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हिंदी के प्रचार-प्रसार के नाम पर फर्जीवाडा

जिस भवन को हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए आवंटित किया गया था उसे व्यवसायिक गतिविधियों का अवैध संचालन का केन्द्र बना दिया गया । जीडीए ने पिछले 13 साल से यहां की जमीन पर कब्जा लेना तक मुनासिब नही समझा । दुसरी और समिति इस भवन के नाम पर अनियमितता का खेल खेलती रही । जबकि गाजियाबाद विकास प्राधिकरण इस बात से अनजान बना रहा । वह तो भला हो आरटीआई एक्टीविस्ट राजेंद्र त्यागी का जिन्होने इस मामले में सूचना अधिकार अधिनियम के तहत प्रशासन को कार्यवाही करने पर मजबूर कर दिया ।

गाजियाबाद में अधिकारियों की मिलीभगत से 2006 से लोहियानगर स्थित हिंदी भवन का अवैध रूप से संचालन हो रहा है। आवंटन की शर्तों के उल्लंघन और आवंटित भूखंड की राशि का भुगतान नहीं करने पर 2006 में जीडीए ने हिंदी भवन के भूखंड का आवंटन निरस्त कर दिया था। 13 साल पहले आवंटन निरस्त होने के बावजूद अब तक जीडीए ने जमीन पर कब्जा नहीं लिया। जबकि हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार की जगह हिंदी भवन में वर्षों से लगातार व्यावसायिक गतिविधियां जारी है।

भाजपा के वरिष्ठ पार्षद राजेंद्र त्यागी की आरटीआई के बाद जीडीए ने आनन-फानन में हिंदी भवन समिति को भवन को खाली करने का नोटिस तो जारी कर दिया है । लेकिन कार्यवाही के नाम पर अभी कुछ नही किया है। हालांकि समिति की ओर से जीडीए में प्रत्यावेदन जमा कराने के बाद जीडीए उपाध्यक्ष कंचन वर्मा ने जीडीए सचिव संतोष कुमार राय की अध्यक्षता में चार सदस्य जांच कमेटी गठित कर दी है। देखना यह है कि कमेटी की ओर से इसपर क्या कार्रवाई की जा सकती है। दूसरी और भाजपा पार्षद राजेंद्र त्यागी ने मामले में कार्रवाई के लिए मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव, मंडलायुक्त, डीएम, जीडीए वीसी और डिप्टी रजिस्ट्रार फर्म्स सोसायटीज मेरठ को पत्र लिखा हैं । भाजपा पार्षद राजेंद्र त्यागी के अनुसार गाजियाबाद स्थित लोहिया नगर में 1986 में हिंदी भवन के लिए हरि प्रसाद शास्त्री के आवेदन पर 88 रुपये वर्ग मीटर की बेहद रियायती और सेक्टर रेट से भी नीचे की दर पर 3838 वर्ग मीटर भूखंड आवंटित किया था।

आवंटन की शर्तों में साफ था, कि हिंदी भवन का इस्तेमाल केवल हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार और उससे जुड़े सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन के लिए किया गया था, लेकिन शादियों व अन्य समारोह के लिए हिंदी भवन के इस्तेमाल और करीब उस वक्त करीब 36 लाख आवंटन राशि जमा नहीं करने पर जीडीए ने 2006 में हिंदी भवन का आवंटन निरस्त कर दिया था । लेकिन 2006 से अब तक जीडीए ने कब्जा लेना जरूरी नहीं समझा। आवंटन रद्द करने के खिलाफ समिति ने एक रिट हाईकोर्ट में डाली थी । लेकिन हाईकोर्ट ने भी समिति सदस्यों की रिट को खारिज कर दिया। ऐसे में हिंदी भवन में कोई कार्यक्रम व बुकिंग का अधिकार हिंदी भवन समिति को नहीं था। लेकिन अब तक इसका बेजा इस्तेमाल होता रहा ।

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