कमोवेश कुछ ऐसी ही स्थिति बनी हुई है पूरे उत्तर प्रदेश में। जब से यूपी की बागडोर योगी आदित्यनाथ के हाथो में आयी है और उन्होंने अपने सरकारी आवास 5, कालीदास मार्ग को गौशाला में परिवर्तित किया है तभी से यूपी के किसान अपनी फसलों की सुरक्षा को लेकर हलकान हैं। हरे-भरे लहलहाते खेतों में आवारा गोवंश घुसकर पूरी की पूरी फसल चैपट कर देता है। रही बात स्थानीय प्रशासन की भूमिका की तो किसानों को राहत पहुंचाने के लिए वास्ते किसी तरह की व्यवस्था करने के बजाए गायों के चोटिल हो जाने की दशा में किसानों को भी धमकाया जाता है। किसान पसोपेश में है कि आखिर वह जाए तो जाए कहां। 
हाल ही में सम्पन्न हुए उपचुनावों में भाजपा की हार (गोरखपुर, फूलपुर और कैराना) के पीछे तमाम अन्य कारणों के साथ ही किसानों की समस्याओं को प्रमुख कारण माना जा रहा है। दावा किया जा रहा है कि यूपी सरकार की किसान विरोधी नीति के कारण ही बहुसंख्यक किसानों ने भाजपा से दूरी बना ली है। कहा यह भी जा रहा है कि यदि अभी भी यूपी सरकार में किसानों को लेकर चेतना जागृत नहीं हुई तो निश्चित तौर पर आगामी लोकसभा चुनाव में यूपी की 80 सीटों पर भाजपा को अपनी जीत दर्ज करने के लिए नाको चने चबाने पडे़ंगे।
हाल फिलहाल किसानों की मुख्य समस्याओं में उनकी कर्जमाफी के साथ ही सबसे बड़ी समस्या आवारा गोवंश से अपने फसलों को बचाने की है। आवारा गोवंश झुण्ड में आकर खेतों में खड़ी फसलों को रौंद जाते हैं और किसान चाहकर भी कुछ नहीं कर पाता। जिस किसी किसान ने गोवंश को खदेड़ने की कोशिश की तो उसके खिलाफ स्थानीय प्रशासन कार्रवाई करने की धमकी देने लगता है।
कहना गलत नही होगा कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सख्त आदेशों के चलते स्थानीय प्रशासन गोवंश की रक्षा को लेकर कुछ ज्यादा ही सख्ती से पेश आ रहा है। एक छोटी सी शिकायत भी किसानों के लिए मुसीबत खड़ी कर रही है। स्थिति यह है कि किसान अपने खेतों मे घुसे आवारा गोवंश को लाठियों के सहारे भगाने से भी संकोच कर रहा है परिणामस्वरूप फसलों की बरबादी और सरकार की तरफ से कोई ठोस कदम न उठाए जाने से किसानों में रोष व्याप्त है। किसान अब यह बात खुलकर कहने लगा है कि गोवंश की रक्षा की आड़ में सरकार महज राजनीति कर रही है, जिसका सीधा नुकसान किसानों को उठाना पड़ रहा है।
वैसे तो गोवंशों की रक्षा को लेकर पहले से ही सख्त कानून बने हुए हैं लेकिन जब से योगी आदित्यनाथ ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली है तब से इस कानून का सख्ती के साथ पालन कराए जाने का दबाव इतना है कि यदि कोई व्यक्ति अपने मोबाइल कैमरे से ही गोवंशों को खदेड़ने सम्बन्धी तस्वीर सोशल साइट पर वायरल कर रहा है तो उसके खिलाफ कार्रवाई हो जा रही है। कहने में कतई गुरेज नहीं है कि इस वक्त यूपी में जितना आतंक गुण्डों-बदमाशों का नहीं है उससे कहीं अधिक आतंक आवारा गोवंशों से किसानों को है। जो किसान थोड़े-बहुत सक्षम हैं वे लाखों रुपया खर्च कर खेतों में बाड़ लगाकर अपनी फसलों का बचाव कर रहे हैं जबकि अधिकतर किसानों ने अपनी फसल की सुरक्षा भगवान भरोसे छोड़ रखी है।
यूपी में गोवंश के आतंक को ध्यान में रखते हुए इस संवाददाता ने राजधानी लखनऊ की तहसील मोहनलालगंज अन्तर्गत पड़ने वाले कुछ गांवों का जायजा लिया और किसानों से गोवंशीय आतंक के बारे में जानकारी हासिल की। तमाम किसानो ने व्यथा सुनायी और बोले इस बार बारिश अच्छी हुई तो गोवंश ने मुनाफा लील लिया। ऐसा लगता है मानो ईश्वर हम किसानों से रूठ सा गया हो।
चूंकि गोवंश को लेकर यूपी में जमकर राजनीति हो रही है लिहाजा सत्ताधारी दल से सम्बन्धित नेताओं की भी सुन लीजिए। सत्ताधारी दल से जुडे़ नेताओं की मानें तो भाजपा विरोधी दल के कुछ खुराफाती टाइप नेता गोवंशों को किसानों के खेतों में छोड़ देते हैं, फिर मोबाईल से वीडियो और फोटो बनाकर यह प्रचारित करने की कोशिश करते हैं कि मुख्यमंत्री की नीतियों से प्रदेश का किसान एक बार फिर से भुखमरी की कगार पर है।
स्थिति यह है कि अब क्षुब्ध किसानों ने अपने-अपने खेतों में कंटीली बाड़ लगानी शुरु कर दी है जिसे गोवंशों के घायल होने की तमाम घटनाएं प्रकाश में आ चुकी हैं। मोहनलालगंज तहसील परिक्षेत्र की बात करें तो अब तक गोवंशों के चोटिल होने से अनेक स्थानों पर छिटपुट साम्प्रदायिक घटनाएं घटित हो चुकी हैं। खासतौर से अल्पसंख्यक समुदाय का किसान डरा-सहमा है। इन परिस्थितियों में कहना गलत नहीं होगा कि समस्या के समाधान के लिए सरकार की बेरुखी ‘रेत में शुतुरमुर्ग के सिर छिपाने’ जैसी है।

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