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कर्नाटक के आगे की कवायद

कर्नाटक के आगे की कवायद

प्रेम भारद्वाज

औ र आखिरकार कांग्रेस की बाउंसर गेंद को खेलने के क्रम में भारतीय जनता पार्टी को विवश होकर बैकफुट पर जाना पड़ा। सरकार बनाने का दावा और येदियुरप्पा की मुख्यमंत्री के रूप में ताजपोशी के बाद उसे शर्मनाक ढंग से यू टर्न लेना पड़ा। इस सियासी दांव-पेंच या कहें माइंड गेम में निश्चित तौर पर कांग्रेस ने अपनी सत्ता गंवाकर भी लीड ली है। इसका दूरगामी प्रभाव आगे आने वाले राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों और अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव पर पड़ सकता है। कर्नाटक प्रकरण ने हाताश पड़ी विपक्षी शक्तियों को जैसे संजीवनी दे दी है। भाजपा के कार्यकर्ताओं-समर्थकों का मनोबल दरका है। विपक्षी दलों ने कर्नाटक प्रकरण को एक टर्निंग प्वाइंट माना है। वे जिस फॉर्मूले की तलाश में थे वह उत्तर प्रदेश के उपचुनाव में ही मिल गया था। जब विपक्षी एकता के कारण भाजपा को गोरखपुर और फूलपुर की संसदीय सीट गंवानी पड़ी। विपक्षी दलों को अब इस बात पर यकीन हो गया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मुकाबला अलग-थलग रहकर नहीं किया जा सकता है। अगर अगले साल के लोकसभा चुनाव में मोदी को मात देनी है और भाजपा को फिर से केंद्र की सत्ता में आने से रोकना है तो अगल- थलग कमजोर पड़े भाजपा विरोधी दलों को हर हाल में एकजुट होना पड़ेगा। यही वजह है कि कर्नाटक में कुमारस्वामी के शपथ समारोह में मिशन २०१९ से पहले ही विपक्ष ने एक तरह से अपना शक्ति प्रदर्शन किया।

एक लंबे अरसे बाद एक ही मंच पर सोनिया गांधी, राहुल गांधी, मायावती, अखिलेश यादव, सीताराम येचुरी, चंद्र बाबू नायडू, ममता बनर्जी, तेजस्वी यादव, अजित सिंह, शरद पवार, शरद यादव, डी राजा, अरविंद केजरीवाल, पेनियर विजयन मौजूद थे। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और चंद्र बाबू नायडू ने कहा भी-एचडी कुमारस्वामी के शपथ समारोह में उनकी भागीदारी एकजुटता को मजबूती देना है। वे इस प्रयास में, किसी बाधा को आने की इजाजत नहीं देंगे। ममता बनर्जी ने इस बात पर जोर दिया कि वे सभी राजनीतिक दलों के साथ संपर्क में हैं। उनका मिशन और विजन बिल्कुल साफ है। दो मुख्यमंत्री और क्षेत्रीय दलों के प्रमुखों ने इस एकजुटता प्रदर्शन में अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं कराई। वे है ओडिशा के मुख्यमंत्री और बीजद के नेता नवीन पटनायक एवं तेलंगाना के मुख्यमंत्री चन्द्रशेखर राव। पटनायक की दलील थी कि उनका दल भाजपा और कांग्रेस दोनों से, समान दूरी बनाकर रखना चाहता है। यह मानना चंद्र शेखर राव का भी था कि वे कांग्रेसी नेताओं के साथ मंच साझा नहीं करना चाहते थे, क्योंकि वह कांग्रेस और भाजपा से समान दूरी रखकर ही क्षेत्रीय दलों का गठबंधन चाहते हैं। शपथ समारोह की एक और रेखांकित करने वाली बात यह रही कि मंच पर बसपा प्रभारी मायावती और यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी हाथ में हाथ डाले लोगों का अभिवादन कर रही थी। फुलपुर-गोरखपुर उपचुनाव के बाद यह दूसरा मौका था जब विपक्ष ने भाजपा को मात दी। कर्नाटक फॉर्मूले के बाद सियासी हलकों में यह चर्चा बहुत जोर पकड़ रही है कि कांग्रेस पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस, आंध्र प्रदेश में नायडू से भी हाथ मिला सकती है। उत्तर प्रदेश में सपा, बिहार में राजद के साथ पहले भी चुनाव लड़े गए हैं। उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा का गठबंधन भाजपा की मुश्किलें बढ़ाने वाला है। खास बात यह है कि कभी गठबंधन की राजनीति से परहेज करने वाली कांग्रेस ने अब गठबंधन पर अपना अटूट भरोसा दिखाया है। भाजपा के विजय रथ को रोकने के लिए उसने छोटे दलों से हाथ मिलाने में जरा भी हिचक नहीं दिखाई और अपने बड़े होने को अभियान के बीच में नहीं आने दिया। कांग्रेस का यह लचीला रूख उसे नयी शक्ति देने में सक्षम साबित हो सकता है। बेशक कुमारस्वामी मुख्यमंत्री बन गए है। नई सरकार का गठन हो गया है। भाजपा की फजीहत हुई है। लेकिन कांग्रेस- जेडीएस गठबंधन को लेकर सरकार गठन के पहले दिन से ही इसके भविष्य को लेकर तरह-तरह की आशंकाएं उठने लगी हैं। इसकी उम्र को लेकर अटकलें तेज हैं। सट्टा बाजार में भी इसकी धमक है। कुछ लोग इसे एक असहज गठबंधन मानते हैं। फिर भी कहा जा रहा है कि कुछ भी हो अगले साल लोकसभा चुनाव तक तो गठबंधन की यह सरकार चलेगी ही। अगले साल लोकसभा चुनाव में दोनों ही दल ज्यादा से ज्यादा सीट जीतना चाहेंगे। राजनीतिक जानकार बताते हैं-इस गठबंधन की उम्र इस बात पर निर्भर करती है कि कांग्रेस कब तक एक बड़ी ताकत के रूप में वापस आने की स्थिति में आ सकती है। अगर कांग्रेस ऐसा कर पाती है तो निश्चित तौर पर भाजपा की मुश्किलें उभर सकती हैं। यह तो हुआ, एक पक्ष अब दूसरा पक्ष है कि भाजपा अपनी डूबी कश्ती को देखकर भयभीत ही नहीं आत्ममंथन कर रही है। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को जीत का शिल्पकार कहने वाले मोदी भी आहत हैं। गुजरात में उनकी सरकार भले बच गयी, मगर कांग्रेस की तरफ से मिलने वाली कठिन चुनौती से वे असहज थे। लेकिन वे अनुभवी हैं और निश्चित तौर पर विपक्षी एकजुटता की कोई न कोई काट सोच रहे होंगे।

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