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गाजियाबाद में सीवर ट्रीटमेंट प्लांट के नाम पर छह करोड़ रूपए का फर्जीवाड़ा 

 

गाजियाबाद नगर निगम और जल निगम के अनूठे संगम ने राजकोष को साढे़ छह करोड़ का चूना लगा दिया और ‘भ्रष्टाचार पर जीरो टाॅलरेंस’ का दावा करने वाली सरकार के नुमाइन्दे महज दर्शक मात्र बने रहे। करोड़ों के इस खेल के बाजीगर इतने शातिर है  कि एक पार्षद की शिकायत के बावजूद जिम्मेदार अधिकारियों और नेता-मंत्री तक को गच्चा देते चले आ रहे हैं। करोड़ों की बाजीगरी से जुडे मामले की जानकारी मुख्यमंत्री तक भी पहुंचायी जा चुकी है। इंतजार है तो बस  सख्त कार्यवाही का।

 

करोड़ों की लूट से जुड़ा ये मामला 70 एमएलडी क्षमता वाले सीवर ट्रीटमेंट प्लांट के ट्रीटमेंट से जुड़ा हुआ है। गाजियाबाद नगर निगम और जल निगम के जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों ने प्लांट के रिएक्टरों के पुनर्गठन के नाम पर साढे़ छह करोड़ से भी अधिक की रकम पर हाथ साफ कर दिया। करोड़ों की लूट से जुड़ा यह मामला दस्तावेजों के साथ प्रकाश में भी आया और जिम्मेदार अधिकारियों को लिखित व मौखिक रूप से सूचित भी किया गया। लगभग दो माह से अधिक का समय बीत जाने के बाद की स्थिति यह है कि लुटेरे ऐश कर रहे हैं और शहरों का गन्दा पानी धड़ल्ले से नदियों में प्रवाहित हो रहा है। बताते चलें कि डुंडाहेडा सीवर ट्रीटमेंट प्लांट का निर्माण नदियों में प्रवाहित होने वाले गंदे पानी को रोकने के लिए किया गया था।

गाजियाबाद नगर निगम पार्षद राजेन्द्र त्यागी का मुख्यमंत्री को भेजा गया शिकायती पत्र (दिनांक 30 अगस्त 2020) गाजियाबाद नगर निगम और जल निगम के कथित भ्रष्ट अधिकारियों के लिए मुसीबत का सबब बन चुका है। इस शिकायती पत्र में साढे़ छह करोड़ से भी अधिक की रकम को लूटे जाने का आरोप लगाया गया है। मुख्यमंत्री को भेजे गए इस शिकायती पत्र के साथ जिन दस्तावेजों को संलग्न किया गया है वे दस्तावेज करोड़ों की रकम के बंदरबाट की पुष्टि कर रहे हैं।
गौरतलब है कि सरकार नदियों में गंदे पानी के प्रवाह को रोकने के लिए हर सम्भव स्थानों पर सीवर ट्रीटमेंट प्लांट बनवा रही है। इतना ही नहीं पुराने और क्षमता के मुताबिक काम न करने वाले प्लांटों को अपग्रेड भी किया जा रहा है ताकि शहरों का गंदा पानी नदियों को प्रदूषित न कर सके। सरकार की योजना सही दिशा में है लेकिन जिन विभागों को अपग्रेड करने की जिम्मेदारी सौंपी गयी उन विभागों के जिम्मेदार अधिकारी सीवर ट्रीटमेंट प्लांट का ट्रीटमेंट करने के बजाए अपने आर्थिक साम्राज्य को बढ़ाने में ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। लूट की स्थिति यह है कि पूरी की पूरी दाल ही काली हो चुकी है।

ज्ञात हो नदियों के जल को स्वच्छ रखने के लिए भारत सरकार और यूपी सरकार नदियों में गिरने वाले गन्दे पानी को शोधित करने के लिए नगर निकाय और जल निगम को धन मुहैया कराती है। इसी क्रम में गाजियाबाद स्थित डुंडाहेडा सीवर ट्रीटमेंट प्लांट को अपग्रेड करने के लिए छह करोड़ उन्तालीस लाख छियासठ  हजार रुपए गाजियाबाद नगर निगम और जल निगम को आवंटित हुए। इन पैसों से 70 एमएलडी के रिएक्टरों को अपग्रेड कराया जाना था। इन पैसों से 70 एमएलडी के चारों रिएक्टरों को अपग्रेड करने के साथ ही यूएएसबी टाईप चारों रिएक्टरों की मरम्मत, टेस्टिंग, कमीशनिंग, गैस होल्डर, गैस बर्निंग एवं गैस यूटिलाइजेशन सिस्टम, सीवेज स्लज और गैस कन्वेयर सिस्टम का काम कराया जाना था। बताते चलें कि उक्त धनराशि गाजियाबाद नगर निगम की एक मीटिंग में 13वें वित्त आयोग के तहत आवंटित की गई थी ।

करोड़ों की रकम हड़पे जाने की कहानी यहीं से शुरू होती है। जल निगम के प्रोजेक्ट मैनेजर (सी एण्ड डीएस, नलकूप विंग, उत्तर प्रदेश जल निगम) ने एक पत्र (संख्या 84/कार्य04/07, दिनांक 19 फरवरी 2014) नगर आयुक्त (गाजियाबाद नगर निगम) को लिखा। जल निगम के प्रोजेक्ट मैनेजर द्वारा उपरोक्त कार्य को पूरा करने के लिए 639.66 लाख रूपयों की अग्रिम मांग रखी गयी। चूंकि यह काम मुख्यमंत्री के महत्वपूर्ण प्रोजक्टों में से एक था लिहाजा नगर निगम (गाजियाबाद) ने काम का आंकलन व पड़ताल किए बिना ही 13 मार्च 2014 को यह रकम चेक के माध्यम से जल निगम के नलकूप विंग को उपलब्ध करा दी। करोड़ों रूपए दिए जाने के बावजूद भी जब जल निगम के नलकूप विंग ने काम पूरा नहीं किया तो गाजियाबाद नगर निगम के महाप्रबंधक ने एक पत्र (संख्या 196/जलकल/2015-16, दिनांक 07 जुलाई 2015) परियोजना प्रबंधक (जल निगम) को लिखा। इस पत्र में अवगत कराया गया था कि प्रथम चरण में हैण्डओवर किए गए दो रिएक्टर, गैस यूटिलाइजेशन सिस्टम, 320 व 63 केवीए डबल फ्यूल जनरेटर, सीवेज स्लज बेड, कूलिंग टाॅवर एवं गैस कन्वेयर सिस्टम का कार्य 15 माह पूर्व धनराशि निर्गत करने के बावजूद पूरा नहीं हो सका है। बताते चलें कि इस सम्बन्ध में गाजियाबाद नगर निगम के अधिशासी अभियंता ने भी उक्त कार्य पूरा न होने के बाबत एक पत्र जल निगम के परियोजना प्रबंधक को लिखा था। गाजियाबाद नगर निगम के इन शीर्ष अधिकारियों के पत्र इस बात की पुष्टि करते हैं कि जल निगम ने अपना कार्य जिम्मेदारी के साथ पूरा नहीं किया।

शिकायतकर्ता का तो यहां तक कहना है कि करोड़ों रूपए प्राप्त हो जाने के लगभग डेढ वर्ष बाद तक जल निगम ने कोई काम नहीं किया। इसकी जानकारी तत्कालीन सरकार में सम्बन्धित विभाग के मंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक को दी जा चुकी थी। लुटेरों की पहुंच का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है कि गाजियाबाद नगर निगम के शीर्ष अधिकारियों की शिकायतें रद्दी की टोकरी में चली गयीं और सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट की स्थिति जस की तस बनी रही। ये स्थिति सिर्फ डेढ़ वर्ष बाद तक ही नहीं बल्कि जल निगम को धनराशि हस्तांतरित होने के लगभग साढे़ तीन वर्ष बाद तक बनी रही। इस सम्बन्ध में अन्तिम पत्राचार (संख्या 453/कार्य/-15/06) हुआ 10 सितम्बर 2015 को। इस अन्तिम पत्राचार के लगभग दो वर्ष पश्चात वर्ष 2017 में परियोजना प्रबंधक (जल निगम, नलकूप विंग) का एक पत्र (संख्या 674/कार्य-15/03 दिनांक 26 सितम्बर 2017) गाजियाबाद नगर निगम के महाप्रबंधक को भेजा जाता है। इस पत्र में अवगत कराया गया कि रिएक्टर के 3 के गौस कन्वेयर, फ्लायर, स्क्रबर सिस्टम एवं 320 व 63 केवीए फ्यूल जनरेटर की मरम्मत का कार्य पूरा हो चुका है लेकिन एसटीपी का गैस सिस्टम होल्डर पूरी तरह से खराब है जिसे नया लगाना पडे़गा। यह भी अवगत कराया गया कि होल्डर खराब होने के कारण गैस सिस्टम कार्य नहीं कर रहा। कहते हैं कि गलत करने वाला कोई न कोई भूल कर ही जाता है, इस मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ। परियोजना प्रबंधक (जल निगम) ने पत्र लिखने से पूर्व वह फाइल चेक नहीं की जिसमें यह पत्र (संख्या 350/कार्य-17/15, दिनांक 27 अगस्त 2014) इस बात की तस्दीक कर रहा था कि गैस होल्डर डोम आदि की मरम्मत का कार्य तीन वर्ष पूर्व ही पूरा किया जा चुका था। स्पष्ट है कि या तो पूर्व में उस कार्य को नहीं किया गया या फिर लूट की योजना बनाते समय जिम्मेदार अधिकारियों से चूक हो गयी।

ज्ञात हो उक्त पत्र जल निगम के महाप्रबंधक द्वारा गाजियाबाद नगर निगम को लिखा गया था। फर्जीवाडे़ की महत्वपूर्ण कड़ी में यह बताना जरूरी है कि जब गैस सिस्टम होल्डर पहले से ही खराब था तो गैस यूटिलाइजेशन सिस्टम, 320 व 63 केवीए, ड्यूल फ्यूल जनरेटर, सीवेज स्लज बेड, कूलिंग टावर एवं गैस कन्वेयर सिस्टम की रिपेयरिंग के नाम पर धनराशि व्यय कैसे दिखा दी गयी। बताते चलें कि ‘गैस होल्डर डोम’ के बगैर उपरोक्त कार्य पूरे ही नहीं किए जा सकते थे फिर भी कथित लुटेरों ने कागजों में वह कर दिखाया जो असम्भव था।  इस सम्बन्ध में एक्सपर्ट का कहना है कि यूएएसबी तकनीक के एसटीपी में मीथेन गैस जनरेट होती है जिसका उपयोग ड्यूल फ्यूल जनरेटर में ईंधन के रूप में किया जाता है। स्थिति यह है कि गैस होल्डर समाचार लिखे जाने तक नहीं बदला जा सका था। जिम्मेदार अधिकारियों द्वारा अपने बचाव में अवगत कराया गया कि गैस होल्डर का निरीक्षण न हो पाने की वजह से त्रुटि हुई। यहां यह बताना जरूरी है कि गैस होल्डर डोम में न तो स्लज होती है और न ही वह अण्डरग्राउण्ड होता है। ऐसे में मुख्य भाग अधिकारियों की नजरों से कैसे बचा रह गया? ये अपने आप में गंभीर अनियमितता की श्रेणी में आता है। अब स्थिति यह है कि जल निगम गैस होल्डर डोम की रिपेयरिंग करने के बजाए पूरे गैस सिस्टम को ही रिपेयर करने की बात कहकर आरोपों से पल्ला झाड़ रहा है। जो कर्मचारी मौके पर मौजूद हैं उनका कहना है कि किसी प्रकार का रिपेयरिंग कार्य हुआ ही नहीं। इस सम्बन्ध में विशेषज्ञों का कहना है कि गैस सिस्टम का असल काम एसटीपी में जनरेट होने वाली मीथेन गैस से ड्यूल फ्यूल जनरेटर चलाकर इलेक्ट्रिसिटी पैदा करना होता है। जब ड्यूल फ्यूल जनरेटर चला ही नहीं तो गैस सिस्टम और जनरेटर रिपेयर कैसे हो गया। जाहिर है कि जानकार व्यक्तियों ने बडे़ पैमाने पर अधिकारियों और विभाग के मंत्री को भ्रम में रखकर करोड़ों का गोलमाल कर डाला।

करोड़ों के बजट में घपले की शिकायत पर उच्च स्तरीय जांच शुरू की गयी। गाजियाबाद नगर निगम के नगर आयुक्त के निर्देश पर जलकल विभाग के महाप्रबन्धक और अधिशासी अभियंता (जल) द्वारा जांच की गयी। ये जांच पूरे एसटीपी प्रोजेक्ट को लेकर की गयी थी। ये जांच रिपोर्ट 07 जून 2018 को नगर आयुक्त कार्यालय भेज दी गयी थी। जांच रिपोर्ट में पाया गया कि जल निगम ने जिस एसटीपी की मरम्मत कार्य के करोड़ों रूपए फूंक दिए दरअसल वह एसटीपी करोड़ों खर्च के बाद भी सफेद हाथी के समान है। जांच के दौरान पानी की क्वालिटी में सुधार के बजाए और अधिक गिरावट देखने को मिली। गैस कलेक्शन सिस्टम की पाईप लाइन जगह-जगह टूटी मिली। जांच टीम को रियेक्टर के डिस्ट्रब्यूशन लाईन में लीेकेज नजर आया। रिएक्टर का स्टेबलाइजेशन तक नहीं किया जा सका था। इतना ही नहीं गैस यूटिलाइजेशन सिस्टम तक जांच के दौरान निष्क्रिय पाया गया। लब्बोलुआब यह है कि जो धन जिस कार्य के लिए आवंटित किया गया था दरअसल वह कार्य हुआ ही नहीं। जांच टीम ने भ्रष्टाचार की पुष्टि करके रिपोर्ट काफी पहले भेज दी थी फिर भी कार्रवाई नहीं हो सकी।

गाजियाबाद नगर निगम के पार्षद राजेन्द्र त्यागी ने शिकायती पत्र और तमाम दस्तावेजों के साथ मुख्यमंत्री को भेजे अपने शिकायती पत्र में स्पष्ट लिखा है कि एसटीपी की मरम्मत सिर्फ कागजों में करके जल निगम ने फर्जी रिपोर्ट भेज दी। बताते चलें कि यूपीपीसीबी की रिपोर्ट में शोधित किए गए जल की क्वालिटी जांच के दौरान पहले से भी अधिक खराब पायी गयी। एसटीपी के जिन-जिन खण्डों की मरम्मत करोड़ों खर्च की बात की गयी थी वे सभी खण्ड खराब मिले।

साढ़े छह करोड़ गटक गए अफसर-ठेकेदार

नमामि गंगे परियोजना के तहत सीवर के रास्ते नदियों में बहने वाले प्रदूषित जल को शोधन करके इस्तेमाल में लाने की योजना पर काम किया जा रहा है। यह कार्य अभी का नहीं बल्कि वर्षों पुराना है। इस कार्य को पूरा करने के लिए नए एसटीपी निर्माण के साथ ही पहले से ही तैयार एसटीपी की मरम्मत का कार्य द्रुत गति से किए जाने की बात कही जा रही है। उत्तर प्रदेश में सरकारी योजनाओं का हश्र क्या होता है, ये किसी से छिपा नहीं है। सरकारी धन की लूट-खसोट का किस्सा दशकों पुराना है। नमामि गंगे परियोजना में भ्रष्टाचार से जुड़ा ऐसा ही एक मामला गाजियाबाद में भी देखने को मिला।

सुप्रीम कोर्ट, भूरे लाल कमेटी और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के निर्देश पर गाजियाबाद नगर निगम के जलकल विभाग ने एसटीपी की मरम्मत का जिम्मा संभाला। नदी में सीवर का पानी न जाने पाए लिहाजा डूंडाहेडा सीवर ट्रीटमेंट प्लांट कई वर्ष पूर्व ही तैयार किया जा चुका था। चूंकि काफी समय से इस्तेमाल में न लाए जाने की वजह से एसटीपी ने काम करना बंद कर दिया था लिहाजा मरम्मत के नाम पर छह करोड़ उन्तालीस लाख रूपए स्वीकृत किए गए। नगर निगम के जलकल विभाग ने काम की जिम्मेदारी कार्यदायी संस्था जल निगम के सीएंडडीएस को सौंपा। जल निगम के नलकूप विंग ने 29 सितम्बर 2017 को काम पूरा होने की रिपोर्ट भेजी साथ ही यह भी बताया कि गैस होल्डर डोप पूरी तरह से खराब होने की वजह से सिस्टम काम नहीं कर रहा। प्रश्न यह उठता है कि जब गैस सिस्टम काम ही नहीं कर रहा है तो काम पूरा होने की रिपोर्ट कैसे भेज दी गयी। बताते चलें कि साढे़ छह करोड़ की आवंटित रकम मरम्मत के नाम पर खर्च हो चुकी है। ये पैसा कहां गया? नगर-निगम और जल संस्थान के कुछ कर्मचारी बताते हैं कि करोडो  की रकम अफसरों और ठेकेदारों की भेंट चढ़ गयी। जांच में इस बात की पुष्टि हो चुकी है लेकिन सम्बन्धित अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की जा सकी।

महापौर की सख्ती भी काम न आयी

पार्षद राजेन्द्र त्यागी की शिकायत के आधार पर महापौर ने इस मामले को संज्ञान में लेते हुए नगर निगम (जल विभाग) के महाप्रबंधक को पत्र भेजकर पूरा ब्योरा मांगा। कहा जा रहा है कि महापौर के पत्र से पूर्व ही नगर आयुक्त इस मामले की जांच शुरू कर चुके थे। गाजियाबाद की महापौर आशा शर्मा ने महाप्रबंधक बीके सिंह को भेजे गए पत्र में लिखा है कि 12, जून, 2018 को उन्होंने खुद डूंडाहेड़ा स्थित 70 एमएलडी सीवर ट्रीटमेंट एवं अन्य ट्रीटमेंट प्लांट का निरीक्षण किया था। उस वक्त सीवर ट्रीटमेंट प्लांट सही तरह से कार्य नहीं कर रहे थे। इस संबंध में 16 जून 2018 को एक पत्र लिखकर नगर निगम के अधिकारियों को जांच कराने के लिए कहा था। तत्कालीन नगर आयुक्त ने जांच भी करवाई थी। महापौर आशा शर्मा सभी ट्रीटमेंट प्लांट में दूषित पानी के ट्रीटमेंट होने के बाद निकले हुए पानी की जांच कराने की लैब रिपोर्ट तलब की। इतना ही नहीं पिछले एक वित्तीय वर्ष की लैब रिपोर्ट भी मांगी है। महापौर ने 6.39 करोड़ रुपये की धनराशि का भुगतान कब हुआ, किन शर्तों पर हुआ, जल निगम की इकाई सीएंडडी द्वारा भुगतान के बाद भी कार्य क्यों नहीं करवाया गया, कार्य न करवाने पर नगर निगम के अधिकारियों द्वारा क्या कार्रवाई की गई, इन सब सवालों का जवाब मांगा है। इसके बावजूद कथित भ्रष्ट अधिकारी कार्रवाई की जद में नहीं आ सके हैं।

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