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भाजपा के खिलाफ मोर्चा बनाने की कवायद

2024 के आम चुनाव को लेकर देश के राजनीतिक दलों में अभी से हलचल महसूस की जा सकती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के खिलाफ एक राजनीतिक विकल्प खड़ा करने की कोशिश में बीते कुछ महीनों से काफी तेजी देखने को मिली है। पिछले हफ्ते यानी 20 सितंबर से देश भर में 19 विपक्षी पार्टियां केंद्र की भाजपा सरकार के खिलाफ अपनी मांगों को लेकर संसद के बाद अब सड़कों पर भी विरोध-प्रदर्शन कर रही हैं। भाजपा सरकार के खिलाफ विपक्षी पार्टियों के राजनीतिक अभियान से लेकर आंदोलनों को संगठित और प्रभावी बनाने के मकसद से इस संयुक्त समन्वय समिति के गठन की तैयारी जारी है

वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में विपक्षी दलों की ओर से भाजपा के खिलाफ महागठबंधन बनाने के प्रयास हुए थे, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। अब 2024 के लिए विपक्षी दलों ने फिर कोशिशें शुरू कर दी हैं। भले ही लंबे अरसे के बाद 19 विपक्षी दलों के नेता एक साथ बैठे हैं, संसद के मानसून सत्र में साथ-साथ चले लेकिन सबसे अहम सवाल यह है कि जिस समन्वय समिति के गठन की बात की जा रही है उसका नेता कौन होगा? कांग्रेस को छोड़कर यदि देखा जाए तो जितनी भी पार्टियां सोनिया गांधी की बैठक में शामिल हुई थी उनका जनाधार उनके राज्य के बाहर कहीं नहीं है।

ममता बनर्जी बंगाल तक सीमित हैं तो शरद पवार का महाराष्ट्र के बाहर कोई अस्तित्व नहीं हैं। इसी तरह लालू यादव का जनाधार बिहार के बाहर नहीं है। अखिलेश यादव हो या मायावती दोनों उत्तर प्रदेश तक ही सीमित हैं। ममता बनर्जी और शरद पवार दोनों की नजर दिल्ली की कुर्सी पर है। पिछले दिनों जिस तरह से चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर के साथ शरद पवार ने दो-दो बैठकें की और विपक्षी एकता कायम करने का प्रयास किया उसके भी अपने मायने हैं।

केंद्र के खिलाफ लामबंद हुए विपक्षी दल के नेता

मिशन 2024 को लेकर देश के राजनीतिक दलों में अभी से हलचल महसूस की जा सकती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के खिलाफ एक राजनीतिक विकल्प खड़ा करने की कोशिश में बीते कुछ महीनों से काफी तेजी देखने को मिली है। पिछले हफ्ते यानी 20 सितंबर से देश भर में 19 विपक्षी पार्टियां केंद्र की भाजपा सरकार के खिलाफ अपनी मांगों को लेकर संसद के बाद अब सड़कों पर भी विरोध-प्रदर्शन कर रही हैं। यह विरोध-प्रदर्शन 30 सितंबर तक चलेगा। इसको लेकर फैसला पिछले महीने कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी की अगुवाई में हुई बैठक के दौरान ही लिया गया था।

दरअसल, 20 अगस्त को एक वर्चुअल बैठक के दौरान विपक्षी पार्टियों के बीच इस बात पर सहमति बनी थी कि मिशन 2024 लोकसभा चुनाव में केंद्र की भाजपा सरकार को हराने के लिए एकता दिखानी होगी। इन पार्टियों के नेताओं ने केंद्र के सामने 11 मांगें भी रखी थीं। बैठक के बाद संयुक्त बयान में कहा गया था कि 20 से 30 सितंबर के बीच 19 विपक्षी पार्टियां देश व्यापी विरोध प्रदर्शन करेंगी। विपक्षी दलों ने कहा था कि सरकार जासूसी मामले की सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच कराए, तीनों कृषि कानूनों को निरस्त करे, महंगाई पर अंकुश लगाए और जम्मू- कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करे। विपक्षी पार्टियों ने यह मांग भी की है कि आयकर के दायरे से बाहर के सभी परिवारों को साढ़े सात हजार रुपए की मासिक मदद दी जाए और जरूरतमंदों को मुफ्त अनाज तथा रोजमर्रा की जरूरत की दूसरी चीजें मुहैया कराई जाएं।

यही नहीं, विपक्षी पार्टियों ने पेट्रोलियम उत्पादों, रसोई गैस, खाने में उपयोग होने वाले तेल और दूसरी जरूरी वस्तुओं की कीमतों में कमी की मांग को भी प्रमुखता से उठाया। वहीं किसानों के मुद्दे को लेकर विपक्षी दलों ने मांग की थी कि तीनों किसान विरोधी कानूनों को निरस्त किया जाए और एमएसपी की गारंटी दी जाए। सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों का निजीकरण बंद हो, श्रम संहिताओं को निरस्त किया जाए और कामकाजी तबके के अधिकारों को बहाल किया जाए। विपक्ष ने सभी राजनीतिक कैदियों को भी रिहा करने की अपील की थी।

विपक्षी दलों ने सरकार से आग्रह किया कि एमएसएमई क्षेत्र के लिए प्रोत्साहन पैकेज दिया जाए, खाली सरकारी पदों को भरा जाए। मनरेगा के तहत कार्य की 200 दिन की गारंटी दी जाए और मजदूरी को दोगुना किया जाए। इसी तर्ज पर शहरी क्षेत्र के लिए कानून बने। उन्होंने कहा कि शिक्षकों, शिक्षण संस्थानों के कर्मचारियों और छात्रों का प्राथमिकता के आधार पर टीकाकरण हो।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ संयुक्त विपक्ष बनाने की अपील सबसे पहले ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान की थी। बंगाल चुनाव में बंपर जीत के बाद ममता बनर्जी विपक्ष का सबसे मजबूत चेहरा बनकर उभरी। तृणमूल कांग्रेस की मुखिया भी मानसून सत्र के दौरान दिल्ली दौरे पर आई थी। उस दौरान उन्होंने विपक्षी नेताओं से मुलाकात की। विपक्षी नेताओं की इस बैठक में बंगाल की मुख्यमंत्री एवं तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने समन्वय समिति के गठन का सुझाव देते हुए इसकी जरूरत बताई और कहा कि भाजपा एवं मोदी सरकार की नीतियों के खिलाफ विपक्ष की पार्टियों का एक साथ आना जरूरी हो गया है। इसमें यह भी अहम होगा कि प्रमुख राष्ट्रीय और राजनीतिक मुद्दों पर विपक्षी दलों के बीच निरंतर आपसी संवाद व समन्वय का सिलसिला बना रहना चाहिए।

अब भाजपा सरकार के खिलाफ विपक्षी पार्टियों के राजनीतिक अभियान से लेकर आंदोलनों को संगठित और प्रभावी बनाने के मकसद से इस संयुक्त समन्वय समिति के गठन की तैयारी की जा रही है। मिशन 2024 के आम चुनाव के मद्देनजर विपक्षी एकजुटता का यह पहला मौका है, जब विपक्ष की 19 पार्टियों ने एकजुट होकर इन मुद्दों पर सरकार को संसद के बाद सड़क पर घेरने का फैसला किया है। विपक्ष के नेताओं का कहना है कि एकजुट विपक्षी पार्टियां देश की 60 फीसद से अधिक आबादी का प्रतिनिधित्व करती हैं। इस लिहाज से मोदी सरकार के खिलाफ अपने पहले बड़े सियासी अभियान को जमीन पर सफल बनाना विपक्षी दलों के लिए बड़ी चुनौती है। संभावना जताई जा रही है कि संयुक्त समन्वय समिति का गठन इसके पहले कर दिया जाएगा। अब बड़ा सवाल यह है कि किसके नेतृत्व में संयुक्त समन्वय समिति का गठन होगा।

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने विपक्ष को एकजुट करने का प्रयास इससे पहले वर्ष 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के खिलाफ किया था। जिसमें उन्हें सफलता भी मिली थी। तब गठबंधन सरकार (यूपीए) का गठन किया था। उन्होंने ऐसा तब किया जब अपने ‘इंडिया शाइनिंग’ अभियान के साथ भाजपा का मनोबल ऊंचाई पर था। वर्ष 2004 के लोकसभा चुनाव से पहले सोनिया को अहसास हो गया था कि अपने बूते वाजपेयी सरकार का सामना करने के लिए कांग्रेस बहुत कमजोर है जैसा कि वर्तमान में भी मोदी सरकार से मुकाबला करने के लिए कांग्रेस बहुत पीछे है। इसलिए 2004 में उन्होंने भाजपा का सामना करने के लिए धर्मनिरपेक्ष दलों का एक गठबंधन तैयार किया।

गठबंधन में ये दल हैं शामिल हुए बीते महीने कांग्रेस अध्यक्ष द्वारा बुलाई गई इस अहम बैठक में कुल 19 दलों के नेताओं ने भाग लिया। जिसके बाद अब केंद्र सरकार के खिलाफ सड़कों पर विरोध- प्रदर्शन कर रहे हैं। ये दल हैं, कांग्रेस, टीएमसी, द्रमुक, एनसीपी, शिवसेना, झारखंड मुक्ति मोर्चा, माकपा, भाकपा, नेशनल कांफ्रेंस, राजद, एआईयूडीएफ, विदुथलाई चिरुथाईगल कताची, लोकतांत्रिक जनता दल, जेडीएस, आरएलडी, आरएसपी, केरल कांग्रेस एम, पीडीपी एवं आईयूएमएल।

कांग्रेस खो चुकी है आत्मविश्वास
मिशन 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए विपक्षी एकता के कांग्रेस के आह्नान पर तंज करते हुए भाजपा ने कहा है कि इससे साबित हो चुका है कि जनता द्वारा ठुकराए जाने के बाद उसे खुद पर ही भरोसा नहीं रहा। लोगों का विश्वास देश के विकास के लिए पीएम नरेंद्र मोदी के प्रति है।

 

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