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सल्ट में जबर्दस्त संग्राम

सल्ट को जीतने में कांग्रेस-भाजपा दोनों पार्टियों ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। भाजपा सहानुभूति के रथ पर सवार है तो कांग्रेस को उम्मीद है कि उसकी प्रत्याशी जमीन से जुड़ी हुई हैं। दोनों पार्टियों को बाहर ही नहीं अपने भीतर से भी संघर्ष करना पड़ रहा है

आगामी 17 अप्रैल को सल्ट विधानसभा क्षेत्र के लिए होने जा रहा उपचुनाव सत्तारूढ़ पार्टी भाजपा के लिए चुनौती बन गया है। हालांकि भाजपा यहां सहानुभूति के रथ पर सवार है, लेकिन संग्राम जबर्दस्त होने के आसार हैं। दरअसल, भाजपा को लगता है कि राज्य में 2017 के बाद हुए दो विधानसभा उपचुनावों में भाजपा के प्रत्याशी सहानुभूति लहर की बदौलत जीतते रहे हैं। सल्ट में भी वह हैट्रिक लगाने की उम्मीद पाले है, लेकिन कांग्रेस प्रत्याशी ने मुकाबले को कांटे का बना दिया है। सल्ट में एक तरफ सारी सरकार चुनाव लड़ रही है। भाजपा के दो दर्जन विधायक और मंत्री यहां पार्टी प्रत्याशी के चुनाव प्रचार की कमान संभाले हुए हैं। दूसरी तरफ कांग्रेस प्रत्याशी गंगा पंचोली के साथ राज्यसभा सांसद प्रदीप टम्टा, पूर्व विधानसभा अध्यक्ष एवं विधायक गोविंद सिंह कुंजवाल और रानीखेत के विधायक करण माहरा चुनावी प्रचार की कमान संभाले हुए हैं। पार्टी को इस चुनाव में पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की कमी खल रही है। वह पिछले 25 मार्च से बीमार हैं और दिल्ली के एम्स अस्पताल में भर्ती हैं। सल्ट के पूर्व कांग्रेसी विधायक रणजीत सिंह रावत और उनके पुत्र ब्लाॅक प्रमुख विक्रम रावत की चुनाव में सक्रियता न के बराबर है।

गौरतलब है कि पूर्व विधायक रणजीत रावत इस सीट पर अपने पुत्र विक्रम रावत को उपचुनाव लड़ाना चाहते थे। जानकारों का दावा है कि पार्टी द्वारा टिकट वितरण तय करने के लिए निुयक्त किए गए पर्यवेक्षकों की रिपोर्ट विक्रम रावत के पक्ष में थी। नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदयेश और प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह ने केंद्रीय प्रभारी देवेंद्र यादव को यहां तक कह डाला था कि यदि विक्रम रावत को टिकट मिला तो ही वे जीत की गारंटी दे सकते हैं, अन्य किसी उम्मीदवार को टिकट दिए जाने पर उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं रहेगी। जानकारों के अनुसार देवेंद्र यादव स्वयं भी विक्रम के पक्ष में थे। रणजीत रावत खेमे में नामांकन की तैयारियां तक शुरू हो चुकी थी। लेकिन एम्स के गहन चिकित्सा कक्ष से कांग्रेस अध्यक्ष को भेजी गई एक ई-मेल ने सारे समीकरण गड़बड़ा दिए। पूर्व सीएम रावत की इस ई-मेल को देर रात कांग्रेस अध्यक्ष के सहायक महेश ने जब सोनिया गांधी के समक्ष रखा तो रणजीत रावत के लिए मोर्चा खोले देवेंद्र यादव, प्रीतम सिंह और इंदिरा हृदयेश की सारी मेहनत पर पानी फिर गया। सोनिया गांधी ने देर रात ही गंगा पंचोली को टिकट दिए जाने के
निर्देश प्रभारी को भेज दिए।

कांग्रेस महासचिव हरीश रावत अभी भी एम्स के आईसीयू में हैं जहां उनका कोरोना संक्रमण के चलते इलाज चल रहा है। रावत ने गंगा के पक्ष में एक मार्मिक आडियो अपील जारी कर भाजपा खेमे में भारी हलचल मचा दी है। सल्ट क्षेत्र में इस अपील का खासा प्रभाव पड़ने के समाचार हैं। कांग्रेस का संकट लेकिन उसकी अंदरूनी कलह है। स्वयं रावत के कई करीबी संकट की इस घड़ी में रणजीत रावत के साथ गलबहियां करते नजर आ रहे हैं। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए रावत ने अपने ऐसे सभी करीबियों से किनारा कर इस उपचुनाव का सारा मैनेजमेंट पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल एवं राज्यसभा सांसद प्रदीप टम्टा के हवाले कर दिया है। विक्रम रावत का टिकट काटे जाने के पीछे की कहानी खासी दिलचस्प है। सूत्रों की मानें तो दिल्ली एम्स में शिफ्ट होते समय ही हरीश रावत को शंका थी कि उनके पीछे रंजीत रावत को सपोर्ट कर रहे प्रीतम सिंह और इंदिरा हृदयेश केंद्रीय प्रभारी की मदद से गंगा का टिकट कटा देंगे। इसलिए रावत ने अपने एक विश्वस्त सहयोगी को लिखित में तीन प्लान सौंप दिए थे। इन सहयोगी को रावत देहरादून में एयर एम्बुलेंस में बैठने से पूर्व सारी रणनीति समझा कर गए। रावत का प्लान कामयाब रहा। आईसीयू में रहते जब रावत संग प्रदेश प्रभारी देवेंद्र यादव बात नहीं कर पाए तो उन्होंने अपने स्तर पर ही विक्रम रावत का टिकट फाइनल कर डाला। दिल्ली में इस निर्णय के समय प्रीतम सिंह और सूर्यकांत धस्माना यादव संग मौजूद थे और समय-समय पर नेता प्रतिपक्ष फोन द्वारा प्रभारी संग बात कर रही थीं। रावत खेमे को जैसे ही यह खबर लगी आनन- फानन में प्लान बी को एक्टिव किया गया। ई-मेल देर रात ही सोनिया को दिखाई गई और सारा खेल बदल गया। सोनिया गांधी ने प्रदेश प्रभारी को स्पष्ट निर्देश दे डाले कि टिकट गंगा पंचोली का ही होगा। ‘दि संडे पोस्ट’ ने जब हरीश रावत के इस विश्वस्त सहयोगी से बात की तो एक राज और सामने आया। टिकट वितरण तय करने के लिए भेजे गए पर्यवेक्षकों में शामिल रावत के करीबी नेताओं तक ने रणजीत रावत के बेटे का पक्ष लिया। हरीश रावत के सहयोगी का मानना है कि रावत इस विश्वासघात से खासे आहत हैं।

भाजपा की बात करें तो नए मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत और प्रदेश अध्यक्ष मदन कौशिक के लिए यह चुनाव जीतना बहुत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अगर यहां से उनकी पार्टी के प्रत्याशी महेश जीना जीतते हैं तो वह मजबूत होंगे। अगर भाजपा यह सीट गंवाती है, तो यह सरकार के लिए बड़ा झटका साबित होगा। भाजपा के लिए यह विधानसभा उपचुनाव एक तरह से लिटमस टेस्ट भी है। इस टेस्ट में पास होने के लिए ही भाजपा जहां सहानुभूति को भुनाने की कोशिश में है, वहीं उसने अपनी पूरी जान लगा दी है। भाजपा के लिए महेश जीना बिल्कुल नए उम्मीदवार हैं। पूर्व में पार्टी के यहां से विधायक सुरेंद्र सिंह जीना का पिछले साल कोरोना के कारण देहांत हो गया था। उसके बाद से ही सुरेंद्र सिंह जीना के भाई महेश जीना सल्ट विधानसभा सीट में मतदाताओं के बीच आए हैं। महेश के बारे में बताया जाता है कि वह दिल्ली में रहकर अपना बिजनेस संभालते थे। भाजपा के कार्यकर्ताओं में भी उनकी ज्यादा पैठ नहीं है। लेकिन दिवंगत विधायक जीना की मौत की सहानुभूति लेने के लिए उनके भाई को चुनाव में उतारा गया।

पहले भी भाजपा सहानुभूति का फायदा उठाने की कोशिश कर चुकी है। वर्ष 2018 में गढ़वाल की थराली सीट से तत्कालीन भाजपा विधायक मगनलाल शाह की मौत के बाद हुए उपचुनाव में उनकी पत्नी मुन्नी देवी को टिकट दिया गया था। भाजपा ने यह सीट जीती तो सही लेकिन अपेक्षा के विपरीत जीत का अंतर बहुत कम यानी महज 1981 मतों का ही रहा। इसके बाद अगला उपचुनाव कुमाऊं के पिथौरागढ़ में हुआ था। यहां से प्रकाश पंत के स्वर्ग सिधारने के बाद भाजपा ने उनकी पत्नी चंद्रा पंत को टिकट दिया था, जबकि कांग्रेस ने यहां से अंजू लुंठी को अपना प्रत्याशी बनाया था। इस विधानसभा उपचुनाव में भाजपा को अपनी प्रत्याशी की जीत का अंतर बड़ा होने की उम्मीद थी, लेकिन यह अंतर 3267 तक ही सिमट गया, जबकि कांग्रेस की अंजु लंुठी बिल्कुल नई प्रत्याशी थीं। सल्ट से कांग्रेस ने गंगा पंचोली को दूसरी बार चुनाव मैदान में उतारा है। 2017 में जब तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत और रणजीत रावत दो जिस्म एक मन कहे जाते थे, तब गंगा पंचोली जीत के बहुत करीब पहुंच गई थी। उस दौरान रणजीत रावत रामनगर से चुनाव लड़े थे। गंगा पंचाोली को तब भाजपा प्रत्याशी सुरेंद्र सिंह जीना ने हराया था। तब गंगा 3000 से भी कम मतों से चुनाव हारी थी। उस समय प्रदेश में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर वोट पाकर भाजपा के 57 विधायक चुनाव जीते थे।

विक्रम रावत का टिकट काटे जाने के पीछे की कहानी खासी दिलचस्प है। सूत्रों की मानें तो दिल्ली एम्स में शिफ्ट होते समय ही हरीश रावत को शंका थी कि उनके पीछे रणजीत रावत को सपोर्ट कर रहे प्रीतम सिंह और इंदिरा हृदयेश केंद्रीय प्रभारी की मदद से गंगा का टिकट कटा देंगे। इसलिए रावत ने अपने एक विश्वस्त सहयोगी को लिखित में तीन प्लान सौंप दिए थे। इन सहयोगी को रावत देहरादून में एयर एम्बुलेंस में बैठने से पूर्व सारी रणनीति समझा कर गए। रावत का प्लान कामयाब रहा। आईसीयू में रहते जब रावत संग प्रदेश प्रभारी देवेंद्र यादव बात नहीं कर पाए तो उन्होंने अपने स्तर पर ही विक्रम रावत का टिकट फाइनल कर डाला

सुरेंद्र सिंह जीना दो बार विधायक रहने के बाद तीसरी बार चुनाव मैदान में थे, फिर भी गंगा पंचोली ने मोदी लहर में उन्हें कड़ी टक्कर दी थी। शायद यही वह प्रमुख वजह हो सकती है जिसके कारण भाजपा ने यहां से मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत पर दांव लगाने का जोखिम नहीं लिया। फिर एक कारण यह भी हो सकता है कि पिछले दिनों सल्ट सीट पर आए एक सर्वे में मतदाताओं का कांग्रेस के पक्ष में अधिक झुकाव दिखाई दिया था। इस बार के उपचुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मतदाताओं पर इतना असर भी नहीं है, जितना कि 2017 के चुनावों में था। इस बार भाजपा के खिलाफ महंगाई भी बड़ा मुद्दा बनकर सामने है। सल्ट में भाजपा के प्रत्याशी महेश जीना का माइनस प्वाइंट यह है कि वह कांग्रेस प्रत्याशी गंगा पंचोली की तरह जनता के बीच के नेता नहीं हैं। महेश जीना का सामाजिक-राजनीतिक दायरा बहुत सिकुड़ा हुआ है। उनके पक्ष में एक बात यह बताई जा रही है कि कांग्रेस में अंदरखाने फूट है। गंगा पंचोली का रणजीत रावत गुट साथ नहीं दे रहा है। लेकिन अंदरखाने भाजपा में भी सबकुछ ठीक नहीं है। बताया जाता है कि भाजपा का ही एक गुट ऐसा है जो महेश जीना को यहां चुनाव जीताकर जमने नहीं देना चाहता है। दूसरी तरफ गंगा पंचोली को नारायण रावत के रूप में एक ऐसा समर्थक मिल गया है जो पूर्व में सल्ट से जिला पंचायत सदस्य रह चुके हैं। उनकी छवि एक आंदोलनकारी नेता के रूप में है। वह उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी में रहकर कई जमीनी आंदोलनों से जुड़े रहे हैं। उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी नारायण रावत को सल्ट से उम्मीदवार बनाने की पूरी तैयारी कर चुकी थी, लेकिन इससे पहले ही वह 23 मार्च को कांग्रेस में चले गए। इससे कांग्रेस प्रत्याशी गंगा पंचोली को मजबूती मिली है।

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