लोकसभा चुनाव की तारीखें घोषित होते ही बड़े-छोटे दल पूरी तरह चुनावी मोड में आ गए हैं। वर्ष 2014 को चुनाव पूरी तरह मोदी लहर में डूबा चुनाव था। इस बार ऐसी कोई लहर नजर नहीं आ रही है। भाजपा के चुनावी घोषणा पत्र से साफ जाहिर हो रहा है कि चुनावी वायदों को पूरा न कर पाने का दंश पार्टी को भयभीत कर रहा है। इस बार के घोषणा पत्र में एक भी पुराना चुनावी वायदा नहीं दोहाराया गया है। पिछले वायदों पर खरा नहीं उतर पाई भाजपा इस बार राष्ट्रवाद के सहारे अपनी चुनावी नाव पार लगाने का भरसक प्रयास कर जरूर रही है लेकिन माहौल उसने अनुकूल बनता नजर नहीं आ रहा। दूसरी तरफ विपक्षी दलों का बिखराव है जो महागठबंधन का एलान जरूर कर चुका है लेकिन मोदी विरोध के अतिरिक्त उनके पास भी कोई मुद्दा नजर नहीं आ रहा है।

राजनीतिक प्रेक्षक ऐसी स्थिति को भविष्य के लिए खतरनाक संकेत मान रहे हैं। कमोबेश उत्तर प्रदेश के भी ऐसे ही हालत हैं। मतदाआं का मौन बड़े राजनीतिक दलों में बेचैनी पैदा हर रहा है। इस हालातों में वैतरणी कैसे पार हो इसके लिए दलों को नये सिरे से रणनीति बनाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। खास कर उत्तर प्रदेश की सरकार बनाने में अहम भूमिका में होता है। इसलिए बड़े खिलाड़ी इस प्रदेश को प्राथमिकता प रख कर महासंग्राम की तैयारी करते हैं यहां तक कि उत्तर प्रदेश के मतदाताओं का सम्मान देश के अन्य राज्यों के लिए आईकॉन का काम करता हैं यहां से जिस दल को जनादेश मिलता है वहीं देश की सरकार बनाता है। उत्तर प्रदेश में भाजपा-सपा, बसपा तथा कांग्रेस का दबदबा चलता है। वेसे कई सालों से प्रदेश में कांग्रेस कोमा में थी। लेकिन इस बार के आम चुनाव में सीना तान के मैदान में खड़ी है। इसके पीछे तमाम कारण है। कांग्रेस प्रदेश में नहीं पूरे देश में तेजी से पुनः उभरी है। सत्तारूढ़ दल भाजपा को कड़ी टक्कर दे रही है। मौजूदा सियासी परिदृश्य साफ बता रहा है इस बार भाजपा कांग्रेस में सीधी लड़ाई है ओर बड़ी पार्टी बन कर सरकार बनाने का दावा पेश करेंगे। राजनीतिक विश्लेक्षकों का मानना है कि दोनों दलों में हार जीत का अंतर काफी मामूली होगा। प्रदेश की राजनीति में सपा-बसपा ने गठबंधन पर अपनी सुविधानुसार आपस में सीटों का बटवारा कर लिया है। शुरूआती दौर में कांग्रेस सपा के साथ मिल कर चुनाव लड़ना चाहती थी। सपा कतई राजी नहीं हुई, कांग्रेस के पक्ष में माहौल बनता देख सपा एक दर्जन सीटों पर समझौता करने की राजी हुई। तो कांग्रेस ने इंकार कर पूरे राज्य में अपने बलबूते चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी। सपा तो तालमेल के लिए तैयार हो गई पर बसपा सुप्रीमो मायावती किसी भी संभावना पर राजी नहीं हुई। उल्टे कांग्रेस पर तगड़े वार करने लगीं, गठबंधन में बंधे सपा मुखिया भी कांग्रेस पर तंज कसने लगे, इससे बचीखुख्ी संभावनाओं पर भी विराम लग गया। अब गठबंधन भाजपा और कांग्रेस के त्रिकोणीय दंगल की तस्वीर सामने है। जीत के लिए कांग्रेस भी आक्रामक रणनीति अपना रही है। और बड़ी संख्या में मतदाताओं को अपने पाले में खींचने में लगी है। पल-पल बदलती दलीय निष्टाएं कांग्रेस के लिए मुफीद साबित हो रही है। प्रदेश में पिछले लोकसभा चुनाव में बसपा का सूपड़ा साफ हो गया था, इस कारण बसपा भी कोमा की सबसे खतरनाक स्टेज पर शांत पड़ी थी, लेकिन सपा ने बसपा के साथ गठबंधन कर इसमें ऊर्जा का नया संचार कर दिया है। अब हालत ये है बसपा के हिस्ेस में जो सीटें आई हैं उनपर टिकट मांगने वालों की भारी भीड़ लगी हैं। इससे स्पष्ट होता है, इस बार खाता खोलने में बसपा कामयाब होगी। सपा भी केंद्र सरकार गठन में अपना तगड़ा दखल रखने के लिए बहुत ही सधी रणनीति के साथ मैदान में है। सवा की कोशिश है अपने हिस्से की अधिकतम सीटों पर सफलता मिले तालमूल के कारण दोनों दल एक -दूसरे के मतदाताओं पर निर्भर हैं। सफलता तभी मिलेगी जब प्रत्याशियों को सामूहिक वोट मिलेगा। मौदा समय में सपा का पांच सीटों पर कब्जा है ये सीटें मुलायम सिंह के परिवार के पास ही हैं। सपा से अलग हट कर शिवपाल सिंह यादव द्वारा अपनी नई पार्टी बनाना तथा सभी सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान करना सपा के लिऐ खतरे की घंटी मानी जा रही है। क्योंकि शिवपाल सबसे अधिक वोट सपा के ही प्रीावित करेंगे। खुद ता जीतेंगे नहीं लेकिन सपा की जीत में अउंगा जरूर बनेंगे। वैसे ये चुनाव शिवपाल के लिए लिटमस टैस्ट हैं। इस चुनाव से पता चल जाएगा कि व्यक्तिगत रूप से शिवपाल सिंह यादव राजनीति में कहां खड़े हैं।

चूंकि बसपा से तालमूल सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव का अपनी निजी फैसले हैं। सपा संस्थापक बसपा से गठबंधन नहीं चाहते हैं। यहां तक कि सार्वजनिक रूप से कड़ी नाराजगी भी जता चुके हैं। इस गठबंधन पर आज से लेकर आगे तक के लिये तरह-तरह के सवाल उठाये जा रहे हैं। गठबंधन क्या कमाल दिखायेगा। ये चुनाव परिणाम के बाद ही पता चलेगा। भाजपा के लिये प्रदेश में नाक का सवाल है। क्योंकि देश और उत्तर प्रदेश में भाजपा की ही सरकार है, इसलिए भाजपा ने यहां पूरी ताकत झोंक रखी है। पार्टी बूथ स्तर तक कड़ी मेहनत कर रही है। भाजपा के पास समर्पित कार्यकर्ताओं का बूथ स्तर तक मजबूत नेटवर्क है। साथ ही माहौल को अपने पक्ष में करने के लिए शासन, सत्ता की हनक घमक भी है। माहौल कुछ भी हो पर भाजपा को कमतर नहीं आंका जासकता है। प्रचार के तमाम साधनों में भाजपा सबसे ताकतवर दिख रही है। गठबंधन एवं कांग्रेस को भाजपा से निपटना इतना आसान नहीं है जितना समझा जा रहा है। छोटी-छोटी बातों और निजी फायदे के लिए घटती दलीय निष्ठाएं, भितरघात, गुटबाजी अप्रत्याशित से व्यक्तिगत नाराजगी, आयाराम-गायाराम तथा अंदर खाने खरीद-फरोख्त आदि ऐसे तमाम कारण हैं जो राजनीतिक दलों को मुश्किल में डालेंगे।

11 Comments
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