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दिल्ली के सत्ता गलियारों में इन दिनों ‘हमारे दो’ की चर्चा सर्वत्र सुनी जा सकती है। तेल, स्टील, कोयला, मीडिया, जल मार्ग, हवाई मार्ग, कृषि से लेकर लगभग हर क्षेत्र में तेजी से चल रही निजीकरण की कवायद का सबसे ज्यादा लाभ इन्हीं ‘हमारे दो’ को मिलता स्पष्ट नजर आ रहा है। इतना ही मानो काफी नहीं था, अब भारत की विदेश नीति पर भी इन दोनों का साया पड़ने लगा है। खबर गर्म है कि पिछले दिनों श्रीलंका के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र संघ में मानवाधिकार उल्लंघन के प्रस्ताव में भारत का गैर हाजिर रहना अपने पड़ोसी देशों संग संबंध प्रगाढ़ करने की ‘नेबरहुड फस्र्ट’ नीति का होना तो था ही, असल कारण श्रीलंका के कोलंबो बंदरगाह का ठेका अडानी समूह के नाम किया जाना रहा। ईस्टर्न कंटेनर टर्मिनल प्रोजेक्ट श्रीलंका की पिछली सरकार के समय अड़ानी समूह को मिला था। राजपक्षे सरकार ने लेकिन सत्ता में आते ही इस करार को रद्द कर डाला था। चर्चा जोरों पर है कि भारत सरकार की तरफ से अड़ानी समूह के लिए श्रीलंका पर जबरदस्त दबाव बनाया गया। राजपक्षे सरकार ने इस दबाव के आगे घुटने टेकते हुए ईस्टर्न के बजाए जब वेस्टर्न कंटेनर टर्मिनल का काम अडानी के हवाले किया तब कहीं जाकर उसे संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत का साथ मिल पाया। विदेश मामलों के जानकारों की माने तो यह हमारी स्थापित विदेश नीति से पूरी तरह हटकर लिया गया निर्णय है। भारत हमेशा से ही श्रीलंका के तमिल अल्पसंख्यकों पर हुए अत्याचारों के लिए श्रीलंका का आलोचक रहा है। श्रीलंका सेना पर लगभग सवा लाख तमिलों की हत्या का आरोप है।  ऐसे में जबकि तमिलनाडु में राज्य विधानसभा के चुनाव चल रहे हों, भारत सरकार का इतने संवेदनशील मुद्दे पर तमिलनाडु की जनभावनाओं को दरकिनार कर श्रीलंका सरकार की मदद करना बेहद चैंकाने वाला निर्णय है। गौरतलब है कि अस्सी के दशक में श्रीलंका में अलग राष्ट्र की मांग को लेकर श्रीलंकाई तमिलों के संघर्ष के दौरान वहां की सेना पर मानवाधिकार उल्लंघन के गंभीर आरोप लगे थे। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी और श्रीलंका के तत्कालीन राष्ट्रपति जेआर जयर्वधने की पहल पर दोनों देशों के मध्य एक समझौता हुआ और भारतीय सेना को श्रीलंका भेजा गया था।

भारत हमेशा से ही श्रीलंकाई सेना द्वारा तमिलों के नरसंहार का मुद्दा अंतरराष्ट्रीय मंचों में उठाता रहा है। इस बार लेकिन उसके श्रीलंका के साथ खड़े होने को लेकर सवाल उठ रहे हैं। वह भी ऐसे समय में जब तमिलनाडु में भाजपा अन्नाद्रमुक संग गठबंधन कर चुनाव मैदान में है। संयुक्त राष्ट्र में लाए गए प्रस्ताव से पहले विदेश मंत्री एस जयशंकर कोलंबो की यात्रा पर गए थे। चर्चा गर्म है कि उनकी यात्रा बाद ही अड़ानी समूह को बंदरगाह का ठेका मिला और भारत ने श्रीलंका के खिलाफ वोटिंग में भाग नहीं लिया। इन चर्चाओं का बाजार इसलिए भी खासा गर्म है, क्योंकि म्यांमार में आंग सांन सूकी सरकार का तख्ता पलट सत्ता में काबिज हुई सेना के अत्याचारों पर भी भारत सरकार खामोश है। अमेरिका सहित कई देशों ने म्यांमार पर कठोर प्रतिबंध लगा डाले है। विश्व भर से वहां तत्काल लोकतंत्र बहाली की मांग उठ रही है। लेकिन हमारी सरकार उदासीन नजर आ रही है। विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र यदि खामोश है तो इसके पीछे भी अड़ानी समूह के व्यापारिक हितों की बात उठने लगी है। अड़ानी समूह को म्यांमार में भी एक बड़े बंदरगाह को बनाने का ठेका दिया गया है। जानकारों का दावा है कि सेना के बड़े अफसरों संग अड़ानी समूह के मधुर रिश्तों चलते ही यह ठेका उसे हासिल हुआ है। एबीसी न्यूज एजेंसी ने तो बकायदा अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि 2019 में अड़ानी गु्रप के सीईओ करण अड़ानी और म्यांमार के जनरल मिन आंग हैंग के मध्य मुलाकात हुई थी। हालांकि अड़ानी इससे इंकार करता आया है। लबोलुआब यह कि विपक्ष लाख चिल्लाए, राहुल गांधी बार-बार ‘हम दो-हमारे दो’ का तंज मोदी सरकार पर कसें, सरकार बेपरवाह है और इनके व्यापारिक हितों को साधने के लिए देश की विदेश नीति तक से छेड़छाड़ कर सकती है।

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