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उत्तराखण्ड के एक बुजुर्ग कलाकार सितंबर माह के अंतिम दिन जंतर-मंतर पर हाथों में एक कठपुतली लेकर बैठे थे। वह अकेले नहीं थे। उनके साथ हजारों बुजुर्ग थे। लेकिन कठपुतली सिर्फ उन्हीं के हाथ में थी। उनका नाम था, रामलाल। वह उत्तराखण्ड से यहां पहुंचे थे। हजारों में कुछ ही उत्तराखण्ड के बुजुर्ग थे। और बुजुर्ग अलग-अलग राज्यों से अपनी मांगों के साथ दिल्ली पहुंचे थे। सभी बुजुर्ग पेंशन परिषद के बैनर तले दिल्ली में दो दिवसीय आंदोलन के लिए इक्ट्ठा हुए थे।

बुजुर्ग वृद्धावस्था पेंशन बढ़ाने सहित कुल 15 मांगों के साथ उन्होंने 30 सितंबर और 1 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर धरना दिया। आज कई राज्यों में मात्र चार सौ रुपए मासिक वृद्धावस्था पेंशन है। जो ऊंट के मुंह में जीरा के समान है। रोजगार गारंटी योजना और सूचना का अधिकार कानून बनाने के लिए सरकार को बाध्य करने वाली सामाजिक कार्यकर्ता अरूणा रॉय इस आंदोलन की अगुवाई कर रही हैं। आंदोलन के दो दिन अरुणा रॉय जंतर-मंतर पर डटी रहीं और बुजुर्गों के साथ नारा लगाती रहीं। जंतर-मंतर पर इक्ट्ठा हुए बुजुर्गों के नारों और उत्साह को देखकर कोई नहीं कह सकता कि उनका कंधा कमजोर हो गया है। उनकी कमर झुकी नहीं है। पैर अभी थके नहीं हैं। उनके नारे में वही जोश-खरोश था जो कॉलेजों के युवा ब्रिगेड में दिखता है।

दो दिन सभी बुजुर्गों ने खुले आसमान के नीचे सड़कों पर गुजारा। इस उम्मीद के साथ कि शायद केंद्र सरकार उनकी मांगें मान ले और खुशनुमा चेहरे के साथ घर पहुंचें। लेकिन इन्हें आश्वासन भी नहीं मिला। उत्तराखण्ड से कठपुतली लेकर आए रामलाल से जब पूछा कि ये मुर्दा कठपुतली क्या कहना चाहती है। वह बोले, ‘नेताओं को जिंदगी भर तनख्वाह मिलती रहती है। सरकारी अफसरों को लाखों में पेंशन मिलती है। गरीब आदमी जिसने सारी जिंदगी खेतों में काम किया, देश का पेट भरा, छत बनाई, मजदूरी की, लेकिन जब उनके कंधे कमजोर होते हैं तो हमें क्या मिलता है। इसलिए हमें कम से कम तीन हजार पेंशन तो दो।’

जंतर-मंतर पर वृद्धावस्था पेंशन बढ़ाने की मांग को लेकर अलग-अलग राज्यों से आए छोटे-छोटे संगठनों के प्रतिनिधि एक- एक करके अपनी-अपनी भाषा में भाषण दे रहे थे। अलग-अलग राज्यों की सांस्कøतिक प्रस्तुतियां हो रही थी। बिहार की महिलाएं एक समूह गीत गा रही थी, जिसके बोल थे, ‘दिल्ली के मोदी, एतना बेदर्दी।’ बुजुर्ग महिला और पुरुष सभी रह-रहकर ‘पेंशन का हक’ जैसे नारे लगा रहे थे। आयोजकों द्वारा बांटे गए टोपी और बिल्लों में भी ‘पेंशन का हक’ जैसे नारे ही लिखे थे।

दरअसल, वृद्धावस्था पेंशन योजना में केंद्र और राज्य दोनों सरकारें मिलकर योगदान करती हैं। राज्यों के अंशदान की रकम अलग-अलग है। यह सभी राज्यों ने अपने हिसाब से घोषणा कर रखी है। इस पेंशन में केंद्र का अंशदान 200 रुपए है। यह अंशदान बीते 11 साल से है। इसमें कोई बदलाव नहीं किया गया है। इन प्रदर्शनकारियों की मांग है कि केंद्र सरकार को अपना अंशदान बढ़ाना चाहिए।

राजस्थान के टोंक जिले के रहने वाले 80 साल के वली मोहम्मद भी यहां पहुंचे हैं। वे देख नहीं सकते। परिवार से अलग रहते हैं और कहते हैं कि उनके बच्चे उनकी कद्र नहीं करते। उन्हें सात सौ रुपये पेंशन मिलती है, पर उससे उनका गुजारा नहीं होता। वह बताते हैं, ‘मुझे अटैक (हार्ट अटैक) आया हुआ है। जब 2014 में मुझे पहला अटैक आया तो मेरी जमा-पूंजी इलाज में लग गई। मैं गोलियां साथ लेकर चलता हूं। डॉक्टरों ने मेरी आंखों पर जवाब दे दिया है, पर यहां इस उम्मीद से आया हूं कि कैसे भी मेरी पेंशन बढ़ा दी जाए तो कम से कम मेरे दिल का इलाज चलता रहे।’

यह विरोध प्रदर्शन एनजीओ हेल्प एज इंडिया और पेंशन परिषद की ओर से आयोजित किया गया है। पेंशन परिषद कई राज्यों के छोटे-छोटे मजदूर और सामाजिक संगठनों का समूह है। पेंशन परिषद से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता निखिल डे बताते हैं कि कई जगहों पर राज्य सरकारें केंद्र की तुलना में पांच से आठ गुना अंशदान दे रही हैं। निखिल डे के मुताबिक, गोवा और दिल्ली में वृद्धावस्था पेंशन की रकम दो हजार रुपये मासिक है। हरियाणा और आंध्र प्रदेश में ये रकम एक हजार रुपये के करीब है। वहीं हिमाचल, राजस्थान, महाराष्ट्र, बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश में यह 400 से 600 रुपये के बीच है। वह कहते हैं, ‘जहां 400 रुपये मिलते हैं, वहां बुजुर्गों को 14 रुपये प्रतिदिन पर गुजारा करना पड़ता है। 14 रुपये रोज पर कोई बुजुर्ग अपनी जिंदगी कैसे काट सकता है। दवाई चाहिए, खाना चाहिए, इज्जत से जीना है।’

प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांग ये है कि न्यूनतम मजदूरी का कम से कम 50 फीसदी वृद्धावस्था पेंशन मिलनी चाहिए। आंदोलन के पहले दिन सामाजिक कार्यकर्ता अरुणा रॉय मंच से नारा लगवा रही थीं। उनका नारा था, ‘वोट चाहिए तो पेंशन तीन हजार। हमारी पेंशन कितनी हो, तीन हजार, तीन हजार, तीन हजार।’ यहां पहुंचे ज्यादातर प्रदर्शनकारियों का ताल्लुक गांवों से है। उनमें से बहुत से लोग अशिक्षित भी हैं। लेकिन तीन हजार का नारा सब लगा रहे थे। यहां आए बुजुर्गों से बात करने पर पेंशन के अलावा ग्रामीण भारत की समस्याएं भी उभरकर सामने आई। वृद्धावस्था से विधवा पेंशन पर आई। फिर कुछ महिलाएं मनरेगा और राशन की समस्याओं पर भी बात करने लगी।

राजस्थान से आईं मूमी बाई से बात की। मूमी हिंदी नहीं बोलतीं हैं। टूटी-फूटी राजस्थानी में बोलती हैं। जिसका सार यही था कि मौजूदा पेंशन से जीवन नहीं चल रहा है। बेटा देखभाल नहीं करता। पेंशन से गुजारा नहीं चलता। इसलिए हमलोगों की मांग है कि पेंशन कम से कम उतनी मिले, जिससे पेट भर सकूं। दिल्ली आए लोग चंदा जमा करके अपने-अपने गांव से भेजे गए हैं। बिहार से आई एक महिला ने कहा, ‘चंदा करके आए हैं और क्या हमने घर में कमाकर रख दिया है जो उससे यहां आएंगे। गरीब लोग हैं, भूखे मरते हैं, कहां से लाएंगे भाड़ा।’

बिहार के अररिया जिले से आईं मांडवी ने कहा कि सरकार ने उनकी नहीं सुनी तो वो गांव-गांव जाकर एक-एक आदमी को संगठित करेंगी और इस सरकार को वोट नहीं देंगी। चुनावी साल में गरीब बुजुर्गों का यह रुख मोदी सरकार के लिए खतरा पैदा कर सकता है। निखिल डे कहते हैं, ‘पिछली सरकार के समय भी हम जंतर-मंतर पर 15 हजार लोग इकट्ठे हुए थे। वे कम से कम बात करने आए थे। तब कुछ बात आगे बढ़ी थी। लेकिन इस सरकार में तो कोई बात करने भी नहीं आ रहा।’

जब उनसे पूछा कि कोई बात करने नहीं आता तो दो दिन के प्रदर्शन से क्या हासिल हुआ तो वह बोलते, ‘इससे ये होगा कि गांव-गांव में संदेश जाएगा कि वहां भी पेंशन परिषद बनाओ और वोट मांगने नेता लोग आएं तो उन्हें मांग पत्र दिखाओ। भारत में गांव स्तर के काम के लिए भी दिल्ली के ही कान खटखटाने पड़ते हैं कभी-कभी। जबकि होना चाहिए कि ग्रामीणों का काम और मांग गांव में ही पूरा हो जाना चाहिए। उन्हें दिल्ली आने की जरूरत ही क्यों पड़ेगी।’ बात सिर्फ पेंशन बढ़ाने भर की नहीं है। चार सौ रुपए मिलने वाला वृद्धावस्था पेंशन भी सभी को नहीं मिलती। कुछ लोगों को ही मिलती है। इसलिए इन लोगों की मांग सभी को पेंशन देने की भी है। बुजुर्गों का यह आंदोलन भविष्य में कहां तक पहुंचता है, देखना होगा।

 

‘पेंशन के अलावा कई स्कीमें हैं’

पूर्व केंद्रीय मंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता शाहनवाज हुसैन से पेंशन की मांग पर बातचीत

कोई बुजुर्ग चार सौ रुपए में कैसे गुजारा कर सकता है?
हम मानते हैं कि 400 रुपए की रकम कम है। इसमें केंद्र 200 रुपए का अंशदान देता है। कई राज्यों में वृद्धावस्था पेंशन दो हजार रुपए भी है। राज्य अपना हिस्सा बढ़ा कर देते हैं। इसलिए वृद्धावस्था, विधवा, विकलांग आदि पेंशन में राज्य की हिस्सेदारी ज्यादा होती है। राज्य सरकार अपनी आर्थिक स्थिति को देखकर अपना अंशदान देती है।

केंद्र ने 11 सालों से अपना अंशदान दो सौ रुपए से क्यों नहीं बढ़ाया?
किसी भी सोशल सिक्योरिटी स्कीम में लाभार्थी मांग कर सकते हैं और करते भी हैं। जनकल्याणकारी योजनाओं की समग्रता में पहुंच देखनी चाहिए। यह इकलौती योजना तो है नहीं। ऐसा तो है नहीं कि जिसको इस योजना का लाभ मिलेगा, उसे दूसरी योजना का लाभ नहीं मिलेगा। हम इस बात से इनकार नहीं कर रहे कि केंद्र को अपना अंशदान बढ़ा देना चाहिए। लोगों ने मांग रखी है तो सरकार जरूर इस पर विचार करेगी ही।’

गरीबों का ख्याल केंद्र नहीं रखेगा तो कौन रखेगा?
केंद्र सरकार का फोकस समाज के पिछड़े वर्ग, सुदूर इलाकों में जीवन की गुणवत्ता बेहतर करने पर रहा है। केंद्र सरकार की 116 योजनाएं हैं जो गरीब कल्याण, पिछड़े वर्ग और सुदूर इलाकों की बेहतरी के लिए हैं। चाहे आप उज्ज्वला को ले लें, उजाला योजना को ले लें, डायरेक्ट बेनेफिट ट्रांसफर जैसी योजनाएं हों या नई आयुष्मान भारत योजना, सोशल सिक्योरिटी पर बात करते हुए इनकी आप पूरी तरह अनदेखी नहीं कर सकते।

 

‘गरीबों को मिले सोशल सिक्योरिटी’

सामाजिक कार्यकर्ता अरुणा रॉय से बातचीत

पेंशन बढ़ाने के लिए दिल्ली में आंदोलन क्यों?
यहां जितने लोग आए हैं, सभी गरीब हैं। इन लोगों ने मजदूरी करके कमाया-खाया और देश को बनाया है। हमारी इमारतें बनाईं, हमारी सड़कें बनाईं, हमारी खेती की है। मजदूरी के अलावा कभी कुछ नहीं मांगा। एक उम्र के बाद हाथ-पांव चलते नहीं हैं। इस देश में सोशल सिक्योरिटी के नाम पर कुछ नहीं है। दिल्ली की केंद्र सरकार इन्हें केवल दो सौ रुपए पेंशन देती है। वह भी टारगेटेड है, यानी सभी बुजुर्गों को नहीं मिलती है। दिल्ली की सरकार नहीं मानी तो आंदोलन गांव-गांव में होगा।

क्या आपकी मांग सिर्फ पेंशन में वृद्धि कराना है?
नहीं, पेंशन की रकम के अलावा भी कई मांगें हैं। दूसरी मांग है, पेंशन को सार्वभौमिक (सभी के लिए) बनाया जाए। पेंशन की लाभार्थियों की संख्या वरिष्ठ नागरिकों की आबादी के हिसाब से नहीं है। कई जगहों पर सरकार ने एक कोटा तय किया हुआ है। बहुतों को यह चार सौ रुपए की पेंशन भी नहीं मिलती है। शायद इनका नंबर तब आएगा, जब पेंशन लेने वाले लाभार्थियों में से किसी की मौत हो जाएगी।

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