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जोगटों के टोटकों से भरयभीत थे अंग्रेज

देवभूमि उत्तराखण्ड अपने में कई रहस्य रोमांच समेटे हुए है। जिन पर यकीन करना आसान नहीं है। फिर भी ऐसा कुछ जरूर है जो रहस्यमय ताकतों के प्रमाणिक उदाहरण पेश करता है। अंग्रेजी शासनकाल मंे मसूरी के अंग्रेज डाॅक्टरों में पड़ोसी इलाकों के तंत्र-मंत्र करने वाले जोगटों का बड़ा आतंक था। ये जोगटे तंत्र-मंत्र विद्या से रोगों का
सफलतापूर्वक इलाज कर चुटकियों में मरीज को चंगा करने की महारत रखते थे। रंवाई और जौनसार क्षेत्र के जोगटे और तांत्रिक कुली- फाल्टू के भेष में मसूरी आते और तंत्र विद्या व जड़ी-बूटी संुघाकर गंभीर मरीज को ठीक करने के बाद गायब  हो जाते। इन लोगों के चमत्कार के आगे अंग्रेज डाॅक्टर घुटने टेक चुके थे, क्योंकि चिकित्सा विज्ञान पर प्रश्नचिÐ लग रहा था। इन जोगटों ने मसूरी के अलावा, राजपुर, देहरादून के डाॅक्टरों को परेशान कर रखा था।  अंग्रेज डाॅक्टर इतना परंपरागत हकीमों और वैद्यों से नहीं घबराते थे, जितना कि तुमड़ी चलाने वाले जोगटों से भय खाते थे।
सन् 1845 के बाद मसूरी, राजपुर, देहरादून का आकार विस्तार लेने लगा, तो रवांई, जौनपुर, जौनसार से काफी जोगटे मजदूरी करने के लिए इन क्षेत्रों में आ गये। तमाम मजदूरों के बीच में इनकी पहचान अलग होती थी। हाथों में चांदी के मोटे धागुले (कड़े) लंबी तुम्बी और बड़े-बड़े आपस में गूंथे बाल इनको औरों से अलग करते थे। इन जोगटों ने अपनी चमत्कारी शक्तियों के दम पर राजा-रजवाड़ों और काले भारतीयों को प्रभावित कर अपने कब्जे में लेना शुरू कर दिया था। जोगटे-तांत्रिक पैसे की ओर नहीं भागते थे। जो मिल गया तो ठीक, नहीं मिला तो भी ठीक।
सन् 1848 में मसूरी के बालाहिसार इलाके में स्थित पंजाब के राजा अजीत सिंह की कोठी में रंवाई के वीस्तु जोगटे को बतौर तांत्रिक नौकर रखा गया था। वीस्तु जोगटा अपनी चमत्कारी शक्तियों के बारे में बहुत प्रसिद्ध था। एक बार राजा अजीत सिंह का पैर जल गया था। उनके यहां रंवाई के कुछ फाल्टू नौकरी करते थे, जिन्होंने राजा को वीस्तु के बारे में बताया था। यह भी भरोसा दिलाया कि वीस्तु आपको अंग्रेज डाॅक्टरों से भी ज्ल्दी ठीक कर सकने की दैवीय ताकतें रखता है। वीस्तु को बुलाया गया, वह डरा-सहमा राजा के सामने हाजिर हुआ। गुलामी का दौर था। इसलिए जरा-सी चूक में जान जा सकती थी। पर उसने हिम्मत नहीं हारी। वीस्तु ने नौकरों से दहकते अंगारे एक तसले में भरकर लाने को कहा और राजा को जमीन पर लिटा दिया। उसने चिमटा सुर्ख गर्म किया और मंत्र पढ़ने लगा। एक हाथ में वह गर्म अंगार रखता और दूसरे हाथ से उसने राजा को चिमटे से दागना शुरू किया। हैरत की बात तो ये राजा को बिल्कुल भी दर्द नहीं हो रहा था। थोड़ी देर चली इस प्रक्रिया में राजा पूरी तरह ठीक हो गया।
जोगटे का चमत्कार देखकर राजा अजीत सिंट आश्चर्यचकित रह गये। इसके बाद तो वीस्तु राजा अजीत सिंह के अलावा कई रजवाड़ों की कोठियों के शयन कक्ष तक जा पहुंचा। सन् 1855-56 तक वीस्तु ने मसूरी के उन अंग्रेज डाॅक्टरों का धंधा चैपट कर दिया जो कि इलाज के नाम पर मोटी रकमें वसूलते थे। वीस्तु के पास मरीजांे की भीड़ लगी रहती। वो जो भी देता उसी से लोगों को आराम मिल जाता था। रंवाई के राजगढ़ी निवासी वैद्य अखिलानंद राजगढ़ी की पुस्तक ‘विद्यावाणी’ जो सन् 1929 में प्रकाशित हुई थी, इसमें वीस्तु जोगटे का चमत्कारी दौर 1842 से 1864 तक बताया गया है। पुस्तक विद्यावाणी में वीस्तु द्वारा मसूरी में किए गए चमत्कारों का काफी विस्तार से उल्लेख है। वीस्तु से परेशान अंग्रेज डाॅक्टरों ने गदर के समय में टिहरी नरेश सुदर्शन शाह से उसकी कई शिकायतें की। इस पर टिहरी नरेश ने वीस्तु को अपने यहां तलब कर लिया।
जौनपुर, रंवाई, जौनसार के तुमड़ी चलाने वाले तांत्रिकों ने फिर भी हार नहीं मानी। उन्हें पता था अंग्रेज डाॅक्टर जान से मरवा सकते हैं, इसलिये चोरी छिपे अपना काम जारी रखा।
मसूरी में प्रवेश करने वाले सभी रास्तों की टोल चैकियों पर मजदूरों की सघन तलाशी ली जाती थी कि उनके पास पूजा का सामान या तुमड़ी तो नहीं है। जिनके हाथ में चांदी के मोटे धागुले या बालों की जटायें होती थी उनको नगर पालिका के टंडेल मारपीट कर वापस भगा देते थे। सन् 1860 के आस-पास मसूरी के गोरे डाॅक्टरों की इलाज प्रणाली का मजाक उड़ाने व जोगटों तांत्रिकों की प्रशंसा करने वाला पहाड़ी गीत गांव-गांव गाया जाने लगा। इन्हीं दिनों मसूरी के प्रसिद्ध डाॅक्टर कैनी को जौनपुर के सकलाना निवासी तुमड़ी चलाने वाले जोगटे ने अंदर तक हिला दिया था। नगर पालिका में मौजूद
दस्तावेजों के हिसाब से डाॅ एम कैनी वर्तमान में लंढ़ौर घंटाघर के पीछे वुडविल में अपना क्लीनिक चलाते थे। घोड़े से गिरकर घायल हुआ एक अंग्रेज डाॅ ़ कैनी से इलाज कराकर लौट रहा था। सड़क पर खड़े सकलनाना के जोगटे ने कहा साहब आप को भूत ने पकड़ कर पटका है। बंगले पर पहुंचने के बाद घायल अंग्रेज ने फाल्टुओं को जोगटे बाली बात बताई, उस अंग्रेज ने इससे पहले भी दैवीय एवं रहस्यमय घटनाओं की बातें सुन रखी थीं। घायल गोरे ने उस जोगटे को अपने पास बुलाया और भूत की बात साबित करने को कहा। जोगटे ने शर्त रखी डाॅ कैनी भी उसके सामने मौजूद रहें। डाॅ कैनी के आने के बाद जोगटे ने उनसे पूछा बताओ मरीज को कहां चोट लगी है। डाॅ ़ चोट बताने लगा इस पर जोगटे ने कहा उसका आशय उस स्थान से है, जहां मरीज गिरकर घायल हुआ, यह सुनकर डाॅ का चेहरा उतर गया। उन्हें क्या पता घटना स्थल कहां है।
अब बारी जोगटे की थी, उसने कुछ मंत्र पढ़े और तुमड़ी चला दी। तुमड़ी चलने के बाद कुछ ही फर्लांग दूर एक स्थान जंगल के बीच रुककर उछलने लगी। तुमड़ी कुछ देर तक उछलती रही और शांत हो गई। मरीज अंग्रेज यह देखकर हक्का-बक्का रह गया, क्योंकि यह वही जगह थी जहां वो घोड़े से गिरकर घायल हुआ था। उसने डाॅ कैनी से कहा हम अंग्रेज कितना भी ज्ञान हासिल क्यों न कर लें इन गरीब व बिना पढ़े लोगों के प्रकृति विज्ञान के आगे कुछ भी नहीं है।
इस घटना के बाद सकलाना के इस जोगटे का यूरोपीय समाज में दबदबा कायम हो गया। जोगटे की कामयाबी की खबर पहाड़ में जंगल की आग की तरह फैल गईं तथा डाॅ कैनी की हंसी उड़ाने वाला पहाड़ी गीत ‘चैंलू की दाणी- निरोग पराणी, मरघट कू वास-जख होलू डाॅक्टर कैणी,’ गांव-गांव गया जाने लगा। इस गीत का अर्थ था- ‘मंत्र के चावल के दाने से व्यक्ति व्याधिरहित रहेगा, जहां डाॅ. कैनी होगा वहां मृत्यु का वास होगा।’ कुछ ही जोगटे तमाम बीमारियों को चमत्कारी ढंग से ठीक  करने की कला जानते थे।  इनको मानने वाले लोग वही थे जो तंत्र-मंत्र में विश्वास रखते थे तथा असुविधाओं भरा जीवन जीते थे। पहाड़ में आज भी तंत्र-मंत्र को जो धार्मिक व सामाजिक मान्यता मिली है, उससे उस समय के हालात को सहज समझा जा सकता है। पिछली शताब्दी में तो सभी समस्याओं का निदान ही तंत्र-मंत्र पर निर्भर था।
सन् 1868 में मसूरी और राजपुर नगर पालिका द्वारा स्वास्थ्य परीक्षण प्रारंभ किया गया तो जोगटों ने भारतीयों को यह कहकर बरगलाना शुरू किया कि इससे उनका धर्म भ्रष्ट हो जाएगा और देवता नाराज होंगे। खुफिया विभाग की रिपोर्टों पर तत्कालीन मसूरी पालिकाध्यक्ष डब्लू होब्सन ने उसी वर्ष (1868) में तंत्र-मंत्र-करने वालों व जोगटों के शहर में प्रवेश पर सख्त रोक लगा दी थी।
सख्ती इतनी कि पुलिस वाले मसूरी में रहने वाले कुली-मजदूरों फाल्टुआंे की लगातार छानबीन करते और जरा से शक में जेल भेज देते थे। फिर भी जौनपुर के पालीगाढ़ के एक जोगटे ने टिहरी नरेश भवानी शाह की मसूरी कोठी में तंत्र-मंत्र का जाल फैला रखा था। ये राजा की एक प्रिय बांदी का मुंह लगा था।
उस समय आम व खास लोग जोगटों पर विश्वास करने लगे थे। इससे गोरे डाॅक्टरों की मोटी कमाई बंद हो गई थी। राजा-रजवाड़ों से गोरे डाॅक्टर अनाप-शनाप पैसा कमाते थे। उसी कारण ये डाॅक्टर जोगटों से डरते थे तथा दुश्मनी रखते थे। इसी दुश्मनी के कारण जौनसार, रंवाई व जौनपुर के जोगटे दबाव के कारण गायब होने लगे। 19वीं शताब्दी के अंतिम तीन दशकों तक यह दबाव जारी रहा, यहां तक कि 17 मार्च 1888 को टिहरी नरेश ने अपने अधिकार क्षेत्र में तांत्रिकों, जोगटों पर पाबंदी लगाने वाला कड़ा फरमान जारी कर दिया। जोगटों के मूल स्थान, निवासों में पटवारी इनकी पहचान कर सूची बनाने लगे। टिहरी अभिलेखागार के रजिस्टर नं-1 के मुताबिक फरमान में कहा गया कि इनकी सभी सम्पत्ति जब्त कर इन्हें कारागार में डाल दिया जाए।
सन् 1888 के बाद के दिनों में मसूरी के बजाये पहाड़ी जोगटे व तांत्रिक देहरादून के धार्मिक स्थलों के आस-पास रहने लगे, क्योंकि इन स्थलों पर रहने के लिए उन पर रोक नहीं लगी थी। सन् 1907 में देहरादून के तत्कालीन सुपरिटेंडेंट जीआर डेम्पियर ने रिलिजियस रिपोर्ट में लिखा कि ‘इस तरह के जोगटे, तांत्रिक देहरादून में गुरूद्वारा और झंडा तालाब के आस-पास डेरा डाल के रहते थे। दिन भर मांग कर खाते और रात को कोठियोें में जाकर झाड़-फूंक करते थे। प्रथम विश्व युद्ध के बाद गोरे डाॅक्टरों व प्रशासन की इन पर पकड़ ढीली होने लगी थी। समय के बदलाव के साथ इन जोगटों ने वैद्य का पेशा अपना लिया और झोली में तुमड़ी की जगह जड़ी-बूटियां रखने लगे।
मसूरी नगर पालिका के पहले अध्यक्ष राम सरन दास (1925-26) ने रंवाई जौनसार के ऐसे वैद्यों को लाइसेंस जारी किये जो पहले तंत्र-मंत्र विद्या से इलाज करते थे। इन्हें राहत तो मिली पर कामयाबी इसलिये नहीं मिली कि सीजन में बाहर से आने वाले राजवैद्यों ने इन्हें कड़ी टक्कर दी। खासकर जोगटे कामशक्ति का इलाज नहीं करते थे। जबकि बाहर से आने वाले राजवैद्य होटलों में रुकते और उस समय के समाचार पत्रों में बड़े-बड़े इश्तिहार छपवाते थे। इन वैद्यों के दिखावे और तामझाम के आगे पहाड़ के
जोगटों की चमक फीकी पड़ने लगी। बाहरी वैद्य बड़े लोगों को कामशक्ति की दवायें मुंहमांगी कीमतों पर बेचते थे। जोगटे इस इलाज से बहुत दूर थे। जिन जोगटों को अंग्रेज डाॅक्टर और ताकतवर गोरी हुकूमत परास्त न कर सकी उन्हें राजवैद्यों ने कामवर्धक टोटकों के माध्यम से उखाड़ फेंका। सालों बाद जोगटे व तांत्रिक लोकगीतों में और यदाकदा की चर्चाओं में ही सिमट गये। जोगटों, तांत्रिकों ने अपने चमत्कारी कारनामों से इतना तो साबित कर ही दिया कि रहस्यमयी शक्तियों का कोई संसार अवश्य है।  इससे हमारी पराशक्तियों और धार्मिक भावना को भी बल मिलता है। इन रहस्यों के आगे हमारा विज्ञान भी नतमस्तक है।

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