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Emergency 1975: आपातकाल के 46 साल

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देश में Emergency की घोषणा के अनुसार आकाशवाणी पर प्रसारित अपने संदेश में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कहा था, ‘जब से मैंने आम आदमी और देश की महिलाओं के फायदे के लिए कुछ प्रगतिशील कदम उठाए हैं, तभी से मेरे खिलाफ गहरी साजिश रची जा रही थी। इस दौरान जनता के सभी मौलिक अधिकारों को स्थगित कर दिया गया था। सरकार विरोधी भाषणों और किसी भी प्रकार के प्रदर्शन पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया था।’

आज की तारीख़ यानी की 25 जून जब भी आता है तो वर्ष 1975 को देश में लगी Emergency की यादें ताज़ा हो जाती हैं।आजादी के महज 28 वर्ष बाद ही देश को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के फैसले के कारण इस आपातकाल (Emergency) के गुजरना पड़ा था। 25-26 जून की रात को आपातकाल के आदेश पर राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के दस्तखत के साथ देश में आपातकाल (Emergency) लागू हो गया। अगली सुबह समूचे देश ने रेडियो पर इंदिरा गांधी की आवाज़ में संदेश सुना कि,’ भाइयों और बहनों, राष्ट्रपति जी ने आपातकाल (Emergency) की घोषणा की है। लेकिन इससे सामान्य लोगों को डरने की जरूरत नहीं है।’

जब अख़बारों के दफ़्तरों की बिजली जानबूझकर काट दी गयी थी

दिल्ली के रामलीला मैदान में हुई 25 जून की रैली की ख़बर पूरे देश में न फैल सके इसके लिए दिल्ली के बहादुर शाह जफर मार्ग पर स्थित अखबारों के दफ्तरों की बिजली रात में ही काट दी गई। रात को ही इंदिरा गांधी के विशेष सहायक आर.के. धवन के कमरे में बैठ कर संजय गांधी और ओम मेहता उन लोगों की लिस्ट बना रहे थे, जिन्हें गिरफ्तार किया जाना था।

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यह माना जाता है कि इस आपातकाल के निर्णय की जड़ में वर्ष 1971 में हुए लोकसभा का चुनाव था, जिसमें उन्होंने अपने मुख्य प्रतिद्वंदी राजनारायण को पराजित किया था। लेकिन चुनाव परिणाम आने के चार वर्ष बाद राज नारायण ने हाईकोर्ट में चुनाव परिणाम को चुनौती दी। 12 जून, 1975 को इलाहाबाद हाइकोर्ट के न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा ने इंदिरा गांधी का चुनाव निरस्त कर उन पर छह वर्ष तक चुनाव न लड़ने का प्रतिबंध लगा दिया और श्रीमती गांधी के चिर प्रतिद्वंदी राजनारायण सिंह को चुनाव में विजयी घोषित कर दिया था।

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राजनारायण सिंह की दलील थी कि इन्दिरा गांधी ने चुनाव में सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग किया, तय सीमा से अधिक पैसा खर्च किया और मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए गलत तरीकों का इस्तेमाल किया। अदालत ने इन आरोपों को सही ठहराया था। इसके बावजूद श्रीमती गांधी ने इस्तीफा देने से इनकार कर दिया। तब कांग्रेस पार्टी ने भी बयान जारी कर कहा था कि इन्दिरा गांधी का नेतृत्व पार्टी के लिए अपरिहार्य है।

इसी दिन गुजरात में चिमनभाई पटेल के विरुद्ध विपक्षी जनता मोर्चे को भारी विजय मिली। इस दोहरी चोट से इंदिरा गांधी बौखला गईं। इन्दिरा गांधी ने अदालत के इस निर्णय को मानने से इनकार करते हुए सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने की घोषणा की और 26 जून को आपातकाल लागू करने की घोषणा कर दी गई।

आपातकाल के 46 साल

उस समय आकाशवाणी ने रात के अपने एक समाचार बुलेटिन में यह प्रसारित किया कि अनियंत्रित आंतरिक स्थितियों के कारण सरकार ने पूरे देश में इमरजेंसी की घोषणा कर दी गई है। यह कहा जाता है कि आपातकाल के दौरान सत्ताधारी कांग्रेस ने आम आदमी की आवाज को कुचलने की निरंकुश कोशिश की। इसका आधार वो प्रावधान था जो धारा-352 के तहत सरकार को असीमित अधिकार देती थी।

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मीसा-डीआईआर का कहर

मीसा और डीआईआर के तहत देश में एक लाख से ज्यादा लोगों को जेलों में बन्द कर दिया गया। आपातकाल के ख़िलाफ़ आंदोलन के नायक जय प्रकाश नारायण की किडनी कैद के दौरान ख़राब हो गई थी । उस काले दौर में जेल-यातनाओं की दहला देने वाली कहानियां भरी पड़ी हैं। देश के जितने भी बड़े नेता थे, लगभग सभी सलाखों के पीछे डाल दिए गए। एक तरह से जेलें राजनीतिक पाठशाला बन गईं थीं।

कहा गया कि देश को इंदिरा के बेटे संजय गांधी अपने दोस्त बंसीलाल, विद्याचरण शुक्ल और ओम मेहता की तिकड़ी के जरिए चला रहे थे। संजय गांधी ने वीसी शुक्ला को नया सूचना प्रसारण मंत्री बनवाया जिन्होंने मीडिया पर सरकार की इजाजत के बिना कुछ भी लिखने-बोलने पर पाबंदी लगा दी, जिसने भी इनकार किया उसे जेलों में डाल दिया गया।।

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क्या पहले ही बन चुकी थी आपातकाल की योजना ?

आपातकाल के बहुत बाद एक साक्षात्कार में इंदिरा ने कहा था कि,’ उन्हें लगता था कि भारत को शॉक ट्रीटमेंट की जरूरत है। लेकिन, इस शॉक ट्रीटमेंट की योजना 25 जून की रैली से छह महीने पहले ही बन चुकी थी।’ 8 जनवरी 1975 को सिद्धार्थ शंकर रे ने इंदिरा को एक चिट्ठी में आपातकाल की पूरी योजना भेजी थी। चिट्ठी के मुताबिक ये योजना तत्कालीन कानून मंत्री एच आर गोखले, कांग्रेस अध्यक्ष देवकांत बरुआ और बॉम्बे कांग्रेस के अध्यक्ष रजनी पटेल के साथ उनकी बैठक में बनी थी।

Emergency लागू करने के लिए क्यों मजबूर हुई थीं इंदिरा?

आपातकाल के जरिए इंदिरा गांधी जिस विरोध को शांत करना चाहती थीं, उसी इमरजेंसी ने कॉंग्रेस सरकार पर एक प्रश्नवाचक चिन्ह हमेशा के लिए लगा दिया। एक बार इंदिरा गांधी ने ख़ुद कहा था कि,’ आपातकाल लगने पर विरोध में कुत्ते भी नहीं भौंके थे।’ पर 19 महीने में उन्हें गलती और लोगों के गुस्से का एहसास हो गया। 18 जनवरी 1977 को उन्होंने अचानक ही मार्च में लोकसभा चुनाव कराने का ऐलान कर दिया। 16 मार्च को हुए चुनाव में इंदिरा और संजय दोनों ही हार गए। 21 मार्च को आपातकाल खत्म हो गया लेकिन अपने पीछे लोकतंत्र का सबसे बड़ा सबक छोड़ गया।

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