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चारधाम यात्रा पर आने वाले देश-विदेश के श्रद्धालु भगवान भरोसे हैं। व्यवस्थाओं को लेकर राज्य की त्रिवेंद्र रावत सरकार की तैयारियों का हाल यह है कि यात्रा के प्रवेशद्वार हरिद्वार में ही सुविधाओं की भारी कमी है। यहां के सरकारी अस्पतालों में न तो डॉक्टर हैं और न ही चिकित्सा सुविधाएं। यह हाल तब है जबकि सांसद, प्रदेश के कैबिनेट मंत्री, विधायक, मेयर और तमाम पार्षद तीर्थ नगरी में ही रहते हैं। जनसुविधाओं के प्रति जनप्रतिनिधियों की चुप्पी और सरकार की उदासीनता स्थानीय लोगों के साथ ही तीर्थ यात्रियों के लिए भी मुसीबत की वजह बनेगी
अक्षय तृतीया के शुभ अवसर पर राज्य में चारधाम यात्रा शुरू हो चुकी है। देश-विदेश के श्रद्धालु तीर्थ स्थलों के दर्शन करने को उत्सुक हैं। लेकिन डबल इंजन वाली त्रिवेंद्र रावत सरकार तीर्थयात्रियों के लिए सुविधाओं की व्यवस्था करने में विफल दिखाई दे रही है। जब तीर्थ यात्रा के प्रवेशद्वार ‘हरिद्वार’ में ही सुविधाएं नहीं तो अन्य जगहों का भगवान ही मालिक है। यात्रा सीजन प्रारंभ होते ही लाखों तीर्थयात्री धर्म नगरी हरिद्वार का रुख करते हैं। कायदे से उन्हें सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए समय पर तैयारियां शुरू कर देनी चाहिए, परंतु अब तक शासन-प्रशासन का उदासीन रवैया सामने आ रहा है। यात्रा प्रारंभ होने तक सरकारी स्तर पर होने वाली तैयारियां कहीं नजर नहीं आई। ऐसे में धर्मनगरी हरिद्वार की सड़कों में बने बड़े-बड़े गड्ढे तीर्थयात्रियों को हिचकौले खाने को विवश करेंगे। धर्मनगरी के संपर्क मार्ग बहुत ही टूटी-फूटी हालत में हैं। यात्रा कैसे सकुशल संपन्न होगी इस पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है।
धर्मनगरी आने वाले तीर्थयात्रियों को स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने में राज्य सरकार का बेहद उदासीन रवैया है। अस्पतालों में चिकित्सकों की भारी कमी एवं स्वास्थ्य उपकरणों का ठप होना निश्चित ही तीर्थयात्रियों के लिए मुसीबत का सबब बनेगा। कहने को तो स्वास्थ्य सुविधाओं के नाम पर धर्मनगरी हरिद्वार में दो बड़े सरकारी अस्पताल हैं, परंतु इन अस्पतालों में सुविधाओं का भारी टोटा है। इसके कारण स्थानीय नागरिकों को और तीर्थ यात्रियों के अच्छे इलाज के लिए निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ता है। सुविधाओं के अभाव में दोनों सरकारी अस्पताल रेफरल सेंटर की पहचान बना चुके हैं। अब चारधाम यात्रा सिर पर है, तो राज्य सरकार स्वास्थ्य सुविधाओं में बढ़ोतरी करने के बजाय कटौती करने में लगी हुई है।
हरिद्वार के सरकारी अस्पतालों का यह हाल तब है जब नगर निगम क्षेत्र में चुने गए जनप्रतिनिधियों की लंबी चौड़ी फौज है। प्रदेश के कैबिनेट मंत्री एवं राज्य सरकार के प्रवक्ता मदन कौशिक, हरिद्वार के प्रभारी मंत्री सतपाल महाराज, सांसद रमेश पोखरियाल ‘निशंक’, मेयर अनीता शर्मा और नगर निगम के 60 पार्षद, रानीपुर के विधायक आदेश चौहान, ग्रामीण क्षेत्र के विधायक स्वामी यतीश्वरनंद एवं ज्वालापुर के विधायक सुरेश राठौर हरिद्वार में रहते हैं। इसके अलावा और उत्तर प्रदेश की देवबंद विधानसभा सीट से विधायक का भी यह गृह नगर है।
बावजूद इसके अस्पतालों में सुविधाओं की कमी है। मेला अस्पताल कहने को तो 100 बेड वाला बड़ा अस्पताल है। लेकिन चिकित्सकों की भारी कमी और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की लापरवाह कार्यशैली के चलते आज जहां कुंभ मेला प्रशासन अस्पताल के बड़े हिस्से को कब्जा कर चुका है, तो वहीं एनआरएचएम (राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन)के नाम पर भी इस अस्पताल की आधी से ज्यादा बिल्डिंग कब्जाई जा चुकी है। 2004 में राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री स्वर्गीय नारायण दत्त तिवारी  के कार्यकाल में अर्ध कुंभ के दौरान यात्रियों की सुविधा को देखते हुए करोड़ों की लागत से इस अस्पताल का निर्माण कराया गया था। आज यह अस्पताल स्थानीय जनप्रतिनिधियों की उदासीनता के चलते अपनी दुर्दशा पर आंसू बहाता नजर आ रहा है। सिस्टम की लापरवाही के चलते सरकारी उपेक्षा का सबसे अधिक शिकार बने मेला अस्पताल में डॉक्टीरों की बात की जाए तो यहां अधीक्षक का पद रिक्त है। इसके साथ-साथ निश्चेतक, बाल रोग विशेषज्ञ, आर्थों सर्जन, चर्म रोग विशेषज्ञ, पैथोलॉजिस्ट, कार्डियोलॉजिस्ट सर्जन सहित अन्य चिकित्सकों के पद खाली पड़े हुए हैं। यही नहीं ईएमओ डॉक्टर के 3 पद स्वीकøत होने के बावजूद तीनों पद का रिक्त होना अपने आप में बड़ा सवाल है। चिकित्सकों के अलावा पैरामेडिकल स्टाफ की बात की जाए तो चीफ फार्मेसिस्ट के दो, ईसीजी टेक्नीशियन का एक, वाहन चालक का एक, डार्क रूम सहायक का एक, वार्ड ब्वॉय के सात और चौकीदार के 3 पद खाली पड़े हैं। अन्य स्टाफ की भी कमी है।
मेला अस्पताल में लगी डिजिटल एक्स-रे मशीन कई वर्षों से ठप पड़ी हुई है। अस्पताल के निर्माण के समय स्थापित की गई लिफ्ट आज तक चालू नहीं हो सकी है। अस्पताल में डॉक्टरों की कभी पर जनप्रतिनिधियों की चुप्पी आश्चर्यजनक है। अफसोसजनक बात यह है कि 100 बेड के इस बड़े अस्पताल में मरीजों को भर्ती करने की सुविधा मात्र इसलिए प्रारंभ नहीं की जा सकी है कि उनको देखने वाले डॉक्टर ही नहीं हैं। मेला अस्पताल के साथ-साथ हरिद्वार के सबसे महत्वपूर्ण हर मिलाप मिशन जिला चिकित्सालय में भी डॉक्टरों का टोटा बना हुआ है। जिला चिकित्सालय में प्रमुख अधीक्षक सहित मुख्य चिकित्सा अधीक्षक के पद काफी लंबे समय से रिक्त पड़े हुए हैं। चिकित्सकों की कमी झेल रहे अस्पताल में कोढ़ में खाज की कहावत भी डॉक्टर चरितार्थ कर रहे हैं। बाल रोग विशेषज्ञ के तौर पर तैनात डॉ ज्योति पाठक ने राजनीतिक पहुंच के बल पर अपने आप को जनपद देहरादून में सम्बद्ध करा रखा है। ज्योति पाठक के पति तथा हरिद्वार में रेडियोलॉजिस्ट पद पर तैनात डॉ मनोज उप्रेती को भी राज्य सरकार ने देहरादून में सम्बद्ध किया हुआ है। जिसके चलते हरिद्वार जिला चिकित्सालय में अल्ट्रासाउंड का कार्य ठप पड़ा हुआ है। हरिद्वार जिला चिकित्सालय में स्वीकøत चिकित्सकों के 25 पदों के सापेक्ष मात्र 12 डॉक्टर की तैनाती पूरी नियक्ति प्रक्रिया पर सवालिया निशान खड़ा करती है। प्रतिदिन वीआईपी ड्यूटी में भी चिकित्सकों को लगाए जाने के कारण रोगियों को भारी समस्या का सामना करना पड़ता है। हरिद्वार के इस बड़े सरकारी अस्पताल में तैनात पैरामेडिकल स्टाफ के पदों को लेकर भी स्थिति कुछ खास नहीं है। पैरामेडिकल कर्मचारियों के 18 पद रिक्त पड़े हुए हैं। ऐसे में चार धाम यात्रा का कुशल संचालन कैसे होगा, इस पर प्रश्न-चिन्ह लगता दिख रहा है। हरमिलाप जिला चिकित्सालय जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा का शिकार होकर अपनी दुर्दशा पर आंसू बहाता नजर आ रहा है।
पिछले दिनों जिला अधिकारी हरिद्वार दीपक रावत ने चारधाम यात्रियों की सुविधाओं के संबंध में अधिकारियों की लंबी-चौड़ी बैठक ली थी। बैठक के दौरान जिलाधिकारी ने हरिद्वार की टूटी- फूटी सड़कों को लेकर नाराजगी जाहिर करते हुए सड़क के गड्ढे नहीं भरने पर एनएच के अधिशासी अभियंता का वेतन रोकने के निर्देश दिए थे। साथ ही डीएम ने दुर्घटना की स्थिति में आकस्मिक स्थिति में घायलों को त्वरित उपचार दिए जाने के संबंध में अस्पतालों को तैयार रहने की हिदायत दी, लेकिन मेला अस्पताल और हरमिलाप मिशन जिला चिकित्सालय में चिकित्सकों एवं पैरामेडिकल स्टाफ की भारी कमी को लेकर जिलाधिकारी ने कोई कार्यवाही करना जरूरी नहीं समझा। जिला चिकित्सालय में तैनात अधिकतर चिकित्सक दबी जुबान में बताते हैं कि चिकित्सकों की कमी के कारण उन पर कार्य का अधिक बोझ रहता है। वे चिकित्सकों के रिक्त पड़े पदों के भरने की उम्मीद छोड़ चुके हैं। हरिद्वार के दोनों बड़े सरकारी अस्पतालों में चिकित्सकों और सुविधाओं की भारी कमी के चलते सवाल उठ रहा है कि यदि चारधाम यात्रा के दौरान कोई दुर्घटना होती है, तो पीड़ित को कैसे उपचार मिल पाएगा?

बात अपनी-अपनी

यात्रा प्रारंभ हो चुकी है और जिला चिकित्सालय डॉक्टरों की कमी से जूझ रहा है। शासन से डॉक्टर नहीं भेजे जा रहे हैं। हमारे पास पैथोलॉजिस्ट नहीं है, ब्लड बैंक में कोई डॉक्टर नहीं है, समस्या ही समस्या है। हम प्रत्येक माह शासन को लिखते हैं फिर भी डॉक्टर नहीं भेजे जा रहे हैं।
डॉ. राजकुमार, सीएमएस जिला चिकित्सालय हरिद्वार
मेला चिकित्सालय में डॉक्टरों की कमी तो है लेकिन क्या किया जा सकता है। हर माह शासन को रिपोर्ट भेजी जाती है। इसके अलावा हम क्या कर सकते हैं।
डॉ. राजेश गुप्ता, सीएमएस मेला अस्पताल हरिद्वार
हमारी ओर से यात्रा को लेकर सभी तैयारियां कर ली गई हैं। यात्रियों की सुविधा के लिए दो काउंटर संचालित किए जा रहे हैं। जहां तक जिला चिकित्सालय में डॉक्टर की कमी का सवाल है तो यात्रा के लिए प्रत्येक विभाग को जिम्मेदारी दी गई है। चिकित्सा सेवा का कार्य सीएमओ को देखना है। आप उनसे बात कीजिए।
सीमा नौटियाल, जिला पर्यटन अधिकारी हरिद्वार

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