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गुरुकुल; खुशियों वाला स्कूल

हम सभी आज के समय में समाज के उस पहलू पर अपना जीवन गुजार रहे हैं जहां व्यक्ति को उसके ज्ञान से नहीं अपितु उसकी डिग्री से जज किया जाता है। बचपन से ही शुरू क्लासेस में अधिक नंबर लाने की यह होड़ हमें रट्टा लगाने की प्रवर्ति की ओर धकेल रही है। लेकिन कानपुर में एक ऐसा स्कूल भी है जहां बच्चो को इंजीनियर नहीं बल्कि अच्छा इंसान बनना सिखाया जाता है। इस अनोखे स्कूल ‘गुरुकुलम’ में बच्चे खुशी-खुशी पढ़ाई करते हैं। यहां बच्चों को खेल-खेल में पढ़ाया जाता है, जिससे बच्चे पढ़ना भी सीखते हैं और उनपर किसी तरह का दवाब भी नहीं होता। जब बच्चे बिना दबाव के पढ़ते हैं तो वह केवल नंबर लाने के लिए नहीं बल्कि चीज़ों को समझने के लिए पढ़ते हैं। यही कारण है कि दिन-प्रतिदिन इस स्कूल के बच्चों की संख्या बढ़ती जा रही है। इतना ही नहीं बच्चो के साथ-साथ बच्चों के मात-पिता पर भी बच्चों की पढाई को लेकर किसी तरह का दबाव नहीं पड़ता क्योंकि यह स्कूल बच्चो के बिलकुल फ्री सेवा प्रदान करता है। यही कारण है कि यह स्कूल ‘खुशियों की पाठशाला’ के नाम से मशहूर है।

 

दरअसल, कानपुर में रहने वाले उद्देश्य सचान, कानपुर के मध्यमवर्गीय परिवार से हैं, इनका जीवन काफी मुश्किल और तनावपूर्ण रहा। बचपन से ही कुछ बड़ा करने के दबाव ने उन्हें कभी वह नहीं करने दिया जो वह करना चाहते थे, बनना चाहते थे। लेकिन जब वह समझदार हुए तो इन्होने बच्चों को वह शिक्षा देने का निर्णय लिया जैसी वह खुद प्राप्त करना चाहते थे। इन्होने शुरुआती दिनों में 5 बच्चों के साथ अपना यह स्कूल शुरू किया और आज इनके स्कूल में लगभग 150 बच्चे शामिल हैं। उद्देश्य ने ज़िन्दगी भर अपने पिता को अपनी स्कूल की फीस भरने के लिए परिश्रम करते देखा, उद्देश्य ने अपने पिता की मेहनत को वसूल करते हुए, सभी एग्जाम में टॉप तो किया; लेकिन क्रिटिकल थिंकिंग और निर्णायकता की कमी की वजह से उनका किसी कंपनी में सिलेक्शन नहीं हो पाया। इस वजह से वह ढाबों और आइस फैक्ट्री में काम करने लगे। वहां उन्हें कई बार ऐसा लगा कि वह अपनी पढ़ाई और मेहनत को ज़ाया कर रहे हैं।

जब उन्होंने अपनी शिक्षा को समाज के काम लाने की ठानी, तो उन्हें यह एहसास हुआ कि उनके जैसे कई और लोग भी हैं, जो झुग्गी बस्तियों में रहते हैं। जिनके बच्चे गरीबी के कारण स्कूल नहीं जा पाते, अक्सर उन्हें बीमारियों का सामना करना पड़ता है, और वे बेरोजगारी से जूझ रहे हैं। और तब उद्देश्य ने एक ऐसा स्कूल खोलने का फैसला किया, जो खुशियां फैलाएं न की परेशानियां।

एक इंटरव्यू में उद्देश्य कहते हैं, ‘मैं पिछले 4 सालों से गुरुकुल- खुशियों वाला स्कूल नाम का विद्यालय चला रहा हूँ। जहां 150 अभावग्रस्त और झुग्गी-झोपड़ी के बच्चों को नि:शुल्क पढ़ा रहा हूँ।’ यहाँ तक का सफ़र उनके लिए काफ़ी मुश्किल था, क्योंकि एक साधारण व्यक्ति के लिए स्कूल खोलना कोई आसान काम नहीं होता। इसलिए उन्होंने 2019 में 9वीं और 10वीं क्लास के 5 बच्चों को मुफ्त में कोचिंग देने से शुरुआत की। फिर धीरे-धीरे झुग्गी झोपड़ियों के बच्चों को भी पढ़ाना शुरू किया। ऐसा करते हुए 5 बच्चों से 10 बच्चे हुए और 10 से 70 बच्चे हो गए। इन सभी बच्चों को उद्देश्य बिना कोई फीस लिए पढ़ाते थे। 21 फरवरी, 2021 को उन्होंने एक कमरा किराए पर लेकर, यहां ‘गुरूकुलम- खुशियों वाला स्कूल’ शुरू किया। जहां आज 150 छात्र हैं और 3 टीचर्स इन्हें पढ़ा रहे हैं।

यहाँ बच्चों को पढ़ाई के साथ-साथ ज़िन्दगी में काम आने वाले प्रैक्टिकल सब्जेक्ट्स; जैसे बिजनेस स्किल्स, लाइफ हैक्स, साइकोलॉजी, थिएटर और मोरल स्टडीज भी सिखाए जाते हैं। इसके साथ ही बच्चे पढ़ाई के अलावा सांस्कृतिक कार्यक्रमों और खेल-कूद में हिस्सा लेते हैं। बच्चे यहां अपनी मर्ज़ी से, खुशी से पढ़ने आते हैं और खुशियों की पाठशाला में खूब मस्ती के साथ पढ़ाई करते हैं। जिससे अब यह स्कूल न केवल अपने शहर बल्कि पुरे भारत में प्रेरणा का स्रोत बन गया है।

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