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कांग्रेस को दरकिनार कर बनेगा विपक्षी दलों का मोर्चा 

मौजूदा समय में देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस नेतृत्व परिवर्तन की मांग सहित कई आंतरिक समस्याओं से जूझ रही है।हाल ही में पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के बाद कांग्रेस की हालत और कमजोर हुई है। पंजाब, राजस्थान, केरल, कर्नाटक और असम में पार्टी गुटबाजी का शिकार है। अपने क्षेत्रीय नेताओं के अंतर्कलह से वह जूझ रही है। कांग्रेस पंजाब में कैप्टन अमरिंदर-नवजोत सिंह सिद्धू, राजस्थान में अशोक गहलोत-सचिन पायलट के बीच आपसी टकराव का समाधान नहीं निकाल पा रही है। कहा जा रहा है कि अपने क्षत्रपों पर कांग्रेस आलाकमान की पकड़ कमजोर हो रही है। वह विपक्ष के तौर पर भी कमजोर विकल्प साबित हुई है। अब विपक्ष की राजनीतिक हलचल तेज है। लोकसभा चुनाव 2024 में होने वाला है लेकिन अभी से तीसरे मोर्च की सुगबुगाहट शुरू हो गई है।

 

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के अध्यक्ष शरद पवार के दिल्ली स्थित आवास पर विपक्ष के नेताओं की बैठक हो रही है, हालांकि इस बैठक में कांग्रेस शामिल नहीं हो रही है। कांग्रेस का शामिल नहीं होने के अलग राजनीतिक मायने हैं। नेताओं के मुलाकात के एजेंडे के बारे में कहा गया है कि इस बैठक में देश में मौजूदा राजनीतिक हालात एवं आर्थिक संकट पर चर्चा की जाएगी। जाहिर है कि इन मुद्दों के जरिए विपक्ष के नेताओं को एक दूसरे के नजदीक लाने और उनका मन टटोलने की कोशिश की जाएगी।

ऐसे में ममता बनर्जी और शरद पवार के नेतृत्व में यदि कोई तीसरा मोर्चा अस्तित्व में आता है तो यह आगामी लोकसभा चुनावों में भाजपा को चुनौती पेश कर सकता है।आगामी 2024 का आम चुनाव होने में अभी बहुत समय है, लेकिन विपक्ष की नजर अभी से चुनावी रणनीति पर है। बदलाव या उसकी संभावना राजनीति का अहम हिस्सा है, बंगाल चुनाव में ममता बनर्जी की जीत के बाद विपक्ष के हौसले बुलंद हैं। विपक्ष के रणनीतिकारों को लगता है कि अगर सभी लोग अपने विचारों को एक किनारे कर साथ आएं तो तस्वीर बदल सकती है। इन सबके बीच आज 22 जून को एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार की अगुवाई में अहम बैठक होने जा रही है। बता दें कि हाल ही में ममता बनर्जी के चुनावी रणनीतिकार रहे प्रशांत किशोर ने शरद पवार से दो दौर की लंबी बातचीत मुंबई में की थी।

                                                             पवार ने की पहल

 

पवार की यह पहल ऐसे समय में आई है जब तृणमूल कांग्रेस प्रमुख और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भाजपा से मुकाबले के लिए संघीय मोर्चा बनाने का आह्वान किया है।मेरा दृढ़ मत है कि जहां तक विपक्षी एकता का संबंध है, हमें सबसे अच्छा होने का इंतजार नहीं करना चाहिए, और जो भी इच्छुक है उसके साथ शुरू करना चाहिए। यह इच्छुकों का गठबंधन होना चाहिए, ”यशवंत सिन्हा, जो टीएमसी में शामिल होकर मार्च में सक्रिय पार्टी की राजनीति में लौट आए।
बताया जा रहा है कि कांग्रेस नेता मनीष तिवारी और शत्रुघ्न सिन्हा, पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण शौरी, आप सांसद संजय सिंह, राकांपा सांसद मजीद मेमन, सपा नेता घनश्याम तिवारी, जदयू के पूर्व नेता पवन वर्मा और पूर्व राजदूत केसी जैसे गैर राजनीतिक हस्तियां शामिल हैं। सिंह और प्रोफेसर अरुण कुमार उन लोगों में शामिल हैं जो अतीत में राष्ट्र मंच की बैठकों में शामिल हो चुके हैं। लेकिन इस बार राजद नेता और राज्यसभा सांसद मनोज कुमार झा, माकपा महासचिव सीताराम येचुरी और उनके भाकपा समकक्ष डी राजा समेत अन्य को भी आमंत्रित किया गया है।  हालांकि, कांग्रेस के दोनों नेता मनीष तिवारी और शत्रुघ्न सिन्हा के अनुपस्थित रहने की संभावना है। तिवारी ने कहा कि वह पंजाब में अपने लोकसभा क्षेत्र में हैं।

                                                                     क्या है राष्ट्र मंच

राष्ट्र मंच, जनवरी 2018 में पूर्व भाजपा नेताओं यशवंत सिन्हा और शत्रुघ्न सिन्हा द्वारा स्थापित एक राजनीतिक कार्रवाई समूह, बैठक कर रहा है, आज की  बैठक के लिए आमंत्रित लोगों में उन दलों के नेता शामिल हैं जो अब तक मंच से जुड़े नहीं हैं।यह पहली बार है जब पवार बैठक की मेजबानी करेंगे। उनका यह फैसला ऐसे दिन आया जब वह दो सप्ताह में दूसरी बार चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर से मिले।

विशेषज्ञों का कहना है कि शरद पवार के आवास पर होने वाली बैठक को अलग-थलग पड़े विपक्ष को एक साथ लाने और भाजपा विरोधी एक मोर्चा तैयार करने की एक कोशिश के रूप में देखा जा सकता है। दरअसल, बंगाल चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने जिस तरह से ममता बनर्जी की घेरेबंदी की और उनके खिलाफ मोर्चा खोला उससे कहीं न कहीं ममता बनर्जी के मन में भगवा पार्टी को सबक सिखाने की टीस है। ममता की नजर अब तीन साल बाद होने वाले लोकसभा चुनाव पर है। उन्हें पता है कि वह राष्ट्रीय स्तर पर अकेले भाजपा को टक्कर नहीं दे सकती। इसके लिए उन्हें गैर-भाजपा दलों का एक मोर्चा तैयार करना होगा। जाहिर है कि इसमें कांग्रेस नहीं होगी।

 

                                    कई राज्यों में सफल हुई है पीके की रणनीति 

प्रशांत किशोर की चुनावी रणनीति बंगाल में सफल हुई है। अगले आम चुनाव में भाजपा के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष की किस तरह की रणनीति अपनाई जानी चाहिए, पीके ने इसका फॉर्मूला ममता को सुझाया होगा। हो सकता है कि ममता बनर्जी इस फॉर्मूले को साथ लेकर आगे बढ़ना चाहती हों। बंगाल चुनाव में भाजपा को मात देकर वह विपक्ष की एक बड़ा नेता बन चुकी हैं। पीके दिल्ली, तमिलनाडु सहित कई राज्यों में अपनी चुनावी रणनीति सफल करा चुके हैं। वह पंजाब में कैप्टन अमरिंदर के सलाहकार हैं। इस समय विपक्ष को पीके की जरूरत महसूस हो रही है। ऐसे में वह अगर कोई बात करते हैं ,तो कोई पार्टी उसे अनसुना नहीं करना चाहेगी।

                                                           पवार ही क्यों

शरद पवार एक कद्दावर नेता हैं। उनके बारे में बताया जाता है कि उनके दोस्त सभी दलों में हैं। महाराष्ट्र में अपने बागी भतीजे अजीत पवार को वापस लाने में जिस तरह की उन्होंने रणनीति अपनाई, उसने उनकी राजनीतिक परिपक्वता एवं चाणक्य नीति का लोहा मनवाया। पवार राजनीति के मझे हुए खिलाड़ी हैं। राजनीति और सरकार का उन्हें व्यापक अनुभव है। कुछ समय पहले उन्हें यूपीए की कमान सौंपे जाने की चर्चा भी चली है। पवार के कई दलों के साथ मधुर संबंध हैं। ममता और पवार दोनों के एक साथ आने और उनके साथ अन्य क्षेत्रीय दलों के साथ खड़े होने पर एक तीसरे मोर्चे को शक्ल मिल सकती है। फिलहाल, पवार के आवास पर होने वाली बैठक में शामिल होने वाले नेताओं से इस मोर्चे की एक बानगी देखने को मिल सकती है।

 तीसरा या चौथा मोर्चा भाजपा को चुनौती नहीं दे सकता : प्रशांत किशोर 

 

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के प्रमुख शरद पवार से 15 दिनों के भीतर दो बार मुलाकात करने को लेकर चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर के तीसरा मोर्चा बनाने को लेकर लगाई जा रही अटकलों के बीच  प्रशांत किशोर ने कहा कि उन्हें नहीं लगता कि तीसरा या चौथा मोर्चा भारतीय जनता पार्टी  को चुनौती दे सकता है। उन्होंने 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए विपक्षी मोर्चे में अपनी भूमिका से भी इनकार किया है।उन्होंने कहा कि मौजूदा राजनीतिक हालातों में तीसरे मोर्चे की कोई भूमिका नहीं है।उनका यह  बयान ऐसे समय में आया है, जब शरद पवार से उनकी मुलाकात को तीसरे मोर्चे की एकजुटता के तौर पर देखा जा रहा था।

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