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अनुदान के नाम पर करोड़ों की लूट

‘चोर-चोर मौसेरे भाई’ कुछ ऐसी ही स्थिति रही है उत्तर प्रदेश में अब तक की सरकारों की। पिछले तीन दशकों के दौरान प्रदेश सरकारों ने दावे भले ही भ्रष्टाचारमुक्त प्रशासन के किए हों लेकिन हमाम में नंगों ने ऐसे किसी भ्रष्ट लोकसेवक अथवा जनसेवक के खिलाफ कार्यवाही किए जाने में रुचि नहीं दिखायी जो भविष्य में उन्हें पलटकर नुकसान पहुंचाने की हैसियत रखता हो। चाहें माया-मुलायम के खिलाफ आय से अधिक सम्पत्ति मामले में सीबीआई द्वारा चार्जशीट दाखिल किए जाने के उपरांत दोनों को जेल भेजने के दावे हों या फिर वे तमाम मामले जो ऐसे जनप्रतिनिधियों से सम्बन्धित हों जो भविष्य में भाजपा के लिए भी सिरदर्द साबित हो सकते हों, ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई की हिम्मत न तो पूर्ववर्ती सपा-बसपा सरकारों में थी और न ही मौजूदा योगी सरकार के कार्यकाल में। जानकर हैरत होगी कि राजनीतिक दुश्मनी के बावजूद सत्ता परिवर्तन के बावजूद ऐसे लोगों को राजकोष को चूना लगाते देखा गया है जो पूर्ववर्ती सरकारों के कार्यकाल में राजकोष को स्वार्थहित के लिए खाली करते रहे हैं। बात यदि किसी पूर्व मुख्यमंत्री, उनके नाते-रिश्तेदार अथवा पूर्व विधायक-सांसदों की हो तो कम ही मामले देखने को मिलेंगे कि ऐसे लोगों के खिलाफ किसी सरकार ने प्रभावी कार्रवाई की हो। राजकोष को करोड़ों का चूना लगाने सम्बन्धी एक ऐसा ही मामला पूर्ववर्ती अखिलेश सरकार के कार्यकाल से सम्बन्धित है। पूर्ववर्ती अखिलेश सरकार के कार्यकाल में कहना गलत नहीं होगा कि मुलायम की छोटी बहू के रूप में अपर्णा यादव का परिचय उन्हें किसी भी सरकार में संरक्षण प्रदान करने के लिए पर्याप्त है। ये वही अपर्णा यादव हैं जो ‘जीवाश्रय’ नाम की संस्था चलाती हैं। कागजों पर तो यह संस्था आवारा पशुओं को संरक्षण देने का काम करती है जबकि असलियत यह है कि इस संस्था की नींव सिर्फ और सिर्फ सरकारी धन और सरकारी जमीनों को हड़पने की गरज से रखी गयी थी।
तत्कालीन अखिलेश सरकार इस संस्था पर कितनी मेहरबान थी, इसका एक नमूना ही संस्था के कथित उद्देश्यों की पोल खोलने के लिए पर्याप्त है। वर्ष 2012 से लेकर वर्ष 2017 (अखिलेश सरकार का कार्यकाल) के बीच तत्कालीन समाजवादी सरकार ने गौशालाओं के लिए 9.66 (नौ करोड़ 66 लाख) का अनुदान राजकोष से जारी किया। इस 9.66 करोड़ में से 8.35 करोड़ का अनुदान सिर्फ जीवाश्रय संस्था को ही दे दिया गया, यानी कुल अनुदान का 86.04 प्रतिशत। अनुदान की शेष राशि (13.96 प्रतिशत) अन्य गौशालाओं के बीच वितरित की गयी। वर्षवार ब्यौरा कुछ इस तरह से है। वर्ष 2012-13 और 2014-2015 में जीवाश्रय संस्था को 50 लाख, 1 करोड़ 25 लाख और 1 करोड़ 41 लाख रुपयों का अनुदान दिया गया। वर्ष 2015-2016 में 2 करोड़ 58 लाख रुपयों का अनुदान मिला जबकि इस बीच प्रख्यात श्रीपाद बाबा गोशाला (वृन्दावन) को मात्र 41 लाख रुपयों का अनुदान दिया गया। इसी तरह से वर्ष 2016-2017 में 3 करोड़ 45 लाख का अनुदान गौशालाआंे के लिए सरकार की तरफ से जारी किया गया। इसमें से 2 करोड़ 55 लाख रुपया तो सिर्फ उस जीवाश्रय संस्था को ही दे दिया गया जिसके बारे में कहा जाता है कि उपरोक्त संस्था मुलायम की छोटी बहू अपर्णा यादव की है। अनुदान की शेष राशि में आधा दर्जन गौशालाओं को निपटाया गया। शेष गौशालाओं में से श्रीपाद गौशाला को 63 लाख रुपए दिए गए। वित्तीय वर्ष 2017-2018 (मौजूदा योगी सरकार) में गौशालाओं के लिए सरकार की तरफ से 1 करोड़ 05 लाख रुपया अनुदान के रूप में दिया गया। खास बात यह रही कि अपर्णा यादव के तमाम प्रयासों के बावजूद जीवाश्रय को अनुदान के रूप में एक भी रुपया नहीं दिया गया। इस बार के अनुदान में सर्वाधिक पैसा ललितपुर की गौशाला (दयोदय गौशाला) को दिया गया।
उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि पूर्ववर्ती अखिलेश सरकार के कार्यकाल में उत्तर प्रदेश की गौशालाओं को मिलने वाली अनुदान राशि का तीन चैथाई हिस्सा तो सिर्फ परिवारवाद की भेंट ही चढ़ गया। तीन चैथाई अनुदान मिलने के बाद यदि जीवाश्रय संस्था में पशुओं की देखरेख ठीक ढंग से होती तो भी ठीक था लेकिन तीन चैथाई अनुदान की राशि अकेले डकारने के बावजूद गायों की मौतों का सिलसिला बना रहा। इस जीवाश्रय संस्था के बारे में तो यहां तक चर्चा रही कि यह संस्था गोरक्षा के नाम पर गायों का सौदागर है। ये आरोप कितने सच हैं? जांच का विषय हो सकता है लेकिन जिस स्थान पर यह संस्था मौजूद है वहां आस-पास के गांवों में तो इसी तरह की चर्चाएं होती रही हैं। स्थानीय ग्रामीणों का तो यहां तक आरोप था कि जीवाश्रय संस्था की आड़ में नजूल की जमीनों पर कब्जा जमाने की तैयारी हो रही है। बताया जाता है कि यदि सपा सरकार को सूबे की सत्ता में बने रहने का एक और मौका मिलता तो निश्चित तौर पर राजधानी लखनऊ के इण्डस्ट्रियल इलाके में करोड़ों की जमीन पर मुलायम परिवार का कब्जा हो गया होता।
ये तो रही पूर्ववर्ती अखिलेश सरकार के कार्यकाल में अनुदान राशि का पारिवारीकरण, अब बात करते हैं मौजूदा योगी सरकार के कार्यकाल में मुलायम की छोटी बहू की कथित संस्था के खिलाफ कार्रवाई किए जाने की तो डेढ़ वर्ष से अधिक का कार्यकाल बीत जाने और तमाम शिकायती पत्रों के बावजूद जीवाश्रय से जुडे़ लोगों के खिलाफ कार्रवाई तो दूर जांच के आदेश तक नहीं दिए गए। हालांकि मुलायम की छोटी बहू अपर्णा यादव ने मौजूदा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गऊ प्रेम का लाभ उठाने का भरसक प्रयास कर डाला लेकिन योगी सरकार की तरफ से जीवाश्रय संस्था को अनुदान से पूरी तरह वंचित रखा गया। बताते चलें कि वर्ष 2017 में मार्च के अंतिम सप्ताह में अपर्णा यादव की गुजारिश पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जीवाश्रय संस्था के अधीन चल रहे ‘कान्हा उपवन’ का दौरा किया था। कान्हा उपवन की श्रीकृष्णशाला में गायों को चारा खिलाते हुए तमाम फोटो वायरल की गयी। उस वक्त यह लगने लगा था कि योगी की सरकार में भी जीवाश्रय संस्था सरकारी अनुदान पर डाका डालने में कामयाब हो जायेगी लेकिन मीडिया में जीवाश्रय की पोल खुलने और आरटीआई एक्टिविस्टों द्वारा दस्तावेजों के आधार पर विरोध के चलते योगी सरकार को अपने पांव वापस खींचने पडे़। तब से लेकर अब तक ‘कान्हा उपवन’ में सैकड़ों गायों की मौत हो चुकी है लेकिन गोरक्षा के नाम पर तमाम दावे करने के बावजूद गायों की मौत को लेकर जांच नहीं की गयी।
बताते चलें कि मामले का खुलासा जुलाई 2017 में ही उस वक्त हो चुका था जब एक आरटीआई एक्टिविस्ट ने सूचना का अधिकार अधिनियम-2005 के तहत जानकारी मांगी। जवाब में कहा गया कि शासन की ओर से जीव संरक्षण संस्था को अनुदान दिया गया था लेकिन जिस तरीके से धन दिया गया वह अपने आप में ही कई सवाल खडे़ करता है। आरोप है कि अनुदान देते वक्त नियमों का ध्यान नहीं रखा गया इतना ही नहीं ग्रांट के लिए गोसेवा आयोग के निदेशक की संस्तुति की आवश्यकता होती है लेकिन यह प्रक्रिया भी नहीं अपनायी गयी। कुल मिलाकर तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने करोड़ों की ग्रांट अनियमित तरीके से अपने परिजनों के नाम बांट दी। लब्बोलुआब यह कि राजकोष से तो गोरक्षा के नाम पर करोड़ों रुपए खर्च होते रहे लेकिन गायों की मौत का सिलसिला न तो अखिलेश सरकार के कार्यकाल में थमा और न ही मौजूदा योगी सरकार के कार्यकाल में।
होना तो यही चाहिए था कि गोरक्षा के नाम पर करोड़ों की ग्रांट डकारने वाली संस्था के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई की जानी चाहिए लेकिन प्रभावी कार्रवाई तो दूर की बात जांच के आदेश तक नहीं दिए गए, सिर्फ यह हुआ कि मीडिया में चर्चा के पश्चात उक्त संस्था की ग्रांट रोक दी गयी, परिणामस्वरूप कान्हा उपवन में पशुओं की मौत का सिलसिला अनवरत जारी है जिसमें भारी संख्या में गायों की संख्या बतायी जा रही है।

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