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CAA से जुड़ी फाइलों को सार्वजनिक करने से सरकार ने किया इनकार, कहा विदेशी संबंध खराब हो जाएंगे

CAA से जुड़ी फाइलों को सार्वजनिक करने से सरकार ने किया इनकार, कहा विदेशी संबंध खराब हो जाएंगे

देशभर में एनआरसी और सीएए को लेकर विरोध प्रदर्शन चल रहा है। खासकर सीएए को लेकर लोगों के मन में बहुत सारे सवाल हैं। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सीएए को लेकर लोगों के मन में उठ रहे सवालों का जवाब देने से इनकार कर दिया है। मंत्रालय ने कहा है कि सीएए से जुड़ी फाइलों को सार्वजनिक करने से विदेशी राष्ट्रों से रिश्ता खराब हो सकते हैं।

दरअसल, ‘द वायर’ न्यूज़ साइट ने सूचना के अधिकार तहत इससे जुड़ी चीजों को जानने की कोशिश की थी।  ‘द वायर’ ने 25 दिसंबर, 2019 को RTI डाली थी। आवेदन में नागरिकता संशोधन विधेयक को कैबिनेट से पास कराने से जुड़ी फाइलों के बारे में जानकारी मांगी गई थी। खासकर उन सभी दस्तावेजों, रिकॉर्ड्स, फाइल नोटिंग्स, पत्राचार की प्रति मांगी थी जिसके आधार पर इस विधेयक को तैयार लिया गया था।

जिसके जवाब में गृह मंत्रालय ने बोगस आधार पर जवाब देने से मना कर दिया है। 29 फरवरी को गृह मंत्रालय के केंद्रीय जन सूचना अधिकारी (सीपीआईओ) ने अपने जवाब में जानकारी देने से मना कर दिया। सीपीआईओ ने कहा कि इसकी जानकारी सार्वजनिक करने से विदेशी राज्यों के साथ भारत के संबंध खराब हो सकते हैं। गृह मंत्रालय ने अपने जवाब में लिखा, “ये फाइलें विदेशी नागरिकों को नागरिकता देने की नीतियों से जुड़ी हुई हैं। ऐसी जानकारी का खुलासा करने से विदेशी राज्यों के साथ संबंध खराब हो सकते हैं। इसलिए RTI एक्ट, 2005 की धारा 8(1)(अ) के तहत इस जानकारी का खुलासा करने से छूट प्राप्त है।”

उसके बाद ‘द वायर’ की ओर से एक अन्य RTI दर्ज की गई। जिसमें नागरिकता संशोधन बिल को कैबिनेट से पास कराने से जुड़ी सभी फाइलों का निरीक्षण (इंस्पेक्शन) करने की मांग की गई। इस RTI के जवाब में भी गृह मंत्रालय ने यही जवाब में यही दिया गया कि इस मामले में कोई भी जानकारी सार्वजनिक नहीं की जा सकती। आपको बता दें कि हफपोस्ट इंडिया न्यूज़ ने भी आरटीआई दायर की थी और जानकारी की मांग की थी। लेकिन उन्हें भी वही जवाब दिया गया जो द वायर को दिया गया।

इस बारे में RTI कार्यकर्ता और पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त शैलेष गांधी का कहना है कि जनसूचना अधिकारी को विस्तार से ये जरूर बताया जाना चाहिए कि किस तरह ऐसी जानकारी का खुलासा करने से विदेशों के साथ रिश्ते खराब होंगे। शैलेष गांधी ने आगे कहा, “जन सूचना अधिकारी ने कोई उचित कारण नहीं बताया है कि किस तरह से ये जानकारी किसी को नुकसान पहुंचा सकती है। दूसरी तरफ ये स्पष्ट है कि अगर जनता को ये जानकारी मिलती है कि किस आधार पर कैबिनेट ने इस विधेयक को पारित करने का फैसला लिया था, तो यह एक बेहतर और सार्थक लोकतंत्र का निर्माण करने में मदद करेगा और अंतत: आम जनता की जरूरतें पूरी होंगी।”

वहीं सूचना आयुक्त दिव्य प्रकाश सिन्हा ने अपने फैसले में लिखा, “सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम के तहत सूचना देने से छूट प्राप्त धाराओं का मनमाने तरीके से उल्लेख करना गलत प्रचलन को बढ़ावा देता है।” आपको बता दें कि यदि सीपीआईओ धारा 8(1)(अ) का सहारा लेकर जानकारी देने से मना करता है तो धारा 10 के अनुसार उसकी जिम्मेदारी बनती है वे फाइलों के उस हिस्से को सार्वजनिक करें जो किसी छूट के दायरे में नहीं आता है।

ये काम फाइल के उस हिस्से को ‘काला करके’ किया जाता है। ‘द वायर’ का कहना है कि गृह मंत्रालय से ये भी नहीं किया गया है। इसपर पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त और बेनेट यूनिवर्सिटी के डीन एम. श्रीधर आचार्युलु का कहना है कि जनसूचना अधिकारी को ‘पृथक्करण का सिद्धांत’ को अपनाना चाहिए था और ऐसी जानकारी दी जानी चाहिए थी जो कि धारा 8(1)(अ) के तहत नहीं आती है।

‘द वायर’ द्वारा एक और RTI दर्ज की गई थी। उसमें पूछा गया था कि धार्मिक उत्पीड़न की वजह से पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बाग्लादेश से आए लोगों की संख्या कितनी है। साथ ही इन देशों से आए कितने लोगों को लंबे अवधि वाला वीजा (लॉन्ग टर्म विजा) दिया गया है। इन सारे सवालों के साथ 23 दिसंबर, 2019 को ‘द वायर’ के द्वारा आरटीआई आवेदन दर्ज किया गया था। जिसका जवाब गृह मंत्रालय ने करीब डेढ़ महीने बाद चार फरवरी 2020 को दिया। जिसमें कहा गया कि ये मामला इमिग्रेशन ब्यूरो से जुड़ा हुआ है और इसे आरटीआई एक्ट की धारा 6(3) के तहत वहां ट्रांसफर किया जाता है।

जबकि कानून के मुताबिक अगर जनसूचना अधिकारी को लगता है कि विषय किसी अन्य विभाग से जुड़ा है तो पांच दिन के भीतर धारा 6 (3) के तहत उस संबंधित विभाग को RTI ट्रांसफर कर दी जाती है। जबकि यहां ऐसा नहीं किया गया।

अब सवाल उठता है कि आखिर ऐसा क्यों कहा जा रहा है कि सीएए को लेकर कोई भी जानकारी सार्वजनिक नहीं की जा सकती। हवाला ये दिया जाना कि विदेशी राष्ट्रों से रिश्ते खराब हो सकते हैं। ये कैसा दलील है। जबकि गृहमंत्री अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद बैठक से लेकर अपनी रैलियों में कई बार ये कहा है कि चूंकि पाकिस्तान, अफगानिस्ता और बांग्लादेश में गैर-मुस्लिमों को काफी प्रताड़ना सहना पड़ रहा है इसलिए नागरिकता संशोधन कानून के तहत उन्हें भारत की नागरिकता दी जाएगी। क्योंकि उन राष्ट्रों में धर्म के आधार पर पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश करोड़ों लोगों की हत्या की गई है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस पर पिछले दिनों हमला करते हुए ये तक कहा था कि हर देशवासी का एक सवाल है कि लोग पाकिस्तान के खिलाफ क्यों नहीं बोलते हैं, बल्कि रैली निकालते हैं? पाकिस्तान की स्थापना धार्मिक आधार पर की गई है, जिसके कारण अल्पसंख्यकों जैसे कि हिंदू, सिख, जैन और ईसाई पर अत्याचार बढ़े हैं। लेकिन कांग्रेस और उनके सहयोगी पाकिस्तान के खिलाफ नहीं बोलते।

प्रधानमंत्री ने ये भी कहा था कि अगर आपको (कांग्रेस) प्रदर्शन करना है तो पाकिस्तान में पिछले 70 सालों में हुए अन्याय के खिलाफ आवाज उठाइए। अब पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेनकाब करने की जरूरत है। हाल ही में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार ने सुप्रीम कोर्ट में एनआरसी को लेकर शिकायत दर्ज की थी। जिसके जवाब में ये कहा गया था कि ये हमारा आंतरिक मामला है।

संयुक्त राष्ट्र ने कई मौकों पर कहा है कि सीएए मौलिक रूप से भेदभावपूर्ण है और यह भारत द्वारा अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत की गई प्रतिबद्धताओं का उल्लंघन करता है। जहां आप एक तरफ ये कहते हैं कि ये मामला आंतरिक है। दूसरी तरफ विदेशी राज्यों के साथ संबंध खराब होने का हवाला देते हैं। विधेयक से संबंधित दस्तावेजों को सार्वजनिक करने से इनकार कर देते हैं। इसका क्या मतलब हो सकता है। आखिर सरकार सीएए को लेकर दस्तावेजों को दिखाने से क्यों इनकार कर रही है? सवाल है कि क्या सरकार के पास भी लोगों के मन में उठने वाले शंकाओं का जवाब नहीं हैं?

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