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विपक्ष के लिए नई संभावनाएं जगा रहा है किसान आंदोलन

दाताराम चमोली
नई दिल्ली। कृषि क्षेत्र से जुड़े तीन बिलों पर राष्ट्रपति द्वारा हस्ताक्षर किये जाने के बाद अब ये कानून बन चुके हैं, दूसरी तरफ इन कानूनों में बदलाव को लेकर दिल्‍ली और देश के अन्य भागों में विरोध- प्रदर्शन हो रहे हैं। किसानों के आंदोलन के साथ ही देश की सियासत भी गरमा गई है। विपक्ष कृषि कानूनों को लेकर सदन के बाद अब सरकार को सड़क पर घेरने के मूड में है, वहीं सरकार भी हमलावर हो गई है।
दरअसल, विपक्ष और सरकार दोनों अतीत के अनुभवों से भली भांति वाकिफ हैं कि देश में जब-जब किसी आंदोलन की आग सुलगी तब-तब बदलाव का वातावरण भी तैयार हुआ। नतीजतन जो सत्ता में थे वे विपक्ष में चले गए और जो विपक्ष में थे वे सत्ता में आए। शायद यही वजह है कि विपक्ष को किसान आंदोलन में नई संभावनाएं दिखाई दे रही हैं। दूसरी तरफ सत्ता पक्ष इस रणनीति में दिखाई देता है कि विपक्ष को किसान आंदोलन का फायदा न उठाने दिया जाए।
सत्ता पक्ष हमलावर है कि विपक्ष बिना वजह किसान हित में लाए गए बिलों जो कि अब कानून भी बन चुके हैं, का विरोध कर रहा है। इस बीच आज 28 सितंबर की सुबह राजधानी में इंडिया गेट पर विरोध-प्रदर्शन के दौरान एक ट्रैक्‍टर के जल जाने पर केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने ट्वीट कर हमला किया है कि ‘कांग्रेस कार्यकर्ता ट्रक में ट्रैक्‍टर लाए और इंडिया गेट के पास जलाया। यही कांग्रेस का नाटक। इसलिए कांग्रेस को लोगों ने सत्ता से बेदखल किया।’ दिल्ली भाजपा मीडिया सेल के प्रमुख नीलकांत बख्शी ने तो यहां तक कहा है कि वह ट्रैक्‍टर जलाने वाले युवा कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराएंगे। उन्होंने आरोप लगाया कि युवा कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने ट्रैक्टर लाकर हिंसा फैलाने के लिए उसमें आग लगा दी। बख्शी ने कहा, “वे देश में दंगे कराने की कोशिश कर रहे हैं और मैं इस साजिश को रोकने के लिए एफआईआर दर्ज कराऊंगा।”
कांग्रेस आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही है। उसके कार्यकर्ता विरोध-प्रदर्शनों में सक्रिय हैं। पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह का धरने पर बैठना काफी महत्वपूर्ण है। पार्टी की रणनीति देश में यह संदेश देने की है कि जिन कृषि बिलों पर सदन में हंगमा हुआ वे अब ऐसे कानूनों की शक्ल ले चुके हैं जो किसान विरोधी हैं। नए कृषि कानूनों के विरोध में कर्नाटक के किसान संगठनों ने भी आज राज्‍यव्‍यापी बंद बुलाया है। बवाल की आशंका को के चलते कई जिलों में भारी पुलिस फोर्स तैनात की गई है। गौरतलब है कि पिछले हफ्ते भी किसानों ने इन कानूनों के खिलाफ देशव्यापी प्रदर्शन किया था। तब पंजाब, हरियाणा समेत देश के कई हिस्सों में चक्का जाम किया गया था।
विपक्ष यदि किसान आंदोलन में नई संभावनाएं देखता है, तो वह गलत भी नहीं है। वह महसूस कर रहा है कि एनडीए के भीतर भी कृषि बिलों पर मतभेद उभरे। कांग्रेस और शिरोमणि अकाली दल सहित कई विपक्षी दलों ने राष्ट्रपति से बिलों पर हस्ताक्षर नहीं करने का आग्रह किया था। नरेंद्र मोदी सरकार में शिरोमणी अकाली दल की एकमात्र खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने लोकसभा में विधेयकों पर मतदान से पहले इस्तीफा दे दिया था। इसी मुद्दे पर उनकी पार्टी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) से अलग भी हो गई।
पंजाब, कर्नाटक, हरियाणा, दिल्ली के साथ ही बिहार में भी कृषि कानूनों का विरोध हो रहा है। बिहार में यह विरोध इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि राज्य में जल्दी ही विधानसभा चुनाव होने जा रहा है। चुनाव आयोग ने तिथि का ऐलान कर दिया है। राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) सरकार पर तीखे हमले कर रही है। पार्टी नेता तेजस्वी यादव के नेतृत्व में कार्यकर्ता जनता में यह संदेश देने की हरसंभव कोशिश कर रहे हैं कि मौजूदा मोदी सरकार किसान विरोधी है और पूंजीपतियों के हित में फैसले ले रही है। भाजपा कार्यकर्ता भी उनके हमलों का जवाब यह कहकर दे रहे हैं कि कृषि कानून किसानों के हित में हैं। अब देखना है कि कृषि कानूनों को लेकर गरमाई इस सियासी जंग में कौन कितना ताकतवर साबित हो पाता है। देखना है कि किसान आंदोलन से जो केंद्र सरकार के खिलाफ जो माहौल बन रहा है वह विपक्ष के लिए भविष्य में क्या संभावनाएं लेकर आता है।

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