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बुनियादी सुविधाओं से महरूम महिला कैदी

देशभर में 60 फीसदी महिला कैदियों को माहवारी में सेनेटरी पैड नहीं मिलते हैं। उनके पास न सोने की जगह है, न नहाने के लिए पर्याप्त पानी। 2014 से 2019 के बीच महिला कैदियों की संख्या 11.7 फीसदी बढ़ी है। लेकिन सिर्फ 18 प्रतिशत महिला कैदियों को जेल में जगह मिली पाई है, वहीं 75 फीसदी को रसोई और शौचालय तक पुरुषों के साथ साझा करना पड़ता है। जेलों की खराब स्थिति की यह तस्वीर जस्टिस अमिताव राय की अध्यक्षता वाली कमेटी की एक रिपोर्ट में सामने आई है। जिसके अनुसार महिला कैदी बुनियादी अधिकारों से महरूम है

देश भर में महिलाओं के खिलाफ बढ़ रहे अत्यचारों को रोकने के लिए सरकार के द्वारा काफी योजनाएं, कार्यक्रम आदि शुरू किए गए हैं। समय के साथ महिलाएं भी अपने अधिकारों लिए आवाज उठाने लगी हैं लेकिन उन महिलाओं का क्या जिनकी आवाजें हम तक नहीं पहुंच पाती? जो एक ऐसे माहौल में रहती हैं जहां उनके अधिकारों का लगातार हनन हो रहा है। भारत में महिला कैदियों की हालत पुरुष कैदियों से कहीं ज्यादा बदतर है। 2014 से 2019 के बीच महिला कैदियों की संख्या 11 .7 फीसदी बढ़ी है, लेकिन सिर्फ 18 प्रतिशत महिलाओं को जेल में रहने के लिए जगह मिल पाई है। 75 फीसदी को रसोई और पतनालों में सोना पड़ रहा है। इतना ही नहीं शौचालय को पुरुषों के साथ साझा तौर पर इस्तेमाल करना पड़ता है। महिलाओं के माहवारी के दिनों में उन्हें सेनेटरी पैड मुहैया नहीं कराए जा रहे हैं। गर्भवती महिलाओं को समय पर ट्रीटमेंट भी उपलब्ध नहीं हो पा रहा है।

वर्ष 2018 में न्यायमूर्ति मदन बी ़लोकुर और उच्चतम न्यायालय की पीठ दीपक गुप्ता की सुप्रीम कोर्ट बेंच ने चिंता जताई थी कि कई राज्यों की जेलों में क्षमता से 150 प्रतिशत ज्यादा कैदी हैं। इसको मानवाधिकार हनन का गंभीर मामला बताते हुए एक कमेटी बनाई गई थी। तीन सदस्यों वाली इस कमेटी का मकसद यह जानना था कि देश की जेलों में क्या हालात हैं। जेलों की इस खराब स्थिति की तस्वीर न्यायमूर्ति अमिताव राय की अध्यक्षता वाली कमेटी की दिसंबर 2022 में जारी रिपोर्ट से सामने आई है। इससे पहले वर्ष 2018 में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने जेल में महिलाओं के हाल पर एक रिपोर्ट बनाई थी जिसमें महिला कैदियों की खराब स्थिति का जिक्र किया गया था।

जर्जर हालत में सवाई माधोपुर जेल का शौचालय

जस्टिस अमिताव राय की यह रिपोर्ट उस स्थिति की ओर इशारा करती है जो नेशनल क्राइम रजिस्ट्रेशन ब्यूरो (एनसीआरबी) की वर्ष 2021 की रिपोर्ट में भी देखने को मिलती है। एनसीआरबी की रिपोर्ट में भी यह सामने आया कि 21 राज्यों में महिलाओं के लिए अलग जेल भी नहीं है। जेलों में महिला कैदियों की क्षमता 6 हजार 767 है। लेकिन इससे कहीं ज्यादा, करीब 22 हजार 659 महिला कैदियों को राज्यों की जेलों में मर्दों के साथ ही रखा जाता है। जैसा कि महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की 2018 की रिपोर्ट जिक्र करती है, ऐसी जेलों में महिला कैदी सुरक्षित नहीं हैं। मर्दों के साथ शौचालय इस्तेमाल करने से महिलाओं के यौन उत्पीड़न और दुर्व्यवहार का खतरा भी बढ़ता है। अगर महिलाओं के खिलाफ जेल में कोई अपराध होता भी है तो केवल 11 राज्यों के पास ऐसी व्यवस्था है कि कैदियों की शिकायतें दर्ज की जा सकें, अन्यथा महिलाओं के खिलाफ जेल में हुए अपराधों का एनसीआरबी के पास कोई आंकड़ा नहीं है।

नेशनल प्रिजन मैन्युअल के मुताबिक हर जेल में एक महिला डीआईजी का होना जरूरी है लेकिन किन जेलों में महिला डीआईजी हैं इस पर भी सरकार के पास कोई डाटा नहीं है। यहां तक कि दिल्ली की मशहूर तिहाड़ जेल की वेबसाइट से पता चलता है कि वहां कोई भी महिला डीआईजी नहीं है। आंकड़े यह भी बयां करते हैं कि भारत में केवल 4 हजार 391 महिला जेल अधिकारी हैं जो कुल क्षमता से काफी कम हैं। वर्ष 2022 की रिपोर्ट में कहा गया है कि महिलाओं की तलाशी लेने की ट्रैनिंग भी नहीं हो रही है। जेल में औरतों के पास यह अधिकार हैं कि वह अपने बच्चों से एक अलग आवास में मिल सकती हैं। मगर जस्टिस अमिताव राय की रिपोर्ट कहती है कि सिर्फ तीन राज्य यानी गोवा, दिल्ली, और पुडुचेरी में महिलाओं को बिना बार या कांच की दीवार के मिलने दिया जाता है।

राष्ट्रीय जेल मैनुअल के मुताबिक जेल में हर कैदी के पास 135 लीटर पानी होना चाहिए, लेकिन वर्ष 2018 की रिपोर्ट में पहले ही यह सामने आ चुका था कि किसी भी जेल में ऐसे किसी भी कानून का पालन नहीं किया जा रहा है। इससे महिला कैदी सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। जस्टिस राय की रिपोर्ट में कहा है कि महिलाओं को सेनेटरी पैड भी नहीं दिए जाते हैं। वह अपने माहवारी के दिनों में गंदा कपड़ा इस्तेमाल करने को विवश हैं।

महिलाओं के स्वास्थ्य की देखरेख के लिए डॉक्टर की सुविधा भी नहीं है। ‘बुनियादी न्यूनतम सुविधाएं’ जैसे गर्भवती होने पर जेल में डॉक्टर को दिखाने की सुविधा भी औरतों को आसानी से नहीं मिल पाती हैं। जिसके कारण आये दिन जेल में महिला और उसके बच्चे की मौत की सूचनाएं मिलती रहती है। जेल में हर साल बच्चे पैदा होते हैं, लेकिन इसके बारे में कोई ठोस डाटा एनसीआरबी के पास मौजूद नहीं है। रानी धवन शंकरदास जेल सुधार मामलों की विशेषज्ञ हैं और पीनल रिफॉर्म इंटरनेशनल की अध्यक्ष रह चुकी हैं। महिला कैदियों की जिदगी पर लिखी अपनी किताब ‘ऑफ विमेन इनसाइडः प्रिजन वॉइसेज फ्रॉम इंडिया’ में वे कहती हैं कि जेल प्रशासन भले ही कैदियों को उनके अपराधों के हिसाब से वर्गीकृत करते हैं, मगर महिला कैदियों को एक अलग श्रेणी की जरूरत है। महिला अपराधियों के साथ सिर्फ उनका अपराध ही नहीं जुड़ा होता, बल्कि सामाजिक रीतियां भी जुड़ी होती हैं­। कानून से पहले समाज उनके अपराधी होने पर कठोर सजा तय कर चुका होता है। वह जब तक जेल पहुंचती हैं तब तक वह समाज के द्वारा अपने गुनाह की सजा काट चुकी होती हैं।

 

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