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हमारी संस्कृति में सामूहिकता एक बहुत बड़ी विशेषता रही है। यह टैग हर जगह चस्पा किया जाता है।
अनेकता में एकता जो हमारी सोच का डीएनए है या कहें फितरत है। लेकिन इस सोच और फितरत को अगर हम वर्तमान में हो रही सियासत के साथ जोड़कर देखें तो यह पूरी तरह 360 डिग्री पर पलट जाता है। खासकर मोदी के बरक्स विपक्षी एकता के संबंध में। अगले साल 2019 के लोकसभा चुनाव का शंखनाद भले ही न हुआ हो लेकिन तैयारियां शुरू हो गई हैं। यह तैयारी भाजपा के मुकाबले कांग्रेस में थोड़ी ढीली है। इस ढीलेपन का उन्हें आगामी चुनाव में खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।
विपक्षी एकता का मार्ग और मोदी का मुस्तकबिल तय करने में अहम भूमिका निभाने वाला उत्तर प्रदेश है, जहां लोकसभा की 80 सीटें हैं। भाजपा के अमित शाह-नरेंद्र मोदी समेत तमाम कार्यकर्ताओं को भी यकीन हो चला है कि 2014 वाला प्रदर्शन भाजपा यहां नहीं दोहराने जा रही है। इसकी बड़ी वजह बसपा- सपा का तयशुदा गठबंधन है।
असल में विपक्षी एकता को बड़ा झटका बुआ-भतीजा दे रहे हैं, जो उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का हाथ थामने को तैयार नहीं हैं। सियासत में रुचि रखने वाले जानते हैं कि दिल्ली के सिंहासन का रास्ता उत्तर प्रदेश से ही होकर गुजरता है। इसलिए भी कांग्रेस को यह झटका मुश्किलों भरा हो सकता है। बसपा प्रमुख मायावती और सपा के अखिलेश यादव को मालूम है कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की राजनीतिक हैसियत नगण्य है इसलिए वह उससे दामन झटक रहे हैं। दूसरे, मायावती राजस्थान में कांग्रेस के साथ गठबंधन की जो बात कह रही हैं उसे कांग्रेस नहीं कबूल कर रही है, क्योंकि राजस्थान में बसपा की राजनीतिक हस्ती शून्य है।
गठबंधन में मुश्किलें तब शुरू हुई जब विधानसभा चुनाव की हार के बाद अखिलेश कांग्रेस से किनारा करने लगे। अखिलेश ने ‘यूपी को साथ पसंद है’ के फ्लॉप शो के बाद कांग्रेस से दूरी बना ली। जिसका लगातार विस्तार होता गया। बेशक कुछ मौकों पर अखिलेश कांग्रेस के करीब आते दिखाई दिए मगर वह तात्कालिक था। भारत बंद के दौरान भी अलगाव का नजारा दिखाई दिया। कांग्रेस के इस भारत बंद सरीखे महात्वाकांक्षी अभियानों में अखिलेश और मायावती तटस्थ रहे। बंद के दौरान दोनों दलों के कार्यकर्ताओं ने भी किसी किस्म की कोई सक्रियता नहीं दिखाई।
यही नहीं दिल्ली के रामलीला मैदान में जब सारे दिग्गज नेता हाथों में हाथ लिए फोटो सेशन कर दिए तो सपा-बसपा के प्रतिनिधि नदारद दिखाई दिए। भारत बंद के बाद बसपा प्रमुख ने केंद्र की मोदी सरकार को कांग्रेस की राह  पर चलने वाला बताया। उन्होंने कहा, कांग्रेस ने पेट्रोल को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कर दिया था जिसमें बाद में मोदी सरकार ने कोई बदलाव नहीं किया, बल्कि उसी राह पर आगे बढ़ते हुए डीजल को भी सरकारी नियंत्रण से बाहर कर दिया। रेखांकित करने वाली बात यह कि बुआ की बात पर भतीजे ने भी अपनी सहमति जता दी। मायावती के इस बयान का मतलब यह है कि वह भाजपा-कांग्रेस से दूरी बनाए रखना चाहती हैं। यह भी संकेत है कि शायद राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ चुनाव में गठबंधन होने की स्थिति में कांग्रेस पर ज्यादा सीटों के लिए दबाव बनाना है।
राजनीतिक पंडित बताते हैं कि जब भी केंद्र में कोई ताकतवर या फास्टिस पद्धति वाली सरकार आती है तो उसके मुकाबले में छोटे-छोटे दलों की एकता या कह लें कि उनका गठबंधन ही संघर्ष करता है। बहुत संभव है चुनाव बाद छोटे दलों का गठबंधन सबसे बड़े दल के रूप में उभरे और वह सरकार बनाने में कामयाब भी हो जाए। भारतीय राजनीति में भी यह उदाहरण कई बार देखने को मिला है। इमरजेंसी के बाद जनता पार्टी और राजीव शासन के बाद जनता दल, नरसिम्हा राव सरकार के बाद नए परिदृश्य में राजग गठबंधन की सरकार। एक बार फिर से वही हालात थोड़ा बदले रूप में कब बन जाएं इस पर कुछ भी कहना थोड़ा जल्दीबाजी हो सकता है।
मोदी ब्रिगेड का मुकाबला कांग्रेस या विपक्षी दल नहीं कर पा रहे हैं। उनके पास बमवर्षा विमान है। राहुल एक हमला बोलते हैं उधर से हमलों की बारिश शुरू हो जाती है। एक आवाज को दबाने के लिए एक साथ बहुत सी आवाजें सामने लाई जाती हैं। यह चीजें आगामी लोकसभा चुनाव तक बहुत बढ़ेंगी। इस कदर कि विपक्ष कुछ भी बोले भाजपा का स्याह सच दिखाने को जुर्रत नहीं कर पाएगा। ऐसे में विपक्षी एकता को संभालने की जरूरत थी ताकि जनतंत्र बचा रहे। देश बचा रहे। लेकिन छोटे दलों की बड़ी और व्यक्तिगत महात्वाकांक्षा सामने के बड़े दल को फास्टिस पद्धति पर चलने के लिए माहौल रच रही है।

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