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कोरोना से दो बेटों की जान जाने का गम सहन न कर पाए पिता की भी हुई मौत

ग्रेटर नोएडा का जलालपुर गांव। इस गांव की गलियों में सन्नाटा पसरा हुआ है। कोरोना वायरस ने जिस तरह से इस गांव में कहर बरपाया उससे न केवल गांव के लोग दहशत में हैं, बल्कि आसपास के गांव में भी कोरोना की महामारी का भयावह रूप चर्चा  का विषय बना हुआ है।

 गत 28 अप्रैल से गांव में मौत का तांडव शुरू हुआ था, जो अभी भी जारी है। गांव में कोरोना का सबसे बडा कहर अतर सिंह के घर पर टूटा है। अतर सिंह के दो बेटों की मौत हो गई है। दो जवान बेटो की मौत के बाद पिता अतर सिंह सदमे में चले गए और उसके बाद देर रात अतर सिंह की भी मौत हो गई।

जलालपुर गांव में रहने वाले अतर सिंह के दो बेटों की 9 मई को कोरोना से मौत हो गई थी।
दीपक और पंकज कोरोना पॉजिटिव हो गए थे। उनका अस्पताल में इलाज चल रहा था। 9 मई को दीपक की मौत हो गई। परिवार के सदस्य दीपक का अंतिम संस्कार कर घर पहुंचे तो वहां दूसरे बेटे पंकज ने भी दम तोड़ दिया। महज 15 दिन बाद इलाज के दौरान अतर सिंह ने भी अस्पताल में दम तोड़ दिया। गांव वालों के अनुसार 28 अप्रैल से गांव में मौत का तांडव शुरू हुआ था। यह अब भी जारी है।

सबसे पहले ऋषि नागर को कोरोना ने शिकार बनाया। ऋषि नागर को गाजियाबाद और गौतमबुद्धनगर के दर्जनों हॉस्पिटलों में ले जाया गया था। लेकिन सभी हॉस्पिटलों पर बेड ना होने के बोर्ड लगे हुए थे। जब गाजियाबाद और गौतमबुद्धनगर में ऋषि को बेड नहीं मिला तो उसे लोनी ले जाया गया जहां जाते ही उसने दम तोड़ दिया था। इसके 2 दिन बाद ही ऋषि के भतीजे की भी कोरोना संक्रमण की चपेट में आने के कारण मौत हो गई थी।

गांव में अब तक पिछले 2 महीने में 21 मौत हो चुकी है । पूर्व जिला पंचायत सदस्य रविंद्र भाटी कहते हैं कि गांव में कोई स्वास्थ्य कैंप नहीं लगा है। यहां तक कि किसी जनप्रतिनिधि ने गांव में जाकर लोगों की सुध लेना मुनासिब नहीं समझा है।

याद रहे कि “दि संडे पोस्ट” के न्यूज़ पोर्टल पर जलालपुर गांव की यह न्यूज़ प्रकाशित की गई थी । गत 13 मई को “ग्रेटर नोएडा: 20 दिन, 5 गांव, 85 मौत” शीर्षक से इस खबर को प्रमुखता से उजागर किया गया था। जिसमें अतर सिंह के दोनों बेटे की मौत के साथ ही बताया गया था कि फिलहाल अतर सिंह की हालत भी गंभीर बनी हुई है।

सोचनीय सवाल है कि मीडिया में यह मामला प्रकाशित होने के बाद भी क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों की संवेदनहीनता सामने आई। क्षेत्र के एक भी जनप्रतिनिधि ने अतर सिंह के घर झांक कर नहीं देखा। गांव वालों का कहना है कि अतर सिंह का अगर अच्छे हॉस्पिटल में इलाज कराया जाता तो वह शायद मौत के मुंह में जाने से बच जाता।

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