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कोरोना का सच उजागर करने पर पत्रकारों को सजा दे रही सरकार, 11 पत्रकारों पर 19 FIR

कोरोना का सच उजागर करने पर पत्रकारों को सजा दे रही सरकार, 11 पत्रकारों पर 19 FIR
इतना सच बोल कि होंटों का तबस्सुम न बुझे,
रौशनी ख़त्म न कर आगे अँधेरा होगा”

मशहूर शायर निदा फ़ाज़ली की यह बात आजकल के सच्चे पत्रकारों को प्रेरणा देती नजर आती हैं। खासकर उन पत्रकारों को जो सरकार की चाटुकारिता से परे रहकर सच का आइना दिखा रहे हैं। देश में कोरोना महामारी के बीच सरोकारी पत्रकारिता पर भी संकट के बादल उमड़ने लगे हैं। हर कोई सरकार की गुणगान गाथा में व्यस्त हैं।

लेकिन इस सबके बीच ऐसे भी पत्रकार हैं जो आज भी सच के साथ खड़े हैं। ऐसे पत्रकारों का सच दिखाना सरकार को हजम नहीं हो रहा है। ऐसे में पत्रकारों की देश में प्रताड़ना सामने आ रही है। सरकार उन्हें सच लिखने की सजा दे रही है। फलस्वरूप देश में पिछले डेढ़ महीने के दौरान 11 पत्रकारों पर 19 मुकदमें दर्ज कराएं जा चुके है।

पत्रकारों पर जुल्म की दास्तान की शुरुआत करते हैं देश के प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी के गृह प्रदेश गुजरात से। जहां गुजरात के एक न्यूज पोर्टल ‘फेस ऑफ नेशन’ के संपादक धवन पटेल ने अपने पोर्टल पर यह ख़बर चलाई थी कि बीजेपी आलाकमान राज्य के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी को उनके पद से हटा सकता है और उनकी जगह केंद्रीय मंत्री मनसुख मंडाविया को ला सकता है। पटेल ने राज्य में नेतृत्व परिवर्तन की संभावना वाली यह ख़बर अपने न्यूज़ पोर्टल पर चलाई थी।

इसमें दावा किया गया था कि मनसुख मंडाविया को भाजपा हाईकमान ने राज्य में नेतृत्व परिवर्तन के बारे में चर्चा करने के लिए बुलाया है। ख़बर में यह भी दावा किया गया था कि रूपाणी जिस तरह कोरोना महामारी को हैंडल कर रहे हैं, उससे पार्टी हाई कमान उनसे ख़ुश नहीं है। इसके चलते धवन ने नेतृत्व परिवर्तन की बातें लिखी थी। लेकिन गुजरात सरकार को धवन का यह आर्टिकल रास नहीं आया।

इस खबर ने उस समय ज्यादा तूल ले लिया जब बाद में कई गुजराती न्यूज चैनलों ने भी यह खबर चलाकर चर्चाओं को पर लगा दिए। इसके बाद मामला इतना बढ गया कि खुद मनसुख मांडविया को सामने आना पडा। मनसुख मांडविया ने खबर का खंडन किया।

उन्होंने ट्वीट कर कहा कि आज सभी कोरोना का सामना कर रहे हैं। गुजरात भी इससे जूझ रहा है। ऐसे समय में नेतृत्व परिवर्तन की अफवाहें फैलाना गुजरात के हितों का नुकसान पहुंचाने का काम है। जनता से अपील है कि कोरोना के साथ ही अफवाहों से भी दूर रहें। याद रहे कि मनसुख मांडविया गुजरात से राज्यसभा सांसद है और फिलहाल वह केंद्र में रसायन और उर्वरक राज्यमंत्री है। इसके बाद गुजरात सरकार ने धवन पटेल पर राजद्रोह का मुकदमा दायर कर दिया।

इसके बाद होती है राजनीति शुरू। एक पत्रकार पर राजद्रोह के मामले पर विपक्ष को सरकार पर वार करने का भी मौका मिल गया। कांग्रेस नेता शक्ति सिंह गोहिल ने कहा कि गुजरात सरकार ने कायरतापूर्ण कदम उठाया है। उन्होंने सुब्रह्मण्यम स्वामी के ट्वीट की फोटो पोस्ट करते हुए लिखा कि सीएम विजय रुपाणी की कायरतापूर्ण कार्रवाई पर गुजरात हैरान है।

सीएम के निर्देश पर गुजरात पुलिस ने एक स्थानीय वेबसाइट के एडिटर धवल पटेल को गैर जमानती धारा के तहत गिरफ्तार किया। रुपाणी जी, यदि आपके नेतृत्व की आलोचना करना अपराध है, तो सुब्रह्मण्यम स्वामी के खिलाफ केस क्यों नहीं? यहा यह भी उल्लेखनीय है कि स्वामी ने 8 मई को ट्वीट किया था। इसमें उन्होंने आनंदीबेन पटेल को गुजरात की सीएम बनाने की पैरवी की थी।

अब आइए आपको बता दे कि खबर लिखने के अपराध में गुजरात सरकार ने जिस पत्रकार पटेल पर राजद्रोह का मुकदमा दायर किया वह होता क्या है। राजद्रोह का क़ानून अंग्रेज़ों के ज़माने में बना था ताकि भारतीयों की आवाज़ को दबाया जा सके और इसीलिए उसमें लिखा गया था कि ‘सरकार के प्रति नफ़रत पैदा करने वाली’ किसी भी बात या हरक़त के लिए राजद्रोह का मामला दायर किया जा सकता है।

देश की आज़ादी के बाद भी इस क़ानून को नहीं हटाया गया। जबकि केदारनाथ सिंह बनाम बिहार राज्य (1962) के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ किया है कि 124 (ए) के तहत किसी के ख़िलाफ़ राजद्रोह का मामला तभी बनता है जबकि किसी ने सरकार के ख़िलाफ़ हिंसा की हो या हिंसा के लिए उकसाया हो। लेकिन यहां स्पष्ट है कि पत्रकार धवल पटेल ने ना तो सरकार के खिलाफ हिंसा की और न ही हिंसा के लिए किसी को उकसाने का काम किया। उन्होंने तो सिर्फ एक कयासों के आधार पर पोलिटिकल न्यूज लिखी। सरकार को इस न्यूज में राजद्रोह नजर आया और उसने पत्रकार पर राजद्रोह का मुकदमा दायर कर दिया।

हालांकि, इसके खिलाफ देशभर के पत्रकार संगठन मुखर हो उठे हैं। नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (इंडिया) के अध्यक्ष रास बिहारी व महासचिव प्रसन्ना मोहंती और दिल्ली जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष राकेश थपलियाल व महासचिव के.पी. मलिक ने बुधवार को यहां जारी एक बयान में कहा है कि वे गुजरात के मुख्यमंत्री के बारे में खबर छापने पर पत्रकार की गिरफ्तारी का विरोध करते हैं।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को संगठन की तरफ से भेजे गए पत्र में कहा गया है कि हो सकता है कि यह खबर पूरी तरह से तथ्यों पर आधारित न हो, पर कोई यह तो विचार रख सकता है कि मुख्यमंत्री महामारी का प्रकोप रोकने में असफल रहे और मंडाविया बेहतर काम कर सकते थे। राजद्रोह और आपदा प्रबंधन कानून के तहत धवल पटेल की गिरफ्तारी उचित नहीं है। पत्रकार की इस तरह से गिरफ्तारी को लेकर मीडिया बिरादरी में नाराजगी है। गुजरात के पत्रकार भी गिरफ्तारी का विरोध कर रहे हैं।

अब आपको ले चलते हैं देश की राजधानी दिल्ली में। यहां द इंडियन एक्सप्रेस के विशेष संवाददाता महेंद्र मनराल ने एक ख़बर लिखी थी। जिसमें उन्होंने दिल्ली पुलिस के अधिकारियों के हवाले से कहा था कि तब्लीग़ी जमात के प्रमुख मौलाना साद के वायरल ऑडियो के साथ छेड़छाड़ हुई थी और इसे 20 से ज़्यादा ऑडियो क्लिप्स को जोड़कर बनाया गया था। इस मामले में मनराल को 10 मई को दिल्ली पुलिस द्वारा नोटिस जारी किया गया था। दिल्ली पुलिस ने मनराल से कहा है कि अगर वह जांच में शामिल नहीं होते हैं तो उनके ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई की जाएगी।

दिल्ली पुलिस के इस तानाशाही पूर्ण रवैया से पत्रकारों की संस्था गिल्ड ने नाराज़गी व्यक्त की है। एक बयान में गिल्ड ने कहा है कि दिल्ली पुलिस का यह रवैया अहंकारी और मनमानी वाला है। अपने बयान में गिल्ड ने कहा है कि गुजरात और दिल्ली में पुलिस की कार्रवाई के ये उदाहरण काफी परेशान करने वाले हैं। गिल्ड का यह भी कहना है कि सरकार और पुलिस को यह समझना चाहिए कि मीडिया किसी भी लोकतंत्र में शासन संरचना का एक अभिन्न अंग है। गिल्ड ने इन कदमों की निंदा करते हुए केंद्र और राज्य सरकारों को कहा कि प्रेस को डराने के लिए कानून का गलत इस्तेमाल न करें।

अब रूख करते हैं देवभूमि हिमाचल प्रदेश का। हिमाचल प्रदेश के अखबार ‘दिव्य हिमाचल’ के 38 वर्षीय रिपोर्टर ओम शर्मा के खिलाफ अब तक तीन एफआईआर दर्ज की जा चुकी हैं। उन पर पहली एफआईआर 29 मार्च को सोलन जिले के बद्दी में प्रवासी मजदूरों के प्रदर्शन का फेसबुक लाइव करने के कारण दर्ज की गई थी।

मौके पर पुलिस अधिकारियों और स्थानीय नेताओं के पहुंचने और प्रवासी मजदूरों के साथ उनकी बातचीत के कारण यह फेसबुक लाइव सोशल मीडिया पर वायरल हो गया था। जिसके बाद वीडियो को सनसनी या फेक न्यूज बताते हुए एफआईआर दर्ज करा दी गई।

इसके अलावा शर्मा के खिलाफ दूसरी एफआईआर 26 अप्रैल को फेसबुक पर एक मीडिया संस्थान की खबर शेयर करने के चलते दर्ज की गई, जिसे उक्त मीडिया संस्थान ने सरकार द्वारा खंडन के बाद हटा लिया था। यही नहीं बल्कि शर्मा पर तीसरा मामला भी दर्ज हुआ। तीसरा मामला 27 अप्रैल को बद्दी, बरोटीवाला और नालागढ़ में कर्फ्यू में ढील दिए जाने के जिलाधिकारी के आदेशों में अस्पष्टता की फेसबुक पर आलोचना करने पर दर्ज किया गया।

शर्मा की तरह ही समाचार चैनल ‘न्यूज 18 हिमाचल’ के 34 वर्षीय रिपोर्टर जगत बैंस के खिलाफ भी लॉकडाउन के दौरान प्रशासन की कमियों को उजागर करने के लिए पिछले 50 दिन में तीन एफआईआर दर्ज की गई हैं। हिमाचल प्रदेश के ही मंडी के 44 वर्षीय पत्रकार अश्वनी सैनी के खिलाफ लॉकडाउन के दौरान पांच मामले दर्ज किए गए हैं।

एक राष्ट्रीय समाचार चैनल से जुड़े डल हाउस के पत्रकार विशाल आनंद के खिलाफ दो एफआईआर दर्ज की गई हैं। उन पर दूसरी एफआईआर, पहली एफआईआर दर्ज किए जाने पर प्रशासन की आलोचना करने के कारण दर्ज की गई थी। इसके अलावा मंडी में ही पंजाब केसरी के पत्रकार सोमदीव शर्मा के खिलाफ भी एक मामला दर्ज किया गया है।

ध्यान रहे कि इन सभी पत्रकारों पर लगभग एक जैसी धाराओं में मामला दर्ज किया गया है। इनमें झूठी चेतावनी के लिए सजा का प्रावधान करने वाले आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के अनुच्छेद 54, भारतीय दंड संहिता की धाराओं- 182 (झूठी सूचना), 188 (एक लोक सेवक के आदेश की अवज्ञा), 269 (एक खतरनाक बीमारी का संक्रमण फैलाने के लिए लापरवाही से काम करने की संभावना), 270 (किसी जानलेवा बीमारी को फैलाने के लिए किया गया घातक या फिर नुकसानदायक काम) और धारा 336 (जीवन या दूसरों की व्यक्तिगत सुरक्षा को खतरे में डालना), सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 66 समेत कई अन्य धाराएं में मुकदमें दर्ज कराएं गए है।

अब आपको ले चलते हैं उत्तर प्रदेश में । जहां योगी आदित्यनाथ की सरकार है। योगी आदित्यनाथ की सरकार पत्रकारों की कलम का गला घोटने के लिए आए दिन चर्चाओं में रहती है। फिलहाल में अयोध्या में एक मामले को लेकर चर्चा में है । अयोध्या के स्थानीय पत्रकारों ने 29 अप्रैल को एक न्यूज़ प्रकाशित की न्यूज़ का शीर्षक था ‘भूख से साधु की मौत, पोस्टमार्टम रिपोर्ट से बचने के लिए पुलिस ने शव को फेंका सरयू में’ । इस खबर के प्रकाशित होने के बाद जैसे अयोध्या नगरी में आग लग गई।

आनन-फानन में ही इस खबर को फर्जी घोषित करने के लिए पुलिस द्वारा कुछ साधुओं से तहरीर लिखवा ली गई। मजे की बात यह थी कि जिन अनपढ़ साधुओं ने तहरीर लिखी वह बहुत ही सुंदर लेख में थी और उस पर ना कोई पुलिस चौकी ना कोई थाने की रिसीविंग थी। इसके बावजूद भी साधु की भूखे मरने की मौत की फेक न्यूज लिखने के आरोप में तीन पत्रकारों पर अयोध्या पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर लिया।

जिनमें से तुफैल जो की 5 समाचार पोर्टल का संचालक है, दूसरा पत्रकार स्कंददास उर्फ दिलीप मोर्य जो समाचार रिपोर्टर है और तीसरा इंडियन टाइम्स समाचार का पत्रकार। इन तीनों के खिलाफ 310/20 आई.पी.सी धारा188 और 505 (2), डिजास्टर मनागेम्नेट एक्ट के तहत धारा 54 के तहत मुकदमे दर्ज किए गए। साथ ही कहा गया कि उस 80 वर्षीय साधू की मौत स्वाभाविक कारणों से हुई थी। यह शिकायत बकायदा सुखदेव गिरी जो स्वर्गीय मैनहंट प्रेम गिरी के शिष्य है के नाम से पत्रकारों के खिलाफ दर्ज कराई गई।

यही नहीं बल्कि अयोध्या पुलिस ने अपने आधिकारिक ट्विटर अकाउंट से इस घटना का स्पष्टीकरण दिया। उन्होंने ट्वीट में लिखा है कि “थाना को अयोध्या क्षेत्र अन्तर्गत एक साधू की स्वाभाविक मृत्यु के संम्बन्ध में फेक न्यूज चलाने पर साधुओं द्वारा प्राप्त तहरीर के आधार पर थाना स्थानीय पर सुसगंत धाराओं में मु0अ0सं0 310/20 अभियोग पंजीकृत। उक्त के संम्बन्ध में CO अयोध्या की बाईट।

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