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पिछले लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में मिली करारी हार के बाद बसपा सुप्रीमो मायावती देशभर में अपने वोट बैंक को संभालने में जुट गईं। इसी कोशिश में वे हरिद्वार के प्रति भी इस बार गंभीर दिखाई देती हैं। तीन साल के भीतर ही उन्होंने राज्य में दो बार पार्टी अध्यक्ष बदला। उत्तर प्रदेश की अपनी सरकार में मंत्री रहे राम अचल राजभर को प्रदेश प्रभारी का जिम्मा सौंप रखा है। यदि उत्तर प्रदेश की तरह हरिद्वार में बसपा-सपा का गठबंधन हो गया तो भाजपा और कांग्रेस के लिए इस सीट पर चुनौती खड़ी हो जाएगी

देश की राजनीति में धर्मनगरी हरिद्वार का विशेष महत्व है। यहां का सांसद यदि थोड़ा भी सक्रिय रहा तो उसे खुद-ब- खुद राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिल जाती है। दिग्गज नेता इस क्षेत्र से संसद पहुंचने को उत्सुक रहते हैं। धार्मिक दृष्टि से कोई इस क्षेत्र को हरिद्वार तो कोई ‘हरिद्वार’ के नाम से जानता है, लेकिन राजनीतिक लिहाज से देखें तो एससी/एसटी जैसे वर्गों के वोट बैंक पर खड़ी पार्टियों के लिए यह उत्तराखण्ड की राजनीति का ‘प्रवेश द्वार’ भी रहा है। वर्ष 2002 में राज्य विधानसभा का पहला चुनाव हुआ तो उस समय बहुजन समाज पार्टी को लग रहा था कि हरिद्वार के बूते वह उत्तराखण्ड की सत्ता में हस्तक्षेप कर सकती है। वास्तव में उस वक्त किसी पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिलता तो उसे सरकार बनाने के लिए बसपा की बैशाखियों का सहारा लेना पड़ता। उस चुनाव में बसपा को हरिद्वार में सात विधानसभा सीटें मिली थीं। इन सीटों के बाद बसपा हाथी को पहाड़ पर चढ़ाने के लिए उत्साहित हो उठी थी। इसके लिए उसने समय- समय पर पहाड़ में हाथी के लिए नए-नए महावत भी खोजे, लेकिन पहाड़ की चढ़ाई इतनी ज्यादा रही कि हाथी वहां चढ़ नहीं पाया। लेकिन हरिद्वार के मैदान में आज भी वह अपना दमखम दिखा रहा है।

हरिद्वार में एससी/एसटी वोटों का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 11 विधानसभा सीटों में से ज्यादातर पर इन्हीं का दबदबा है। इन वोटों की अहमियत को भांपकर ही बसपा सुप्रीमो मायावती ने 1987 के अपने राजनीतिक जीवन का शुरुआती सफर हरिद्वार से ही शुरू करना चाहा। 1989 का चुनाव भी उन्होंने यहीं से लड़ा। बेशक वह चुनाव हार गई, लेकिन उन्हें हरिद्वार लोकसभा सीट पर एक लाख 40 हजार मत मिले थे। राजनीतिक समीकरणों का संयोग रहा कि बिजनौर से वह 84 हजार वोट पाकर सांसद बनीं। सत्तर के दशक में जब जनता पार्टी स्वर्णिम काल था उस वक्त रामविलास पासवान भी हरिद्वार से भाग्य आजमा चुके हैं। हालांकि वे भी सफल नहीं हुए।

हरिद्वार के 41 फीसदी दलित मतदाताओं के साथ अगर इक्कीस फीसदी अल्पसंख्यक मिल जाते हैं तो परिणामों को मोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जिले की ग्यारह में से दो विधानसभा सीटों हरिद्वार एवं रुड़की को छोड़ दें तो शेष सभी विधानसभा सीटों में जीत की कुंजी इन्हीं मतदाताओं के हाथ में है। हरिद्वार की भगवानपुर, मंगलौर, झबरेड़ा, कलियर, विधानसभा सीट पर दलित मतों का प्रतिशत जिले में अन्य मतदाताओं के औसत से भी अधिक है। हरिद्वार संसदीय सीट पर दलित, पिछड़ों एवं मुस्लिमों के बड़ी संख्या ग्रामीण क्षेत्रों में होने के कारण हरिद्वार में जिला पंचायत चुनाव केवल इन्हीं मतदाताओं के गणित पर आधारित होते हैं। बड़े चुनावों में भी अभी तक यह मतदाता ही निर्णायक भूमिका में रहे हैं, खासकर संसदीय चुनाव में।

दरअसल हरिद्वार लोकसभा क्षेत्र 1977 से अस्तित्व में आया था। उससे पहले यह सहारनपुर और बिजनौर का हिस्सा हुआ करता था। उत्तर प्रदेश सीमा से जुड़ा होने के कारण इस संसदीय सीट का राजनीतिक गणित थोड़ा अलग है। जिसका उदाहरण है उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद 2004 में हुए लोकसभा चुनाव। 2000 में जब उत्तर प्रदेश से उत्तराखण्ड अलग हुआ तो राज्य के हिस्से में पांच लोकसभा सीटें आई। जिनमें हरिद्वार भी एक सीट थी। राज्य गठन के बाद 2004 में जब लोकसभा चुनाव हुए तो यहां से समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी राजेंद्र कुमार बाड़ी सांसद चुने गए। जबकि उत्तराखण्ड में लोग उस समय मुलायम सिंह यादव से बेहद खफा थे कि उन्होंने मुख्यमंत्री रहते राज्य आंदोलनकारियों पर जुल्म ढहाए। ऐसे में होना तो यह चाहिए था कि तब मुलायम सिंह यादव के विरोध में उनकी पार्टी के प्रत्याशी की जमानत जब्त होती। लेकिन हुआ इसके विपरीत। हालांकि ऐसा नहीं है कि हरिद्वार लोकसभा क्षेत्र की सभी विधानसभा सीटें मैदानी बाहुल्य लोगों की हैं। इसमें देहरादून जिले की तीन विधानसभा सीटें भी शामिल हैं। इन तीनों सीटों पर पहाड़ी मतदाताओं की अधिकता है।

1977 से जब से हरिद्वार लोकसभा सीट का सृजन हुआ तब से कुल दस बार चुनाव हुए हैं। जिनमें पांच बार भाजपा तो पांच बार कांग्रेस के प्रत्याशी चुनाव जीते हैं। एक बार समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी चुनाव जीते हैं। 18 लाख मतदाताओं वाली इस संसदीय सीट पर करीब चार लाख दलित मतदाता हैं। करीब साढ़े तीन लाख मतदाता मुस्लिम हैं। इसके अलावा डेढ़ लाख गुर्जर हैं। एक लाख 45 हजार सैनी समाज के मतदाता हैं। जाट मतदाता भी एक लाख से ऊपर बताए जा रहे हैं। इस तरह से देखा जाए तो यहां भाजपा और कांग्रेस के अलावा बसपा अगर दलितों के साथ ही मुस्लिम और पिछड़ों को जोड़ने में कामयाब हो जाए तो वह हरिद्वार को फतह कर सकती है। उत्तराखण्ड के दो जिलों ऊधमसिंह नगर और हरिद्वार में बसपा का खासा वोट बैंक रहा है।

बहुजन समाज पार्टी का हरिद्वार जिले में ही अतीत देखें तो राज्य बनने के बाद जब पहली बार 2002 में विधानसभा चुनाव हुए तो तब कांग्रेस और भाजपा के बाद बसपा तीसरी महत्वपूर्ण पार्टी बनकर उभरी थी। तब बसपा के अकेले हरिद्वार जिले में 7 प्रत्याशी विधानसभा चुनाव जीते थे। जिनमें लालढांग से तसलीम अहमद, बाहदराबाद से मोहम्म्द शहजाद, भगवानपुर सुरक्षित से सुरेंद्र राकेश, झबरेड़ा से हरिदास, मंगलौर से काजी निजामुद्दीन और इकबालपुर से चौधरी यशवीर आदि पार्टी के चुनाव चिन्ह पर विधायक बने थे। 2002 के बाद 2007 में हुए दूसरे चुनाव में भी पार्टी की यह जीत बरकरार रही। लेकिन राज्य बनने के बारह साल बाद जब तीसरी बार चुनाव हुए तो बसपा का ग्राफ 50 प्रतिशत तक गिर गया। 2012 के विधानसभा चुनाव में बसपा यहां तीन सीट तक सिमट कर रह गई। 2017 आने तक पार्टी की तीन सीटें भी उसके हाथ से निकल गई। इसका सबसे बड़ा कारण बसपा सुप्रीमो मायावती की लापरवाही रही। जिन्होंने अपना पूरा ध्यान सिर्फ उत्तर प्रदेश तक ही सीमित कर दिया था। उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव लड़ना और इस प्रदेश का सीएम बनना ही उनका महत्वपूर्ण सपना बनता रहा। उत्तराखण्ड को कभी भी उन्होंने अपनी प्राथमिकता में शामिल नहीं किया। लेकिन जब से उन्हें 2014 के लोकसभा चुनाव में खासकर उत्तर प्रदेश के मतदाताओं ने करारी हार का सामना कराया तब से वे अन्य राज्यों पर भी ध्यान देती दिखाई दे रही हैं। बसपा सुप्रीमो मायावती ने पूरे देश में पार्टी को विस्तार देते हुए अपने मजबूत कंडीडेट उतारने की रणनीति बनानी शुरू कर दी है। इस रणनीति का हिस्सा उत्तराखण्ड का हरिद्वार लोकसभा सीट भी है। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पिछले तीन साल में वह दो बार उत्तराखण्ड प्रदेश अध्यक्ष बदल चुकी हैं। फिलहाल उन्होंने प्रदेश का प्रभार भी पार्टी के एक सुलझे हुए नेता के हाथों में सौंप रखा है। उत्तर प्रदेश की तत्कालीन मायावती सरकार में परिवहन मंत्री रहे रामअचल राजभर उत्तराखण्ड के प्रभारी हैं। राजभर को मायावती ने उत्तराखण्ड के अलावा मध्य प्रदेश और बिहार का भी प्रभारी बनाया है।

उत्तराखण्ड के मामले में बसपा सुप्रीमो की हीलाहवाली का अंदाजा इसी से लगता है कि कभी भी उन्होंने पार्टी का अध्यक्ष उत्तराखण्ड से नहीं बनाया, बल्कि पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश के नेताओं को ही वह यहां का मुखिया बनाती रही हैं। फिलहाल उत्तराखण्ड बहुजन समाज पार्टी की कमान बसपा सुप्रीमो मायावती ने कुलदीप बलियान को सौंप रखी है। बलियान सहारनपुर उत्तर प्रदेश के निवासी हैं। इससे पूर्व उत्तर प्रदेश के ही बिजनौर निवासी चौधरी चरण सिंह प्रदेश अध्यक्ष रहे हैं। इससे उत्तराखण्ड खासकर हरिद्वार के बसपा कार्यकर्ताओं में नाराजगी के भाव देखे जा सकते हैं। बकौल हरिद्वार जिले के मंगलौर निवासी राजकिशोर सिंह ‘बहन जी ने उत्तराखण्ड के कभी भी गंभीरता से नहीं लिया। जबकि यहां के दलित उन्हें अपने समाज का सर्वोच्च नेता मानते हैं। खासकर हरिद्वार के अनुसूचित जाति के लोग अभी भी उनके प्रति आदरभाव रखते हैं। उत्तराखण्ड में कोई दखल न होने और बहन जी के सिर्फ एक आध बार विधानसभा चुनावों में रस्मअदायगी के लिए आ जाने पर भी यहां के अधिकतर एससी लोग उनकी ही पार्टी को वोट देते हैं।’

दलितों के साथ ही मुस्लिमों पर मायावती की विशेष मेहरबानी रहती है। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वह जिला पंचायत में सर्वोच्च पद पर मुस्लिम समाज के नेता को बिठाती हैं। यहां से कई बार पार्टी के लोग ही जिला पंचायत अध्यक्ष रहे हैं। लेकिन तीन साल पूर्व हुए पंचायत चुनावों में हरिद्वार का जिला पंचायत अध्यक्ष कांग्रेस के जिलाध्यक्ष राजेंद्र चौधरी की भाभी सबिता चौधरी को बनाया गया तो उपाध्यक्ष पद पर मोहम्मद शहजाद की भाभी को बिठाया गया। जिला पंचायत हरिद्वार के कुल 42 जिला पंचायत सदस्य हैं। जिनमें 16 जिला पंचायत सदस्य अकेले बहुजन समाज पार्टी के हैं। बसपा के प्रति वोटां का यह समीकरण दलित, मुस्लिम और ओबीसी के दम पर है। यही वजह रही कि दो बार अल्पसंख्यक को टिकट दिया गया है। 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने इस्लाम चौधरी को अपना प्रत्याशी बनाया था। तब चौधरी को एक लाख 80 हजार मत मिले थे और वह तीसरे नंबर पर रहे थे। जबकि 2009 के लोकसभा चुनाव में मोहम्मद शहजाद दूसरे नंबर पर रहे थे। एक दौर में बसपा के कद्दावर नेताओं में शुमार किए जाने वाले मोहम्मद शहजाद विधानसभा में बसपा नेता सदन का भी जिम्मा संभाल चुके हैं। बसपा के टिकट से मोहम्मद शहजाद पूर्व में विधायक का चुनाव जीत चुके हैं। शहजाद की दलित एवं अल्पसंख्यक वोटरों में मजबूत पकड़ रही है। हालांकि शहजाद को पार्टी ने बाहर का रास्ता दिखा दिया है। फिलहाल पार्टी ने सुभाष चौधरी को अपना घोषित उम्मीदवार बनाया हुआ है। सुभाष चौधरी गाजियाबाद निवासी हैं। जिनके हरिद्वार में कई स्टोन क्रेशर और फार्म हाउस हैं। बसपा का इस घनाढ्य नेता पर विशेष स्नेह रहा है। जिसके चलते ही चौधरी 2017 के विधानसभा चुनाव में पार्टी के टिकट पर ही लक्सर से चुनाव लड़ चुके हैं। लक्सर से चौधरी भाजपा के संजय गुप्ता से पराजित हो चुके हैं। बहरहाल मायावती की मंशा स्पष्ट है कि यदि उत्तर प्रदेश में उसका सपा से गठबंधन होता है तो वह उत्तराखण्ड में भी गठबंधन चाहेगी और हरिद्वार सीट पर दावा करेगी। यदि ऐसा संभव हुआ तो हरिद्वार में कांग्रेस और भाजपा के लिए चुनौती खड़ी हो जाएगी।

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