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सरकार का अब ओटीटी पर ‘तांडव’’

हरिनाथ कुमार

ओटीटी (ओवर द टॉप) प्लेटफार्म के इतिहास में ‘तांडव’ पहली वेब सीरीज है जिसे प्रदर्शित होने से पहले सरकार के निर्देश पर अपने कंटेंट को संपादित करना पड़ा। इसी के साथ ओटीटी के जरिए अभिव्यक्ति की आजादी पर अंकुश लगाने का सिलसिला चल पड़ा है। सरकार भी मानती है कि सिनेमा समाज को बदल सकता है, लेकिन सरकार यह नहीं मानती कि सिनेमा समाज का दर्पण है। तभी तो सरकार को सिनेमा पर अपनी कैंची चलाती रहती है। क्योंकि कोई भी सरकार या सत्ता हो तर्कशील समाज नहीं पसंद करती। अलबत्ता समाज में ‘भक्त’ पैदा करने के लिए प्रपंच करती रहती है। तर्कशील समाज और इससे संबंधी उत्पाद सरकार की आंखों में हमेशा चुभते हैं। यही कारण है कि सरकार समाज के अभिव्यक्ति के हर स्वरूप पर हमाला करने के लिए अमादा रहती है।
दरअसल अभी तक अभिव्यक्ति की आजादी पर जितने प्रतिबंध लगाए गए हैं का इतिहास ब्रिटिश शासनकाल से याद किया जाता है। क्योंकि इसी शासनकाल में जेम्स एगस्टस हिक्की ने पहला समाचार पत्र ‘बंगाल गजट’ प्रकाशित किया और ईस्ट इण्डिया कंपनी के द्वारा उसे इताना सताया गया कि उसे मजबूरन बंगाल गजट को बंद करना पड़ा। यहीं से अभिव्यक्ति की आजादी को रौंदने की प्रक्रिया की औपचारिक शुरुआत हुई। फिर नित नए समाचार पत्रों को प्रकाशित होते देख ब्रिटिश सरकार इन्हें दबोचने के लिए दम पे दम कानून लाती रही। 1857 की क्रांति से बौखलाई ब्रिटिश सरकार ने गैगिंग एक्ट परित किया। इस एक्ट के मुताबिक किताबों तक के प्रकाशित करने के लिए लाइसेंस और सरकार की अनुमति की जरूरी हो गई थी। आजादी की क्रांति का रूवरूप बढ़ता देख ब्रिटिश सरकार के हाथ-पांव फूलते जा रहे थे। फलस्वरूप 1860 में भारतीय दण्ड संहित और राजद्रोह जैसे कानून को पारित करना पड़ा।
उस दौर में अभिव्यक्ति प्रिंट माध्यमों तक सीमित थी। लेकिन जैसे-जैसे तकनीक का विकास होता गया, अभिव्यक्ति का माध्यम बदलता गया। इस अभिव्यक्ति को लूमियर्स ब्रदर ने एक नया आयाम दे दिया। सिनेमा के माध्यम से अभिव्यक्ति का ज्वार जो फूटा उसे लोकतांत्रिक सरकारें भी न संभाल सकीं। लिहाजा सेंसरशिप लागू करना पड़ा। इस कानून के मुताबिक पब्लिक स्क्रिनिंग के लिए सरकार सिनेमा को प्रमाणित करने लगीं कि उसे किस वर्ग/श्रेणी के लोग देखेंगे। संविधान उल्लिखित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बावजूद लोकतांत्रिक सरकारें भी अभिव्यक्ति का दमन करने पर आमादा रहती हैं। इसे समझने के लिए हाल की घटनाओं के लेते हैं।

देश का युवा जिससे ज्यादा दिग्भ्रमित हो रहा है वह है फेक न्यूज। इस फेक न्यूज के खाद और उर्वरक इंटरनेट, न्यूज पोर्टल और सोशल मीडिया हैं। जिस पर अंकुश लेगाने के लिए सरकार की अभी कोई मंशा नहीं है। फेक न्यूज की जो फैक्टरी हैं पर सरकार अभी लगाम नहीं लगा सकती क्योंकि इसमें सरकार के हित भी शामिल हैं। जहां सरकार के हित नहीं होते हैं वहीं सरकार अपना सख्त रूप अख्तियार करती है। मसलन तांडव वेब सीरीज में जीशान अयूब और उनके किरदार से भक्तों को नफरत है।
दरअसल तांडव वेब सीरीज के पहले ही एपिसोड में एक्टर जीशान अयूब भगवान शिव के कैरेक्टर में दिखते हैं। यह यूनिवर्सिटी के थिएटर का एक सीन है, जिसमें मंच संचालक उनसे पूछता है कि भोलेनाथ कुछ करिए। रामजी के फॉलोअर्स तो लगातार सोशल मीडिया पर बढ़ते ही जा रहे हैं। इस पर जीशान अयूब कहते हैं, क्या करूं अपनी प्रोफाइल पिक चेंज कर दूं। इस पर मंच संचालक कहता है कि इससे कुछ नहीं होगा। आप कुछ अलग करिए। इस सीन को लेकर पूरा विवाद हो रहा है। हालांकि तांडव वेब सीरीज़ के निर्माताओं ने आख़रिकार सीरीज़ से विवादित दृश्य निकाल दिए और लोगों की भावनाओं को आहत करने के लिए माफ़ी भी मांग ली। सवाल यह है कि क्या ऐसी अभिव्यक्ति से भारत आहत होता है? क्या यह अभिव्यक्ति आंतरकि सुरक्षा की दृष्टि से खतरनाक है? क्या इस अभिव्यक्ति से समाज के आराध्य स्तरहीन हो जाते हैं? क्या इस अभिव्यक्ति से देश की विकास दर प्रभावित होती है?
(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के भारती कॉलेज में अतिथि प्राध्यापक हैं।)

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