Country

सबसे बड़े लोकतंत्र के पहले प्रधान

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का पहला चुनाव। पूरा देश अपने पहले प्रधानमंत्री को अपने क्षेत्र से प्रत्याशी के तौर परन देखने को उत्सुक। आखिर पंडित नेहरू किस क्षेत्र को अपनी कर्मभूमि बनाएंगे? कहां की जनता अपना पहला प्रधानमंत्री चुनेगी? यह मौका मिला फूलपुर की जनता को। उत्तर प्रदेश के फूलपुर से पंडित नेहरू ने पहला चुनाव लड़र। अंतिम समय तक संसद में वे यहां का प्रतिनिधित्व करते रहे। इस कारण यह फूलपुर लोकसभा क्षेत्र ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण हो गया। सिर्फ पंडित नेहरू ही नहीं, बल्कि कई अन्य बड़ी हस्तियों ने भी इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया है। इस क्षेत्र ने देश को दो प्रधानमंत्री दिए। कई दिग्गज यहां से चुनाव जीते हैं, तो कई दिग्गजों को इस क्षेत्र ने हराया भी है। पंडित नेहरू, विश्वनाथ प्रताप सिंह, राम मनोहर लोहिया, विजय लक्ष्मी पंडित, जनेश्वर मिश्र, कमला बहुगुणा, कांशीराम, अपना दल के संस्थापक सोनेलाल पटेल जैसे बड़े नेताओं ने यहां से चुनाव लड़ा। इनमें से कुछ को यहां के लोगों ने पसंद किया तो कुछ को निराशा भी हाथ लगी। हालांकि पहले लोकसभा चुनाव में फूलपुर नाम की कोई सीट नहीं थी। यह इलाहाबाद पूर्वी जिला एवं जौनपुर पश्चिमी जिला के नाम से जानी जाती थी। नेहरू यहीं से पहले चुनाव जीत संसद पहुंचे थे। नेहरू 1957 में भी यहीं से चुनाव लड़े और जीते। तीसरे लोकसभा चुनाव 1962 में नेहरू के सामने समाजवादी चिंतक राम मनोहर लोहिया थे। नेहरू की कई नीतियों के विरोधी लोहिया ने उनके खिलाफ चुनाव लड़ने का फैसला किया। बताया जाता है कि चुनाव पूर्व लोहिया ने नेहरू की तारीफ करते हुए उन्हें एक पत्र लिखा। पत्र पढ़ने के बाद नेहरू ने निर्णय लिया कि वह चुनाव प्रचार नहीं करेंगे। मगर लोहिया की बढ़ती लोकप्रियता से वे घबरा गए। उन्होंने अंततः अपने क्षेत्र में प्रचार किया और लोहिया को हरा दिया। 1964 में नेहरू ने निधन तक इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। कांग्रेस ने उपचुनाव में नेहरू की बहन विजय लक्ष्मी पंडित को उम्मीदवार बनाया। उनके सामने वरिष्ठ समाजवादी जनेश्वर मिश्र खड़े थे। विजय लक्ष्मी ने नेहरू की इस विरासत को बखूबी संभाला। 1967 के चुनाव में भी विजय लक्ष्मी ने विजय पताका लहराई। 1969 में विजय लक्ष्मी पंडित ने संयुक्त राष्ट्र में प्रतिनिधि बनने के बाद इस्तीफा दे दिया। उसके बाद यहां हुए उपचुनाव में कांग्रेस ने नेहरू के सहयोगी केशवदेव मालवीय को उतारा, लेकिन संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार जनेश्वर मिश्र ने उन्हें पराजित कर दिया। इस तरह पहली बार नेहरू की यह कर्मभूमि कांग्रेस के हाथों से खिसक गई। हालांकि 1971 के चुनाव में यहां से कांग्रेस ने विश्वनाथ प्रताप सिंह को उतारा। फिर से यह सीट कांग्रेस के पास आ गई। लेकिन आपातकाल के बाद हुए चुनाव में कांग्रेस को हार का मुंह देखना पड़ा। उसके बाद फिर कभी कांग्रेस नेहरू की इस सीट पर वापसी नहीं कर पाई है। 1984 में इंदिरा की हत्या के बाद सहानुभूति लहर में यह सीट कांग्रेस के पास आई, पर यहां से जीते सांसद (राम पूजन पटेल) कांग्रेस को छोड़ जनता दल में चले गए। उसके बाद से नेहरू की इस सीट पर वापसी के लिए कांग्रेस छटपटा रही है। मगर उसकी छटपटाहट खत्म नहीं हो पा रही है। कांग्रेस पहले प्रधानमंत्री की सीट को अपने पास बचाकर नहीं रख पाई। नेहरू के रहते फूलपुर में उनका कोई खास विरोध नहीं होता था। वे आसानी से चुनाव जीत जाते थे। यहां तक कि उनके विजय रथ को प्रख्यात समाजवादी डॉ लोहिया भी नहीं रोक सके। विरोधी होने के बावजूद नेहरू ने लोहिया को राज्यसभा पहुंचाने में मदद की क्योंकि नेहरू का मानना था कि लोहिया जैसे आलोचक का संसद में होना बेहद जरूरी है। नेहरू की इस सीट पर मंडल का असर तो पड़ा, लेकिन कमंडल का असर नहीं हुआ था। राम लहर में भी यहां से बीजेपी जीत हासिल नहीं कर सकी। जीत तो छोड़िए कई बार तो उसे तीसरे या चौथे नंबर पर ही संतोष करना पड़ा। 2009 तक तमाम कोशिशों और समीकरणों के बावजूद भारतीय जनता पार्टी इस सीट पर जीत हासिल करने में नाकाम रही। साल 2014 में पहली बार नेहरू की यह विरासत जनता दल, समाजवादी पार्टी, बसपा से होते हुए भगवा ब्रिगेड के पास आ गई। लेकिन आखिरकार 2014 में यहां की जनता ने जैसे बीजेपी के अरमान पूरे कर दिए। यहां से केशव प्रसाद मौर्य ने बीएसपी के मौजूदा सांसद कपिलमुनि करवरिया को तीन लाख से भी ज्यादा वोटों से हराया। बीजेपी के लिए ये जीत इतनी अहम थी कि पार्टी ने केशव प्रसाद मौर्य को इनाम स्वरूप प्रदेश अध्यक्ष भी बना दिया। लेकिन भाजपा इस सीट को ज्यादा समय तक अपने पास नहीं रख पाई। मौर्य के उपमुख्यमंत्री बनने के बाद यहां हुए उपचुनाव में यह सीट भाजपा से छीन गई। फूलपुर सीट न सिर्फ बड़े नेताओं को जिताने के लिए, बल्कि कई दिग्गजों को धूल चटाने के लिए भी मशहूर है। फूलपुर का प्रतिनिधित्व नेहरू के बाद उनकी बहन विजय लक्ष्मी पंडित, विश्वनाथ प्रताप सिंह, जनेश्वर मिश्र, कमला बहुगुणा जैसी बड़ी शख्सियतों ने किया। यहां से हारने वाले दिग्गजों की सूची भी कम छोटी नहीं है। चाहे वो लोहिया हों, छोटे लोहिया (जनेश्वर मिश्र) हों या फिर कोई और। बीएसपी के संस्थापक कांशीराम यहां से खुद चुनाव हार चुके थे। अपना दल के संस्थापक सोनेलाल पटेल भी दो बार यहां से किस्मत आजमा चुके हैं। मगर उन्हें भी हार का सामना करना पड़ा। 1996 के लोकसभा चुनाव में उनकी जमानत जब्त हो गई जबकि 1998 में वो जमानत तो बचाने में कामयाब रहें लेकिन जीत से कोसों दूर रहे। इस चुनाव में एक बार फिर फूलपुर सीट पर सबकी नजर है। कोई यह देखना चाहता है कि कांग्रेस नेहरू की इस विरासत को वापस अपनी झोली में ला पाती है या नहीं। कुछ की दिलचस्पी इसलिए है कि वह देखना चाहते हैं कि 2014 में फिर से यहां भगवा पताका लहराती है या नहीं।

 

लोकसभा चुनाव का इतिहास

आज पूरे देश के मतदाता अपने क्षेत्र से एक सांसद चुनते हैं। लेकिन एक समय ऐसा था जब कुछ क्षेत्रों के मतदाता दो या तीन सांसद चुनकर संसद भेजते थे। यह व्यवस्था पहले और दूसरे लोकसभा चुनाव तक थी। इस व्यवस्था को 1962 में समाप्त कर दिया गया। पहला लोकसभा चुनाव अक्टूबर 1951 से फरवरी 1952 के बीच हुआ था। उसमें 401 संसदीय क्षेत्रों में 489 सांसदों के लिए मतदान हुआ था। उस चुनाव में 314 संसदीय क्षेत्र एक सांसद वाले और 86 संसदीय क्षेत्र दो सांसदों वाले थे। पश्चिम बंगाल के एक संसदीय क्षेत्र से तीन सांसद चुने गए थे। दूसरे लोकसभा चुनाव 1957 में 403 संसदीय क्षेत्रों की 494 सीटों के लिए चुनाव हुआ था। इस आम चुनाव में 312 संसदीय क्षेत्र एक सांसद वाले और 91 संसदीय क्षेत्र दो सांसदों वाले थे। 1951 में हुआ पहला चुनाव कई मायने में महत्वपूर्ण रहा। आजादी और देश का संविधान बनने के बाद हुए पहले चुनाव में कांग्रेस का बोलबाला था। पूरे देश में कांग्रेस का प्रभुत्व था। कांग्रेस के प्रभुत्व के बीच 47 निर्दलीय सदस्य भी चुने गए।

You may also like