चेहरा बनाया तो उन्होंने साथ ही यह शस्त्र उत्तराखण्ड में भी चला दिया। रावत ने कहा कि उत्तराखण्ड में भी मुख्यमंत्री दलित चेहरा हो सकता है। ऐसे में यशपाल आर्या में लोग उत्तराखण्ड के दलित सीएम का चेहरा देखने लगे थे। देश में पंजाब के बाद उत्तराखण्ड ही ऐसा प्रदेश है जहां दलित ठाकुर और ब्राह्मणों के बाद सबसे ज्यादा है। प्रदेश में दलितों की संख्या 14 से 18 प्रतिशत है।

1989 में अविभाजित उत्तर प्रदेश में खटीमा-सितारगंज सीट से पहली बार विधायक बने यशपाल आर्या अब तक 6 बार जीत दर्ज करा चुके है। वे राज्य बनने से पहले दो बार और उत्तराखण्ड सृजन के बाद चार बार विधायक बनने के साथ ही वह एक बार भाजपा और दो बार कांग्रेस के कैबिनेट मंत्री रह चुके है। आर्या पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के खास शिष्य हुआ करते थे। राजनीति का ककहरा आर्या ने दिवंगत नेता नारायण दत्त तिवारी से ही सीखा। उत्तराखण्ड राज्य की पहली निर्वाचित विधानसभा के विधानसभा अध्यक्ष उन्हें एनडी ने ही बनवाया था। राज्य बनने के बाद लगातार दो बार वह कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष रहे। उनके प्रदेश अध्यक्ष काल में 2012 में कांग्रेस सत्ता में काबिज हुई थी। 2017 का विधानसभा चुनाव आने से पहले कांग्रेस में मची भगदड़ का यशपाल भी हिस्सा बन गए। पार्टी के नौ विधायक भाजपा में चले गए। तब अगर तत्कालीन सीएम हरीश रावत नेता पुत्रों को टिकट न देने की जिद नहीं पकड़ते तो शायद आर्या भाजपा में नहीं जाते। अपने पुत्र संजीव आर्या को कांग्रेस में टिकट न मिलते देख यशपाल आर्या। 16 जनवरी 2017 को कांग्रेस छोड़ भाजपा में चले गए थे।

भाजपा में जाकर यशपाल आर्या बाजपुर से तो उनके पुत्र संजीव आर्या नैनीताल से विधानसभा चुनाव जीते। यशपाल आर्या को भाजपा ने कैबिनेट मंत्री बनाया। पहले त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार इसके बाद तीरथ सिंह रावत और अब पुष्कर सिंह धामी के मंत्रिमंडल का वह हिस्सा रहे। सूत्रों की माने तो भाजपा के तीन मुख्यमंत्रियों के साढ़े चार साल के कार्यकाल में वह सहज नहीं थे। भाजपा में रहते यशपाल आर्या को मंत्री पद रास नहीं आया। शायद यही वजह थी कि 2019 में जब लोकसभा चुनाव हुए तो यशपाल आर्या ने नैनीताल-ऊधमसिंह नगर सीट से संसदीय चुनाव लड़ने की दावेदारी की। लेकिन भाजपा ने उन्हें लोकसभा का टिकट देने के बजाय अजय भट्ट को दे दिया। तब यह भी चर्चा चली कि यशपाल आर्या को जब भाजपा ने नैनीताल-ऊधमसिंह नगर से टिकट नहीं दिया तो उन्होंने अल्मोड़ा से टिकट मांगा था। लेकिन यहां से भी उन्हें निराशा मिली।

गत् दिनों जब यशपाल आर्या के कांग्रेस में जाने की बात चली थी तो मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी 25 सितंबर को खुद उनके घर पर पहुंचे थे। तब कहा गया कि अब आर्या की नाराजगी दूर हो चुकी है यशपाल आर्या खुद मीडिया से रूबरू हुए और कहा कि उन्हें तो पता ही नहीं था कि वह नाराज चल रहे हैं। ऐसा नहीं है कि यशपाल आर्या भाजपा मुख्यमंत्रियों के साढ़े चार साल के कार्यकाल में पहली बार नाराज हुए बल्कि वह पहले भी कई मामलों को लेकर खफा चल रहे थे। लेकिन तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने उन्हें कभी तवज्जो नहीं दी। यहां तक कि अपने विधानसभा क्षेत्र बाजपुर की 20 गांवों की जमीनी समस्या को सुलझाने के उद्देश्य से भी वह कई बार त्रिवेंद्र सिंह रावत, तीरथ सिंह रावत और बाद में पुष्कर सिंह धामी से मिले। 20 गांवों के लोगों के लिए करीब 5838 एकड़ जमीन का यह मुद्दा गले की हड्डी बन चुका था। यहां तक कहा जाने लगा था कि इस जमीनी मुद्दे को अगर आर्य सुलझा नहीं पाए तो फिर उनके लिए विधानसभा चुनाव जीतना कठिन हो जाएगा। हालांकि अपने जन्म दिवस के अवसर पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने यह मुद्दा सुलझा कर आर्या की राह आसान कर दी। लेकिन स्थानीय लोग इस मामले में दूसरी ही राय देते हैं। बाजपुर निवासी हरजीत सिंह कहते हैं कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस समस्या को सुलझाने का सारा श्रेय खुद ही लूट लिया। बाजपुर के 20 गांवों के जमीनी विवाद को सुलझाने के लिए पिछले कई सालों से यशपाल आर्या जुटे थे। वह भाजपा के मुख्यमंत्रियों से इस मुद्दे को खत्म कराने की गुहार लगाते रहे। आखिर मुद्दे को खत्म करने में उन्हें सफलता तो मिली लेकिन इसका श्रेय खुद मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ले गए। इससे यशपाल आर्य अंदर खाने नाराज चल रहे थे। इसके बाद आर्या का बयान आया कि इस मुद्दे पर वह त्रिवेंद्र, तीरथ, पुष्कर सभी से मिले हैं। कोई श्रेय लेना चाहे तो ले सकता है यह उनका अधिकार है।

हालांकि जिस तरह से तराई में किसान आंदोलन मजबूती से उभरा है उससे भाजपा विधायकों को अपनी जमीन खिसकने का भी खतरा बढ़ा है। इनमें बाजपुर के विधायक यशपाल आर्य भी शामिल है। आर्या इस बात से बखूबी वाकिफ थे कि उनके विधानसभा क्षेत्र में भी किसानों की भाजपा से नाराजगी है। किसानों की इस नाराजगी से उनके लिए 2022 में विधानसभा पहुंचने का रास्ता कठिन होता प्रतीत हो रहा था। किसानों की इस लड़ाई का नेतृत्व उनकी विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ चुकी सुनीता टम्टा बाजवा के पति जगतार सिंह बाजवा कर रहे हैं। बाजवा किसानों के बीच गहन जन संपर्क बनाए हुए हैं और भाजपा सरकार के खिलाफ माहौल बनाने में सफल होते दिख रहे हैं। बाजवा किसान नेता राकेश टिकैत के अत्यंत करीबी बताए जाते हैं। ऐसे में भाजपा में रहते 2022 के विधानसभा चुनावों में यशपाल आर्या के लिए बाजवा चुनौती बन सकते थे। कांग्रेस में जाकर ही इस चुनौती से पार पाना ही आर्या को सरल रास्ता लगा। बाजवा पूर्व में भाजपा में ही थे लेकिन जब यशपाल आर्या कांग्रेस छोड़ भाजपा में आए और बाजपुर से चुनाव लड़ने की घोषणा की तो बाजवा ने भाजपा छोड़ दी थी। हरीश रावत उन्हें कांग्रेस में ले आए और उनकी पत्नी सुनीता टम्टा बाजवा को चुनाव लड़वाया। 2017 के विधानसभा चुनावों में सुनीता टम्टा बाजवा ने 42 हजार 700 वोट लेकर अपनी मजबूत स्थिाति बनाई। तब यश पाल आर्या को 54 हजार मत मिले थे।

बहरहाल, पिता-पुत्र के भाजपा छोड़ कांग्रेस में शामिल होने के बाद उत्तराखण्ड की राजनीतिक सरगर्मियां बढ़ गई है। कयास लगाए जा रहे हैं कि प्रदेश भर में आर्या समर्थकों का भाजपा से जल्द ही मोह भंग हो सकता है। हल्द्वानी से लेकर पिथौरागढ़ और सितारगंज से लेकर देहरादून तक उनके समर्थकों में बैचेनी देखी जाने लगी है। हालांकि उनकी एन्ट्री से कांग्रेस का एक धड़ा ­­असंतुष्ट नजर आ रहा है। नैनीताल की पूर्व विधायक सरिता आर्या ने तो खुलकर इस पर अपना विरोध दर्ज करा डाला है। यशपाल एवं संजीव की कांग्रेस में रिइन्ट्री के चलते सरिता आर्या की राजनीति खतरे में पड़ सकती है। कांग्रेस नैनीताल सीट से उनकी दावेदारी खारिज कर सकती है। ऐसे में सरिता आर्या ने स्पष्ट संकेत दे डाले हैं कि वे भी अपने लिए विकल्प तलाशने में जुट गई हैं।

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