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चार साल के दौरान मोदी सरकार ने कई फैसले लिए जिनमें से कुछ विवादों में भी रहे। विदेशों में देश की साख और विकास के नए मुकाम हासिल करने के दावों में कितनी सच्चाई है, पेश है सरकार के फैसलों का स्याह-सफेद पक्षउतना ही कहिए जितना कर सकें। मोदी सरकार के चार साल का रिपोर्ट कार्ड देखते समय रिमार्क यही होगा। अपने चार साल के कार्यकाल में २५ से ज्यादा योजनाओं की द्घोषणा करके इस सरकार ने खुद के पैरों में ही कुल्हाड़ी मार ली और बन गए उस्ताद बड़बोले। इन योजनाओं में कुछ ही ऐसी हैं जो सफल हुई और जनता तक उनका लाभ पहुंचा। बाकी योजनाएं द्घोषणा के बाद प्रक्रिया की सूली में लटका दी गई। हालांकि सरकार के कुछ कड़े फैसलों पर पूरे देश ने गर्व भी किया और सरकार का साथ भी दिया। लेकिन यह काफी नहीं है हमारे प्रधानमंत्री के लिए। जनता की अपेक्षाएं उनके स्मार्ट सिटी वाले सपने से अलग हैं यह उन्हें नखदंत विहीन विपक्ष समझा ही नहीं पा रहा। इसका सीधा फायदा प्रधानमंत्री उठा रहे हैं और जनता को नई योजनाओं के स्वप्नलोक में ले जाकर मंत्रमुग्ध करते जा रहे हैं। विपक्ष खाली हाथ है और अपने साथ ऐसे ही कई खाली हाथ जोड़ने की कोशिश में लगा हुआ है। यही पूरे विपक्ष की २०१९ की तैयारी है। जिसमें न तो उनके पास कोई मुद्दा है और न कोई चेहरा। मोदी सरकार के चार साल के काम काज की बीजेपी के लिहाज से सबसे बड़ी सफलता यही दिखती है कि उसने इन चार सालों में ऐसे काम किया कि विपक्ष के हाथ कुछ ऐसा नहीं लगा जिसे वो सरकार के खिलाफ इस्तेमाल कर सकें। इसमें कोई दो राय नहीं कि यह स्थिति देश के लिए और लोकतंत्र के लिए अच्छी नहीं है लेकिन भाजपा भी क्या करे? वह यह सोचकर कि विपक्ष मजबूत हो, न तो जानबूझ के हार सकती है और न ही देश के नए राजनीतिक मूड का ज्ञान कांग्रेस और दूसरे राजनीतिक दल को दे सकती है। भारतीय राजनीति के जिस युग में प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी ने केंद्र के लिए खुद को उम्मीदवार के रूप में उतारा उस युग में उनकी भाषा बोलने वाला पूरे देश में एक भी नेता नहीं था और आज भी नहीं दिखता। और तो और वो नेता जो नरेद्र मोदी की आलोचना करते हैं वो भी अपनी सोच के हिसाब से अभी वहीं हैं जहां गोधरा के समय पर मोदी हुआ करते थे। इसके बाद मोदी तो बहुत आगे आ गए लेकिन नेताओं की सारी की सारी जमात वहीं रह गई। यही कारण है कि वर्तमान प्रधानमंत्री अपने ऊपर लगे किसी भी आरोप का जवाब देना भी उचित नहीं समझते।

अब आते हैं साल २०१४ में काम की शुरुआत से। अपने शपथ ग्रहण समारोह में ही मोदी ने सार्क देशों के प्रमुखों को बुला कर पड़ोसियों के साथ अपनी कूटनीतिज्ञ बिसात सजा ली थी। राष्ट्रपति भवन में आज तक का सबसे बड़ा समारोह आयोजित हुआ जिसमें ९० विदेशी हस्तियां शामिल हुई। इस भव्यता ने संकेत तो दे दिया था कि क्या होने वाला है। तो चलिए डालते हैं एक नजर कि इन चार सालों में हुआ क्या : २८ अगस्त २०१४ : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस दिन जन- धन योजना की द्घोषणा की। इस योजना का उद्देश्य ज्यादा से ज्यादा लोगों को बैंकों तक लाना और उनको बैंकिंक सिस्टम से जोड़ना था। यह नरेंद्र मोदी की उस सोच को साकार करने का पहला कदम था जिसके तहत वो यह चाहते थे कि देश में आखिरी व्यक्ति तक उसके हिस्से का पैसा पहुंचने में जो द्घोटाला हो रहा है वो खत्म हो और आखिरी व्यक्ति को ज्यादा से ज्यादा लाभ मिले। पॉजिटिव : यह योजना सीधे आखिरी व्यक्ति को ध्यान में रखकर बनाई गई और बैंक खातों के कारण उन तक पहुंचने वाली सहायता में पारदर्शिता आई। निगेटिव : बैंक कर्मचारियों पर अतिरिक्त भार पड़ा। यह आरोप भी लगा कि पहले खाते खुलवाएं गए और फिर उसमें मिनिमम बैलेंस के नाम पर पैसे काटे गए। जानकार जानते हैं कि आरोप बेबुनियाद था लेकिन फिर भी सरकार ने इस योजना के प्रति लोगों को ज्यादा जागरूक करने के लिए कुछ नहीं किया। अब जब आलोचना गहराती गई तो जरूर कुछ विज्ञापन आने लगे हैं जीरो बैलेंस खाते के बारे में। २८ अगस्त २०१४ : स्किल इंडिया मिशन की द्घोषणा की गई। इसका उद्देश्य युवाओं में कौशल विकास करके उनके हाथों में हुनर दिया जाए जिससे ज्यादा से ज्यादा नौकरियों का सृजन हो। पॉजिटिव : योजना की शुरुआत में काफी जोश दिखाई दिया प्राइवेट सेक्टर के कई बड़े संस्थानों ने इंटर्नशिप कोर्स लॉन्च किए और ऐसा लगा इच्छुक युवा जरूर ही नौकरी प्राप्त कर लेगा। निगेटिव : इन चार सालों में इस योजना से कई युवाओं को लाभ मिलना चाहिए लेकिन ऐसा जमीन पर दिख नहीं रहा है। सरकार और उसके नुमाइंदे भी शायद इस योजना को भूल गए। पैसा तो लगा है लेकिन जिस स्तर की ट्रेनिंग बच्चों को मिलनी चाहिए वो नहीं मिल पा रही है। (इस योजना में खर्च सरकारी पैसा और इससे कितने युवाओं को नौकरी मिल सकी है अगर इसका आंकड़ा हो तो विपक्ष के पास सरकार के खिलाफ कहने के लिए कुछ पुख्ता होगा) २८ सितंबर २०१४ : इस दिन मेक इंन इंडिया जैसी बेहद महत्वाकांक्षी योजना की द्घोषणा हुई। इस योजना का उद्देश्य भारत में ऐसे उत्पादों के निर्माण को बढ़ावा देना है जिनको निर्यात किया जा सके या जिनको भारत आयात करता है। इस योजना की खास बात ये है कि विपक्ष के नेता कई बार इस योजना का माखौल उड़ाते दिखें हैं लेकिन कभी उन्होंने तथ्यों के आधार पर इस योजना को द्घेरा नहीं। पॉजिटिव : इस योजना ने भारत के युवाओं पर एक जोश भरा। अपना काम करने और कुछ कर दिखाने का जज्बा आया जिसका सबसे ज्यादा असर आईटी और इलेक्ट्रॉनिक्स के क्षेत्र पर पड़ा। लैपटॉप और मोबाइल के भारत में प्रोडक्शन ने इस समय ही तेजी पकड़ी। निगेटिव : एक दो सेक्टर तक ही रह जाना इस योजना का असफल होना ही कहा जाएगा। बहुत सारी चीजें इस योजना को लेकर क्लियर नहीं थी। वास्तव में यह योजना इस बात पर भी निर्भर करती है कि देश में ‘इज ऑफ डूइंग बिजनेस’ का स्तर क्या है। और योजना लागू होने के चार साल बाद तो इसकी बात भी नहीं होती। ऐसा लग रहा है कि यह महत्वाकांक्षी योजना अभी से ही धूल खाने लगी है। २ अक्टूबर २०१४ : स्वच्छ भारत मिशन की द्घोषणा कर प्रधानमंत्री ने एक बार फिर लोगों के दिलों में जगह बना ली। भारत में राजनीति का जो स्तर है वहां इस बात की कल्पना भी मुश्किल थी कोई इतनी सामान्य किंतु महत्वपूर्ण बात को एक मिशन का रूप दे देगा। पूरे देश ने प्रधानमंत्री के इस मिशन में सहयोग दिया और इस लक्ष्य की ओर आगे बढ़े कि २ अक्टूबर २०१९ तक पूरा देश कचरा मुक्त हो जाएगा। पॉजिटिव : देश में इस योजना के बाद सफाई को लेकर जागरूकता आई। कई सारे शौचालय बनाए गए और इनमें से ६० से ७० प्रतिशत इस्तेमाल भी होने लगे। यह बहुत अच्छा आंकड़ा है जो इस मिशन के सफलता से आगे बढ़ने का सूचक है। निगेटिव : अक्टूबर २०१९ लगभग एक साल पांच माह दूर है लेकिन आज भी महानगरों में भी कई जगह कूड़े के ढेर दिखाई देते हैं। बड़ी बड़ी हस्तियों ने एक-दूसरे को सफाई चैंलेंज दिया लेकिन ब्लॉक लेवल पर काम कर रहे अधिकारियों और नेताओं में अभी जागरूकता की कमी है और इनके जगरूक हुए बिना २०१९ का लक्ष्य हासिल करना मुमकिन ही नहीं है। ११ अक्टूबर २०१४ : सांसद आदर्श ग्राम योजना, एक ऐसी स्कीम जिसे अब तक देश में कम से कम २८२ आदर्श गांव होने चाहिए थे और वहां मुहैया कराई गई योजनाओं का प्रचार भी होना चाहिए। किंतु ऐसा दिखाई नहीं दिया। आदर्श ग्राम के नाम पर कुछ भी ऐसा नहीं हुआ जिससे ग्रामीणों का जीवन स्तर सुधरे। पॉजिटिव : इस योजना की पॉजिटिव सिर्फ कल्पना ही थी जिसे सोचकर प्रधानमंत्री जी ने इसकी द्घोषणा की होगी। क्योंकि जमीन पर शायद की कोई गांव आदर्श बना हो। निगेटिव : इस योजना में कई सारे छेद थे जिसके कारण यह टिक नहीं सकी। सांसदों के पास समस्या है कि उन्हें आदर्श गांव का चयन कर उस पर काम करने के लिए कोई अलग से निधि नहीं मिली तो अगर वो अपनी सांसद निधि को किसी एक गांव में ही लगा देंगे तो बाकी के गांवों का विकास कैसे होगा। इससे अलग कई सांसदों ने तो अपने लिए गांवों का चयन भी नहीं किया। पूरी तरह फुस्स योजना का ख्याल भी विपक्ष को नहीं है वरना गांव वालों के साथ इस धोखे का प्रचार करके भाजपा की वर्तमान स्थिति में थोड़ा डेंट तो लगाया ही जा सकता है। २२ जनवरी २०१५ : इस दिन भाजपा सरकार ने देश को दी ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ योजना जिसका उद्देश्य देश में द्घटते लिंगानुपात को बराबरी में लाना। योजना की शुरुआत पहले देश के उन १०० जिलों में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में की गई जहां २०११ की जनगणना के अनुसार लिंगानुपात सबसे ज्यादा बिगड़े हुए हैं। पॉजिटिव : इतनी बारीकी से देश की इस बहुत बड़ी समस्या को उठाया गया और उससे लड़ने का तरीका निकाला गया। अगर इस योजना से बिगड़ते लिंगानुपात को थोड़ा भी बढ़ाया जा सकेगा तो यह मोदी सरकार का एक बड़ा अचीवमेंट होगा लेकिन असल नतीजे तो २०२१ में होने वाली जनगणना तक ही सामने आएंगे। निगेटिव : इस योजना को लेकर बहुत सारी जगह अफवाह और सवाल हैं। लेकिन कहीं भी सही से नहीं समझाया गया है कि कौन और कैसे इस योजना का लाभ प्राप्त कर सकता है। इस योजना की शुरुआती लागत १०० करोड़ थी लेकिन इस बात का कोई अता-पता नहीं कि इसमें से कितना धन इस्तेमाल हुआ और कहां इस्तेमाल हुआ। अगर अच्छा विपक्ष होता तो इस समय क्षेत्रीय दलों का नहीं, बल्कि इन योजनाओं को पोस्टमार्टम कर रहा होता। २१ जनवरी २०१५ : भारत स्थित विश्व विख्यात इमारतों एवं धरोहरों को संजोने के उद्देश्य। से हृदय योजना की शुरुआत की गई। इस योजना में उन शहरों का विकास भी शामिल है जिनमें ऐसे धरोहर हैं। शुरुआत के लिए वाराणसी, जगन्नाथपुरी, अजमेर और अमृतसर जैसे शहर शामिल हैं। इस योजना के तहत इन धरोहरों की सुरक्षा का जिम्मा पुरातत्व विभाग से लेकर ऐसे लोगों को सौंपा जाएगा जो इनसे जुड़े हैं और प्यार करते हैं। पॉजिटिव : लोगों को अपनी धरोहरों के साथ जोड़ने की बहुत अच्छी मुहिम थी। इससे लोगों के अंदर देश के प्रति जिम्मेवदारी की भावना बढ़ती है। निगेटिव : इस योजना का प्रचार और लोगों को इस योजना के प्रति जागरूक करने में सरकार ने बहुत कोताही बरती। जिसके परिणाम स्वरूप सरकार पर आरोप लगे कि वह देश की इन धरोहरों को बड़े लोगों के हाथ में दे दे रहे हैं। ८ अप्रैल २०१५ : इस दिन मुद्रा योजना की द्घोषणा हुई। इस योजना का उद्देश्य देश में स्वरोजगार को बढ़ावा देना और छोटे उद्योगों को प्रोत्साहित करना था। पॉजिटिव : ऐसे लोग जिनका विजन एकदम सही था और जो आर्थिक दृष्टि से थोड़े सक्षम थे वो इस योजना का लाभ उठाकर अपनी सोच को व्यापार का स्वरूप दे पाए। निगेटिव : सरकार की बहुत कोशिश के बाद भी बैंक बिना किसी मोर्टगेज के लोन देने को तैयार नहीं होते क्योंकि सरकारी योजना में पैसा बैंक का ही लगता है। ऐसे में एक सामान्य व्यक्ति के लिए बैंक से अपना प्रोजेक्ट पास करवाना ढेढ़ी खीर जैसा था। जमीनी हकीकत तो ये है कि बहुत सारे अच्छे प्रोजेक्ट कूड़े के डब्बे में चले गए क्योंकि उन्हें प्रजेंट करने वालों के पास बैंक सिक्योरिटी के लिए कुछ नहीं था और कई ऐसे सामान्य प्रोजेक्ट मुद्रा लोन लेने में सफल हुए क्योंकि उनको पैसा देना बैंकों को सेफ लगा। १ मई २०१५ : इस दिन उजाला योजना की द्घोषणा हुई और देश में एलईडी क्रांति आ गई। इस योजना के बाद एलईडी के दाम पहले की अपेक्षा आधे हो गए। यह स्वच्छ भारत मिशन की तरह योजना कम अभियान ज्यादा था। एलईडी का इस्तेमाल बिजली की खपत कम करता है और इसके प्रयोग से कार्बन उत्सर्जन भी कम होता है। पॉजिटिव : सब्सिडी देकर एलईडी को बल्ब से रिप्लेस करना एक सराहनीय कदम है। निगेटिव : मार्केट में आज भी एलईडी के अलावा सीएफएल और बल्ब मिल रहे हैं। अगर पूरे देश को एलईडी से चमकाना है तो सरकार को इस योजना में थोड़ा और दम दिखाना चाहिए। आगे के लिए इस योजना से संबंधित कोई दिशा या लक्ष्य नहीं दिखता। ९ मई २०१५ : इस दिन अटल पेंशन योजना की द्घोषणा की गई। योजना १८ से ४० साल के ऐसे लोगों के लिए थी जो असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं। पॉजिटिव : इस योजना की पॉजिटिव सिर्फ वो सोच है जिसके तहत इसे शुरू किया गया है। निगेटिव : जब आज से ३० से ४० साल बाद सिर्फ १००० से ५००० रुपए तक ही मिलेंगे तो वो आपके कितना काम आएंगे। यह पेंशन स्कीम आपको इंडिपेंडेंट बनाने के लिए तो नहीं है। साथ ही इस सरकार ने ईपीएफ की ब्याज दर को भी अपने आज तक के न्यूनतम स्तर पर पहुंचा दिया है। इस लिहाज से तो ये योजना वर्तमान में सरकार की आर्थिक जरूरतों को पूरा करने का षड्यंत्र लगती है और ये षड्यंत्र भी उन लोगों के खिलाफ किया गया जो आर्थिक रूप से सक्षम नहीं हैं। २५ जून २०१५ : इस दिन द्घोषणा की गई स्मार्ट सिटी योजना की। इस योजना के तहत १०० शहरों को चुना जाएगा और उन्हें २०२० तक स्मार्ट शहर के रूप में बसाया जाएगा। इसी दिन अमृत योजना की भी द्घोषणा हुई जिसका उद्देश्य था कि एक लाख से अधिक जनसंख्या वाले ५०० शहरों में सभी मूलभूत सुविधाओं का विकास करना। पॉजिटिव : स्मार्ट सिटी योजना का पॉजिटिव जानने के लिए २०२० तक इंतजार करना पड़ेगा, क्योंकि तभी पता चलेगा कि स्मार्ट सिटी ने लोगों के जीवन स्तर को कैसे और कितना बदला है और अमृत योजना इतनी अनसुनी है कि संदेह होता है कि इसमें द्घोषणा के अलावा कुछ और हुआ हो। निगेटिव : इस योजना का हाल भी कहीं न कहीं वैसा ही हुआ जैसा आदर्श सांसद ग्राम योजना का हुआ। बड़े-बड़े सपने लेकर उतरे लेकिन जमीनी हकीकत ने सब टाय-टाय फिस्स कर दिया। टेंडर प्रक्रिया और सबका मुनाफा जैसी जमीनी हकीकत ने ऐसा अड़ंगा लगाया कि बनारस जो कि प्रधानमंत्री जी का संसदीय क्षेत्र है वो भी स्मार्ट न बन सका। हाल ही में इस स्मार्ट सिटी की पोल भी खुली थी जब एक निर्माणाधीन पुल गिर गया जिसमें कई बेकसूर लोगों ने अपनी जान गवां दी। २ जुलाई २०१५ : इस दिन डिजिटल इंडिया मिशन की द्घोषणा हुई। इसके अंतर्गत सभी सरकारी गतिविधियों को ऑनलाइन संचालित करना था। जिससे लोगों तक सही समय में सर्विस डिलिवर की जा सके। पॉजिटिव : सरकारी सर्विस ऑनलाइन होने के कारण उन्हें टाइम में डिलिवर करने के लिए कर्मचरी बाध्य होते हैं। इसके अलावा लोगों को भाग-दौड़ से भी फुर्सत मिल जाती है। निगेटिव : गांव देहात में आज भी इंटरनेट नहीं है जिस कारण से यह उन लोगों के लिए परेशानी का सबब बन जाता है क्योंकि सर्विस ऑनलाइन होने के बाद कर्मचारी मैन्युअल एप्लिकेशन लेने से कतराते हैं और कई संस्थानों में तो मैंने देखा कि वहां किसी अधिकारी से बात करने से पहले ही कहा जाता है कि जो भी करना है ऑनलाइन करो। इसके बाद वहां आस-पास के दलालों को अपने रोजगार का मौका मिल जाता है। १६ जनवरी २०१६ : इस दिन स्टार्ट अप इंडिया की द्घोषणा हुई। यह योजना भारत में नए उद्यमियों को बढ़ावा देने तथा उद्योग विकास के लिए शुरू की गई। पॉजिटिव : इस योजना के पीछे सोच अच्छी थी कि जो भी अपना काम शुरू करना चाहता है उसे सही मार्गदर्शन, लोन एवं अन्य सहयोग सरकार देगी। निगेटिव : जो सहयोग सरकार इस योजना के तहत देने की बात कर रही है वह कोई कहां से प्राप्त करें। लोगों को इस योजना के प्रति जागरूक कम किया गया। अगर उद्यमियों को प्रोत्साहन देना था तो मुद्रा योजना की खामियों को दूर करके उसे ही मजबूत क्यों नहीं किया गया। ऐसा प्रतीत होता है कि प्रधानमंत्री के मन में एक अच्छा साटर्म आया और उन्होंने न आव देखा न ताव बस देश को सुना दिया ‘स्टार्ट अप इंडिया स्टैंड अप इंडिया’। योजना का असर वही ढाक के तीन पात। १ मई २०१६ : इस दिन प्रधानमंत्री उज्वला योजना की शुरुआत की गई। इसके तहत उन लोगों तक एलपीजी गैस सिलेंडर पहुंचाए गए जो पहले चुल्हे में खाना पकाते थे। पॉजिटिव : इस योजना के क्रियान्वयन ने देश के उस तबके तक भाजपा को पहुंचाया जो पहले भाजपा से दूर था। निश्चित ही कुछ लोगों को इसका लाभ मिला है। निगेटिव : सरकार ने चुल्हा मुक्त भारत करने जैसा कोई लक्ष्य निर्धारण नहीं किया है और यह योजन किसी एक सम्पन्न के सब्सिडी छोड़ने पर किसी एक को एलपीजी सिलेंडर देने की है। ऐसे में सभी को चूल्हे धुंए से मुक्ति दिलाना दूर का ढोल लगता है। इसके अलावा यह सवाल भी उठा है कि एक बार गैस खाली हो गई तो उसके बाद उसे भराने के पैसे उन गरीबों के पास नहीं हो पाते जिससे वो दोबारा से चूल्हे की ओर लौट जाते हैं। ऐसे में सरकार कैसे पूरे देश को उज्ज्वल करेगी कहना मुश्किल है। ७ जुलाई २०१६ : इस दिन नमामि गंगे योजना की शुरुआत की गई। इसका उद्देश्य मां गंगा की सफाई था। इससे पहले सरकार ने इसका दायित्व भी अपने केंद्रीय मंत्री को दिया था, लेकिन गंगा जैसी थीं वैसी ही रह गईं। पॉजिटिव : इस योजना में भी दूसरी कई योजनाओं की तरह सिर्फ सोच है। निगेटिव : इस अच्छी सोच को जमीन पर कितना उतारा गया यह हमेशा से ही गंभीर विषय रहा है। पैसों का आवंटन और फिर काम एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें फंस कर कई अच्छी योजनाएं अपना दम तोड़ देती हैं। इस योजना की हालत भी कुछ ऐसी ही नजर आती है। अब बात इस सरकार के कुछ ऐतिहासिक निर्णयों की करते हैं क्योंकि पिछले ४ सालों का रिपोर्ट कार्ड बिना उन साहसिक निर्णयों पर चर्चा किए तैयार किया जाना संभव नहीं है। इसमें सबसे पहला फैसला ८ नवंबर २०१६ को लिया गया नोटबंदी का फैसला है। हालांकि इसमें संदेह है कि जिस उद्देश्य से नोटबंदी की गई वो सफल हुआ कि नहीं, लेकिन इसका ठीक से हो जाना अपने आप में ही बड़ी बात है। दुनिया में बहुत से ऐसे उदाहरण पहले से ही थे जिन्हें नोटबंदी करने के बाद अपने निर्णय को वापस लेना पड़ा। लेकिन मोदी ने जिस तरह से ये कर दिखाया वो अपने आप में उनकी नेतृत्व क्षमता को दर्शाता है। इसके बाद सर्जिकल स्ट्राइक। यह ऐसा निर्णय था जिसने पूरे देश को गर्व की अनुभूति करवाई। अपना देश शक्तिशाली हो और वो दुश्मनों को उनके ही गढ़ में द्घुसकर करारा जवाब दे भला किसे पसंद नहीं आएगा। पड़ोसियों के साथ अच्छे रिश्तों के पैरोकार मोदी का यह फैसला कुछ तो हजम नहीं कर पाए और कुछ ने इस फैसले के कारण मोदी को दिल में बिठा लिया। तीसरा सबसे बड़ा फैसला टैक्स रिफॉर्म के लिए जीएसटी का लागू करना है। फैसला बड़ा और अच्छा था लेकिन इसको लागू करने में सरकार ने थोड़ा जल्दी कर दी। न तो व्यापारियों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश की और न ही उनका विश्वास जीतने की कोशिश की, बस फैसला थोप दिया। हालांकि जो इसे जल्दी से समझ सके उन्हें ये अच्छा लगा लेकिन जो पारंपरिक तरीके से व्याापार करने के आदी हैं उनके लिए यह सिविल सर्विसेस की परीक्षा में बैठने जैसा था। ये जिस तरह के फैसले प्रधानमंत्री ने लिए उसे कोई अवसरवादी नेता कभी सोच भी नहीं सकता। यही कारण था कि देश इन सभी फैसलों में अपने नेता के साथ खड़ा दिखाई दिया और सरकार को एक भी फैसला वापस नहीं लेना पड़ा। तो इस मोर्चे पर सरकार को अव्वल नंबरों से जनता ने पास कर दिया। मोदी सरकार ने जो भव्यता शपथ ग्रहण समारोह से शुरू की थी वो चार वर्षों में कभी भी कम नहीं हुई। बड़ी-बड़ी योजनाओं की द्घोषणाएं हुई। शक्तिशाली देशों के राष्ट्र प्रमुखों से वार्ताएं हुईं। कभी प्रधानमंत्री ने जिनके लिए प्रोटोकॉल तोड़े वह खुद भी प्रोटोकॉल तोड़कर हमारे प्रधानमंत्री का स्वागत करने लगे। अपने देश के प्रधानमंत्री का ऐसा सत्कार और देश से बाहर इतनी लोकप्रियता देश की जनता पहली बार देख रही है इसलिए शायद गौरव महसूस करते हुए मोदी-मोदी कहते नहीं थकती। लेकिन प्रधानमंत्री जी ये जल्दी से समझ लें कि इस अनुभूति के साथ देश ज्यादा देर तक उनके साथ नहीं रहेगा। वास्तव में जनता अपने प्रधानमंत्री को जमीनी समस्याओं का समाधान करते देखना चाहती है। जिस पर इन चार सालों में सरकार ने बहुत कुछ नहीं किया है। उज्ज्वला और जन-धन को छोड़ दें तो जमीन पर ऐसा होता नहीं दिखा जिससे जनता खुद को सरकार के साथ जोड़े। मध्यम वर्ग के लिए सरकार मानो पीठ करके बैठ गई हो। पेट्रोल और डीजल के साथ-साथ खाने-पीने की चीजों के दाम बढ़ गए हैं। नोटबंदी से सबसे ज्यादा परेशान मध्यम वर्ग ही हुआ। जीसटी से ऐसे ही व्यापारियों की कमर तोड़ी जो न तो बहुत बड़े व्यापारी थे और न ही बहुत छोटे। ऐसे में मोदी जी इतिहास पर नजर डालें और ये समझ लें कि मध्यम वर्ग जिसके साथ हुआ वहीं देश का प्रतिनिधित्व कर पाया और उसके लिहाज से ये चार साल सिर्फ बड़े भव्य बयानों के रहे जैसे कि उनका शपथ ग्रहण समारोह। सरकार ने करने की बातें तो की हैं लेकिन २०१९ के लिए जब वह वोट मांगने के लिए मैदान पर आएगी तो जनता ये जरूर पूछेगी कि जो कहा वो कहां किया और कितना किया। जनता को इसका जवाब अगर नहीं मिला तो भाजपा याद कर ले कि ‘शायनिंग इंडिया’ इस कदर धुंधलाया था कि १० साल के लिए उन्हें केंद्र की सत्ता से उखड़ फेंका था।
लेखक स्वतंत्र युवा पत्रकार हैं।

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