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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह समेत समस्त मोदी मंत्रिमंडल इन दिनों उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड और गोवा सहित अन्य प्रस्तावित विधानसभा चुनावों की तैयारी युद्ध स्तर पर करता दिखाई देने लगा है। पीएम मोदी का पूरा ध्यान उत्तर प्रदेश में पार्टी की दोबारा सरकार बनाने पर टिका हुआ है। सरकारी कार्यक्रमों की बाढ़ आ चुकी है। पीएम लगातार उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड में शिलान्यास और उद्घाटन कर रहे हैं। दूसरी तरफ कोरोना की नई लहर का संकट सामने आ खड़ा हुआ है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में सिनेमा घर, जिम, स्पा, स्कूल, काॅलेज आदि बंद करते हुए येलो एलर्ट लागू कर दिया गया है। उत्तर प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली समेत कई राज्यों में रात्रि कफ्र्यू भी एक बार फिर से शुरू हो चुका है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक न्यायाधीश की चुनाव टालने संबंधी अपील के बाद चुनाव आयोग ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय संग बातचीत शुरू कर दी है। कहा जा रहा है कि यदि स्वास्थ्य मंत्रालय एवं अन्य सरकारी एजेंसियां चुनाव स्थगित की सलाह देती हैं तो संभवतः चुनाव आयोग फरवरी- मार्च के प्रस्तावित चुनावों की तारीख आगे बढ़ा दे। यानी कुल मिलाकर स्थिति भ्रामक बनी हुई है। हालांकि प्रधानमंत्री ने गत दिनों एक उच्च स्तरीय बैठक के दौरान चुनाव वाले राज्यों में वैक्सीनेशन को तेजी से कराने की बात कह यह संकेत भी दिया कि सरकार समय पर ही चुनाव कराने के पक्ष में है। केंद्र सरकार ने बच्चों की वैक्सीन को भी मंजूरी दे दी है। साथ ही कोविड-19 के फ्रंट लाइन वर्कस को बूस्टर डोज लगाने की तैयारी भी जोरों पर है। राजनीतिक विश्लेषक मान रहे हैं कि बूस्टर डोज का एलान चुनावी तैयारी में जुटे सरकारी कर्मचारियों के लिए संकेत है कि चुनाव समय पर ही कराए जाएंगे। दूसरी तरफ इन राज्यों में भाजपा का खिसकता जनाधार, विभिन्न समाचार पत्रों, चैनलों में और सरकारी खुफिया एजेंसियों की रिपोर्ट भाजपा और केंद्र सरकार को चिंता में डालने का काम कर रही हैं। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की तरफ जनता का रूझान तेजी से बढ़ा है तो उत्तराखण्ड में बार-बार मुख्यमंत्री बदलने की कवायद के बाद भी भाजपा के खिलाफ एन्टी इन्कमबेन्सी फैक्टर कम होने का नाम नहीं ले रहा है। गोवा में तृणमूल और आप के चलते भाजपा का संकट गहरा चुका है। दो अन्य राज्यों, हिमाचल और गुजरात में भी इसी वर्ष के अंत में चुनाव होने हैं। यहां भी सत्तारूढ़ भाजपा की स्थिति खराब बताई जा रही है। हिमाचल में तो हालिया संपन्न उपचुनावों में पार्टी को भारी हार का सामना करना पड़ा है। चर्चा जोरों पर है कि यहां भी वर्तमान मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर को बदले जाने की कवायद शुरू हो चुकी है। गुजरात में तो भाजपा आलाकमान सीएम विजय रूपाणी समेत पूरे मंत्रिमंडल को बाहर का रास्ता दिखा ही चुका है। मोदी-शाह वाली भाजपा में सब कुछ अप्रत्याशित होने की परंपरा बन चुकी है। इसके चलते यह संभावना बरकरार है कि पूरी पार्टी मशीनरी को चुनावी मोड में डालने के बाद यकायक ही चुनाव टालने की घोषणा कर दी जाए। हालांकि चुनाव स्थगित का निर्णय चुनाव आयोग को लेना है। पश्चिम बंगाल में जब चुनाव चल रहे थे तब कोरोना का कहर चरम पर था। आखिरी चरण के चुनावों से ठीक पहले देश भर में कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या चार लाख पहुंच गई थी। तब सभी राजनीतिक दलों ने आयोग से अपील की थी कि पश्चिम बंगाल में चुनाव प्रक्रिया को जल्दी निपटाया जाए। आयोग ने लेकिन पूरे महीने भर चुनाव प्रचार चलने दिया था और आठ चरणों में ही चुनाव कराए थे। आयोग के उदासीन रुख से नाराज तमिलनाडु हाईकोर्ट ने तब तल्ख टिप्पणी करते हुए कह डाला था कि क्यों नहीं आयोग के खिलाफ हत्या का मुकदमा शुरू किया जाए? यह सही है कि संवैधानिक दृष्टि से चुनाव आयोग एक स्वतंत्र संस्था है लेकिन वर्तमान समय में उसकी स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। ऐसे में राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि भाजपा शासित राज्यों, विशेषकर उत्तर प्रदेश में पार्टी का संकट गहराता है तो चुनाव आयोग कोरोना के बढ़ते संक्रमण की आड़ में चुनाव स्थगित भी कर सकता है।

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