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गहलोत की ‘क्वॉरेंटाइन पॉलिसी’ से पायलट के सियासी जहाज पर ‘ब्रेक’ 

पिछले 10 महीनों से राजस्थान में चल रहा कांग्रेस का आपसी द्वंद अब  सियासी मुकाम  में क्वॉरेंटाइन पालिसी की तरफ जाता हुआ दिखाई दे रहा है। इस सियासी मुकाम में फिलहाल पूर्व डिप्टी सीएम सचिन पायलट पर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भारी पड़ते दिखाई दे रहे हैं। सचिन पायलट और उनके समर्थकों ने पिछले 10 माह से राजस्थान के कांग्रेस राजनीति में बगावती तेवरों के साथ अपनी ही सरकार की घेराबंदी कर रखी है। फिलहाल मुख्यमंत्री गहलोत सचिन पायलट के दबाव से दूर रहने के लिए 2 माह तक क्वॉरेंटाइन हो गए हैं।
10 महीने पहले पायलट और गहलोत की राजनीतिक गहमा-गहमी की शुरुआत हुई थी। जब पायलट गुट के विधायकों के फोन टाइप होने का मामला सामने आया था। उसके बाद सचिन पायलट और उसके 19 विधायक सरकार के खिलाफ हो गए थे । तब कहा जाने लगा था कि वह भाजपा में जाएंगे। लेकिन केंद्रीय आलाकमान के हस्तक्षेप के चलते पायलट भाजपा में जाने से रुक गए।
इसके साथ ही एक 4 सदस्य समिति का गठन कर दिया गया।इस समिति के जरिए पायलट को के असंतुष्ट विधायकों को संतुष्ट करने के लिए राजस्थान की सियासी सच्चाई को सामने लाने की बात कही गई। लेकिन 10 महीने बाद भी कमेटी का निर्णय नहीं आया। इस दौरान यूपी के दिग्गज कांग्रेस नेता जितिन प्रसाद के भाजपा में जाने के बाद एक बार फिर पायलट गुट के विधायक सक्रिय हो गए हैं।
 खुद सचिन पायलट कई बार कह चुके हैं कि 10 महीने पहले गठित की गई कमेटी के निर्णय में क्यों देरी की जा रही है। कांग्रेस के सूत्र बता रहे हैं कि कमेटी के निर्णय में जानबूझकर देरी की जा रही है। कहा जा रहा है कि कमेटी जो निर्णय देगी वह गहलोत के पक्ष में तो कतई नहीं हो सकता। कहीं इससे गहलोत को सियासी नुकसान न हो जाए इसके चलते ही कमेटी का निर्णय फिलहाल “होल्ड” कर दिया गया है।
हालांकि केंद्रीय आलाकमान चाहता है कि कमेटी का निर्णय जल्द आए। लेकिन कहा जाता है कि जब केंद्र में कांग्रेस की सरकार नहीं होती तो राज्यों में जिन मुख्यमंत्रियों के नेतृत्व में सरकार होती है वह पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व पर भारी पड़ते हैं। कुछ ऐसा ही आजकल गहलोत और पायलट मामले में हो रहा है।
 फिलहाल, गहलोत अपनी मनमानी पर आमादा है। वह केंद्रीय आलाकमान के किसी दबाव में नहीं आ रहे हैं। पिछले दिनों से जब यह चर्चा चली कि राजस्थान में कैबिनेट विस्तार होगा तो सचिन पायलट अपने गुट के विधायकों को कैबिनेट में शामिल कराने के लिए अड़ गए।
यहां यह भी बताना जरूरी है कि फिलहाल राजस्थान में 21 मंत्री है। जबकि राजस्थान में 30 मंत्री तक बनाए जा सकते हैं । इस तरह अभी 9 पद मंत्रिमंडल में खाली है । जिस पर सचिन पायलट ने 6 पद अपने ग्रुप के विधायकों के लिए मांग की है।
उधर, दूसरी तरफ गहलोत के सामने मुश्किल यह है कि वह अगर सचिन पायलट को 9 में से 6 मंत्री पद दे देते हैं तो उन्हें निर्दलीय और बसपा से आए विधायकों को मंत्री बनाने में परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। पिछले दिनों निर्दलीय और बसपा से कांग्रेस में शामिल हुए सभी विधायकों ने गहलोत को इसके लिए अपना संदेश भेजा था। जिसमें उन्होंने स्पष्ट कहा था कि उनकी सत्ता में भागीदारी जरूरी है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि पिछले साल जब गहलोत पर राजनीतिक संकट पैदा हुआ था तो वह उन्हीं के साथ थे।
 फिलहाल मंत्रिमंडल विस्तार में पायलट का बढ़ता दबाव देखकर गहलोत ने क्वॉरेंटाइन पॉलिसी अपना ली है। इसके चलते ही वह 2 माह के लिए क्वॉरेंटाइन हो गए हैं। कांग्रेस के राजस्थान सूत्रों के अनुसार मुख्यमंत्री गहलोत का यह क्वॉरेंटाइन पायलट को गच्चा देने के लिए है। इस तरह 2 माह तक गहलोत पायलट के दबाव से मुक्त रहकर क्वॉरेंटाइन पालिसी के जरिए ही राजस्थान को चलाते रहेंगे।

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