[gtranslate]

यह तो सच है कि सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने पूर्व मुख्यमंत्री की हैसियत से आवंटित किए गए विक्रमादित्य मार्ग स्थित बंगले को छोड़ते समय उन सामानों को लापरवाही के साथ निकाल लिया था जो उन्हांेने स्वयं के पैसों से खरीदा अथवा बनवाया था। यह बात स्वयं अखिलेश यादव ने भी प्रेस वार्ता के दौरान कुबूल की लेकिन इन दावों में कतई सच्चाई नहीं है कि अखिलेश यादव 400-500 की कीमत वाली नल की टोंटी निकाल ले गए हों और दीवारों सहित फर्श पर लगी टाइल्स को क्षतिग्रस्त कर गए हों। वैसे भी टाईल्स को एक बार लगाने के बाद दोबारा उसे उखाड़कर काम में नहीं लाया जा सकता। रही बात दीवारों के प्लाॅस्टर को क्षतिग्रस्त करने और नल की टोंटी को ले जाने की तो जो व्यक्ति पूरे जीवन अरबांे की सम्पत्ति के बीच पला-बढ़ा हो उसकी नीयत चन्द रुपयों की टोंटी पर कैसे खराब हो सकती है? यह विचारणीय प्रश्न है।

आइए अब कुछ हकीकत से भी रूबरु हो लिया जाए। सच कहा जाए तो राजनीति के खेल में कच्चे अखिलेश यादव की अनुभवहीनता ही सत्ताधारी दल को बोलने का मौका दे गयी। यदि अखिलेश यादव बंगले की चाबी सौंपते वक्त राज्य सम्पत्ति विभाग के अधिकारियों को बुला लेते और बंगले में मौजूद समस्त सरकारी सामानों की सूची बनाकर उनसे हस्ताक्षर करवा लेते तो शायद यह नौबत न आने पाती। ज्ञात हो राजनीति की माहिर खिलाड़ी मायावती को शायद इस बात का पूर्व में अनुमान था इसलिए उन्होंने बंगले की चाबी सौंपते वक्त राज्य सम्पत्ति के जिम्मेदार अधिकारियों को बंगले में मौजूद सामानों की सूची बनवाकर हस्ताक्षर करवा लिए थे और उक्त सूची की एक काॅपी अपने पास रखी ली थी और तत्समय मीडिया को भी दिखा दिया था, शायद यही वजह है कि मौजूदा सरकार अपने विरोधियों को बदनाम करने की साजिश के तहत मायावती को नहीं घेर पायी अन्यथा जिन आरोपों का सामना वर्तमान में अखिलेश यादव कर रहे हैं मायावती को भी करना पड़ जाता।
सरकार और भाजपा नेताओं का आरोप है कि अखिलेश यादव ने राजकीय सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाया जबकि अखिलेश यादव ने विगत दिनों एक प्रेस वार्ता में दावा किया है कि ‘उन्होंने सरकारी सम्पत्ति को कहीं से कोई नुकसान नहीं पहुंचाया है। बंगले से वही सामान निकाला है जो उनका अपना था।’


परस्पर दावों के विपरीत कुछ महत्वपूर्ण बिन्दुओं को शायद जानबूझकर नजरअंदाज किया जा रहा है। बंगला खाली करके चाबी सौंपने के दौरान अखिलेश यादव बंगले में मौजूद नहीं थे, पार्टी के कुछ विश्वसनीय कार्यकर्ताओं की देखरेख में सामानों की शिफ्टिंग हुई। यहां पर यदि संदेह को स्थान दिया जाए तो उम्मीद की जा सकती है कि बंगले के अन्दर तोड़-फोड़ और नल की टोंटी सहित अन्य सामानों को क्षतिग्रस्त करने में कार्यकर्ताओं की भूमिका हो सकती है जिसकी जानकारी स्वयं अखिलेश यादव को न रही हो। दूसरा संदेह भाजपाइयों पर जाता है। हो सकता है कि सरकार के निर्देश पर राज्य सम्पत्ति विभाग वालों की देखरेख में अखिलेश यादव की छवि को खराब करने की गरज से बंगले में तोड़-फोड़ की गयी हो। इस संदेह को बल इसलिए भी मिलता है क्योंकि बंगले की चाबी सौंपे जाने के लगभग एक हफ्ते तक खाली बंगले की निगरानी सुरक्षाकर्मियों द्वारा की जाती रही। इस दौरान किसी भी मीडियाकर्मी को अन्दर नहीं जाने दिया गया। इससे पूर्व बंगला खाली करने के लगभग चार दिन पश्चात सरकार ने स्वयं बंगले की वीडियोग्राफी करवायी थी वह भी सूचना विभाग के किसी फोटोग्राफर से नहीं अपितु बाहर के किसी फोटोग्राफर से। प्रश्न यह उठता है कि जब सरकारी फोटोग्राफर मौजूद थे तो बाहर के किसी फोटोग्राफर को बुलाने की क्या जरूरत आन पड़ी, शायद विभाग के फोटोग्राफर से सच्चाई लीक होने का खतरा था। लगभग एक सप्ताह तक बंगला पूरी तरह से सुरक्षाकर्मियों की गिरफ्त में बंद रहा। मीडियाकर्मियों के पहुंचने से पहले मुख्यमंत्री के ओएसडी अभिषेक और आईएएस अधिकारी मृत्युंजय नारायण के बंगले में जाने की बात दावे के साथ कही जा रही है। बंगले के बाहर कुछ दूरी पर झण्डे-बैनर बेचने वाले भी इसी बात की तस्दीक कर रहे हैं कि बंगला खाली होने के बाद मुख्यमंत्री के ओएसडी अभिषेक के साथ ही कुछ अधिकारियों को भी बंगले में जाते देखा गया था। यदि ये दोनों लोग बंगले में गए थे तो बंगल में तोड़फोड़ की जानकारी उन्हें पहले ही मिल गयी होगी, उस वक्त उन्होंने मीडिया को बुलाकर सच्चाई दिखाने का प्रयास क्यों नहीं किया?

प्रश्न यह उठता है कि जब बंगले में तोड़फोड़ हुई थी तो सरकार ने बंगला खाली होने के तुरन्त बाद मीडियाकर्मियों को बुलाकर बंगला क्यों नहीं दिखाया? एक सप्ताह तक सरकार सोती क्यों रही? इसके पीछे क्या मंशा थी? वह किस चीज का इंतजार कर रही थी? इसका खुलासा तो शायद जांच के पश्चात ही हो सकता है लेकिन इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है कि अखिलेश यादव को घेरने के लिए सप्ताह भर तक बंगले में जानबूझकर तोड़फोड़ होती रही। जब पर्याप्त मात्रा में मीडिया को दिखाने के लिए माहौल तैयार हो गया तब जाकर मीडियाकर्मियों को बुलाकर बंगले में तोड़फोड़ की जानकारी दी गयी। बस यहीं पर भाजपा का कुशल मैनेजमेंट काम कर गया। सरकार ने अपने चश्मे से मीडिया को जो दिखाया उसी को सत्य मान लिया गया और महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर सवाल-जवाब किए बगैर समाचारों को नमक-मिर्च लगाकार प्रकाशित-प्रसारित कर दिया गया। यहां तक कि महामहिम राज्यपाल तक ने अनसुलझे प्रश्नों का जवाब मिले बगैर अखिलेश के खिलाफ कार्रवाई का फरमान भी जारी कर दिया।

अधिकतर मीडिया घरानों ने भी सरकार का भरपूर साथ दिया। मीडिया ने बिना पड़ताल किए खबर प्रकाशित-प्रसारित कर दी कि बंगले में मौजूद स्वीमिंग पूल को मिट्टी डालकर पाट दिया गया जबकि सच्चाई यह है कि बंगले में कोई स्वीमिंग पूल था ही नहीं। इस बात को स्वयं अखिलेश यादव दावे के साथ कहते हैं। उनका कहना है कि उनके बंगले में पिछले सवा साल में हजारों बच्चे उनसे मिलने आ चुके हैं, वही बता देंगे कि बंगले में स्वीमिंग पूल था या नहीं। अखिलेश लखनऊ की मीडिया से बेहद खफा दिखे। बोले, ‘कुछ भी लिखने और दिखाने से पहले सच्चाई जरूर जान लेनी चाहिए थी।’ अखिलेश यादव कहते हैं कि अब उन्हें सरकार की तरफ से आने वाली उस रिपोर्ट का इंतजार है जिसमें हमारे द्वारा किए गए नुकसान की गणना होगी।
दूसरी तरफ कुछ पत्रकार ऐसे भी हैं जो यह मानते हैं कि अखिलेश यादव को बदनाम करने की गरज से ही पूरी पटकथा तैयार की गयी थी। बंगला खाली होने के एक सप्ताह पश्चात बंगले की हालत दिखाने के लिए बुलाए गए प्रेस छायाकारों में से अधिकतर छायाकारों का भी यही मानना है कि अखिलेश यादव जैसा सुलझे दिमाग का व्यक्ति ऐसा कृत्य नहीं कर सकता। बंगला देखकर ऐसा लगता है जैसे किसी ने जानबूझकर और बदनाम करने की गरज से तोड़फोड़ की हो। पत्रकार यह भी मानते हैं कि जब बंगले की यह दशा थी तो राज्य सम्पत्ति विभाग ने मीडियाकर्मियों को बंगला खाली होने के तुरन्त बाद क्यों नहीं बुलाया? एक सप्ताह तक किस चीज का इंतजार करते रहे। खाली पडे़ बंगले पर सुरक्षाकर्मी क्यों तैनात किए गए थे? यह कुछ महत्वपूर्ण बिन्दु हैं जिनका जवाब देने के लिए कोई भी सम्बन्धित अधिकारी तैयार नहीं।
फिलहाल इस पूरे घटनाक्रम का लब्बोलुआब यह है कि यदि अखिलेश यादव बसपा प्रमुख मायावती की भांति राजनीति के माहिर खिलाड़ी होते और बंगला खाली करते समय सम्बन्धित विभाग के अधिकारी को चाबी सौंपते वक्त बंगले में मौजूद सामनों की सूची बनवाकर रिसीविंग ले लेते तो शायद यह नौबत नहीं आने पाती। शायद उनकी अनुभवहीनता का फायदा भाजपाई उठा ले गए।

भाजपा और संघ किसी की छवि खराब करने में माहिर है. मीडिया ने एक-दो स्थानों के फ़ोटो को पूरे आवास का दिखा कर अखिलेश जी की छवि धूमिल करने की कोशिश की है। मगर जैसे-जैसे सच्चाई सामने आ रही है, सरकार का पोल खुलता जा रहा है। बंगला छोड़ते समय अखिलेश जी  भी सारी औपचारिकताएं पूरी की थी। यदि विभाग को उस समय बंगला में तोड़फोड़ दिखा था तो उसी वक़्त इसे सामने लाना चाहिए था। ऐसा न करने का साफ़ अर्थ है कि दाल में कुछ काला है।
राजकुमार भाटी, राष्ट्रीय प्रवक्ता सपा
अखिलेश यादव ने सरकारी बंगले में जो किया, वह सपा की गुंडागर्दी का एक और उदाहरण है। जब उनकी सरकार प्रदेश में थी, उनके कार्यकर्ता यही तो पूरे प्रदेश में करते थे।
श्रीकांत शर्मा, मंत्री उत्तर प्रदेश

You may also like

MERA DDDD DDD DD