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बिहार के कद्दावर वामपंथी नेता गणेश शंकर विद्यार्थी का निधन

12 साल की उम्र में आजादी के आंदोलन में कूद पड़े थे। तिरंगा फहराने पर हुए थे गिरफ्तार

पटना। बिहार के कद्दावर वामपंथी नेता कामरेड गणेश शंकर विद्यार्थी का पटना के एक निजी अस्पताल में निधन हो गया। वे 97 साल के थे। उनके निधन पर तमाम राजनेताओं, साहित्यकारों और पत्रकारों ने दुख व्यक्त किया है। स्वर्गीय विद्यार्थी के दामाद तथा वरिष्ठ पत्रकार अगस्त्य अरुणाचल ने कहा कि पिछले दशहरे के समय कामरेड विद्यार्थी कमजोरी के चलते गिर गये थे। जिससे छाती की हड्डी टूट गई थी। पटना में इलाज के बाद 2020 में अस्पताल से घर आ गये थे। कोरोना-19 पीड़ित होने के कारण फिर पटना के रूबेन अस्पताल में भर्ती किया गया था। 11 जनवरी की रात अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली। कामरेड विद्यार्थी सीपीएम की राज्य ईकाई के सचिव और पोलित ब्यूरो के सदस्य रहे।

बिहार के नवादा जिले रजौली में 01 सितम्बर 1924 को एक बड़े जमींदार और किसान परिवार में जन्मे गणेश शंकर विद्यार्थी छोटे उम्र में ही आजादी के आंदोलन से जुड़ गये। जब 12 साल के थे तो नवादा के सरकारी भवन पर तिरंगा फहराने के जुर्म में उन्हें गिरफ्तार किया गया था। आजादी के बाद उनका झुकाव वामपंथ की ओर हुआ। गणेश शंकर विद्यार्थी के बड़े परिवार में जन्म लेने के बावजूद गांव-गरीबों और मेहनतकश जनता की वे आवाज बने।

ताउम्र जन समस्याओं को लेकर संघर्ष कर रहे थे। आम जन के बीच रहे और अंतिम समय तक पार्टी से जुड़े रहे। गणेश शंकर विद्यार्थी पहली बार 1977 में नवादा से जीतकर विधानसभा पहुंचे। जनवादी लेखक संघ, बिहार के राज्य सचिव प्रोफेसर नीरज सिंह ने श्रद्धांजलि देते हुए लिखा है कि वे पुरानी पीढ़ी के वैसे राजनेताओं में अग्रणी थे जिन्होंने अपनी राजनीतिक सक्रियता के बीच भी साहित्य और संस्कृति पर आजीवन अपनी गहरी छाप बनाए रखी थी। साहित्यकारों और संस्कृतिकर्मियों के प्रति वे बहुत ही सम्मान का भाव रखते थे।

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