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कांग्रेस में वंशवाद ,पुत्र मोह में पायलट को किनारे लगा रहे गहलोत

पिछले 9 दिन से राजस्थान में कांग्रेस का राजनीतिक संकट जारी है । प्रदेश के सीएम अशोक गहलोत और डिप्टी सीएम रहे सचिन पायलट में शह और मात का खेल चल रहा है। इस बीच बेशक अशोक गहलोत अपनी सरकार का बहुमत दिखाने में कामयाब रहे । लेकिन उनके धुर विरोधी सचिन पायलट ने अभी भी अपने पत्ते नहीं खोले हैं। अभी भी सचिन कोर्ट से लेकर जनता की कचहरी तक मोर्चा संभाले हुए हैं।

सब जानते हैं कि सचिन पायलट वह नेता है जिनके बल पर राजस्थान में 2018 में कांग्रेस सरकार बनी थी। तब उनकी मेहनत को देखकर हर कोई यही कहता था कि इस मेहनत का फल उन्हें मुख्यमंत्री के रूप में जरूर मिलेगा। लेकिन मेहनत का यह फल मिला राजस्थान के पूर्व में दो बार मुख्यमंत्री रह चुके अशोक गहलोत को। गहलोत तीसरी बार मुख्यमंत्री बन गए।

बहरहाल , राजस्थान की राजनीति में गहलोत अपनी अंतिम पारी खेल रहे हैं। उन्होंने खुद कहा है कि उनको 40 साल हो गयें राजनीति करते, अब युवाओं की बारी है। अगर आप यह सोच रहे हैं कि युवाओं की बारी में वह सचिन पायलट की तरफ इशारा कर रहे हैं तो इसका मतलब आप अभी गहलोत को समझते नही है। गहलोत का अंदाजा ‘कही पर निगाहें कही पर निशाना’ वाला होता है। उनको चिंता सचिन पायलट की नहीं बल्कि अपने युवराज वैभव गहलोत की है।

सचिन के मुकाबले उनकी राजनीतिक विरासत संभालने वाले उनके पुत्र वैभव गहलोत राजस्थान की राजनीति में कही स्टैंड नहीं करते हैं । गहलोत के पुत्र वैभव आज सिर्फ राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन प्रदेश के अध्यक्ष बन कर रह गए हैं। जबकि वह राजनीति पिच पारी खेलने में अभी तक फाऊल खेल रहे हैं। वैभव की पहली पारी एक साल पहले लोकसभा चुनाव में खेली गई थी , जिसमें वह आऊट हो चुके हैं।

दिनो दिन राजस्थान कांग्रेस पर सचिन पायलट का वर्चस्व बढ़ता जा रहा था। सत्ता से लेकर संगठन तक उनकी मजबूत पकड बनती जा रही थी। निश्चित तौर पर सचिन पायलट राजस्थान के लोकप्रिय नेताओ में सुमार हो चुके थे। यही चिंता अशोक गहलोत को अंदर ही अंदर खोखला कर रही थी। जिस तरह से कांग्रेस में वंशवाद की बेल पनप रही है , गहलोत भी अपने पुत्र को इसी परंपरा का एक हिस्सा बनाना चाहते हैं। वह वैभव को राजस्थान की राजनीति की मुख्यधारा में शामिल करने को बेचैन है। लेकिन जनता से सीधे संवाद के तौर पर देखे तो वैभव गहलोत सचिन पायलट के सामने कहीं नहीं ठहरते हैं ।

चर्चा है कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत सचिन पायलट को किनारे लगाकर वैभव गहलोत को राजस्थान की राजनीति की सीढियां चढाकर सत्ता तक लाना चाहते हैं। जिसमें पहले नंबर पर फिलहाल सचिन पायलट है। पायलट के पार्टी में रहते यह संभव नही लग रहा था। शायद यही वजह है कि मुख्यमंत्री रहते अशोक गहलोत सचिन पायलट को राजस्थान की राजनीति से दूर कर अपने पुत्र वैभव गहलोत को सत्ता के नजदीक लाना चाहते हैं। जिसके चलते सचिन पायलट गहलोत के निशाने पर हैं।

राजनीति में अतीत बहुत मायने रखता है। फिलहाल हम आपको 25 मई 2019 को शनिवार का वह दिन याद दिलाते हैं जब कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने पार्टी की सर्वोच्च नीति निर्धारण इकाई कांग्रेस कार्य समिति (सीडब्ल्यूसी) की बैठक की थी। बैठक में राहुल ने अपने इस्तीफे की पेशकश की थी। यही नहीं बल्कि राहुल ने राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में करारी हार पर विशेष रूप से नाराजगी जताई।

तब बैठक में राहुल गांधी ने राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ का उल्लेख करते हुए कि इन नेताओं ने अपने बेटों-रिश्तेदारों को टिकट दिलाने के लिए जिद की और उन्हीं को चुनाव जिताने में लगे रहे और दूसरे स्थानों पर ध्यान नहीं दिया।

राहुला गांधी ने तो लोकसभा के चुनाव होने के बाद कमलनाथ और गहलोत पर यह कडी टिप्पणी की थी। जबकि सचिन पायलट ने राजस्थान चुनाव समिति की बैठक के ठीक पहले ही इस मामले में दो टूक कह दिया था। तब प्रदेश के उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट ने परिवारवाद का मुद्दा छेड़कर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत समेत कड़े शब्दों में संदेश दे दिया था। राजस्थान कांग्रैस अध्यक्ष सचिन पायलट ने ये कहा है कि उनके परिवार का कोई सदस्य लोकसभा चुनाव नही लड़ेगा।

तब अटकलें लगाई जा रही थी कि अपने संसदीय क्षेत्र अजमेर से सचिन पायलट अपनी मां रमा पायलट को चुनाव लड़वाना चाहते थे ताकि लोकसभा का यह क्षेत्र उनके परिवार में ही सिमटा रह सके। लेकिन यह मात्र अफवाहें साबित हुई थी। सचिन तब परिवारवाद को छोड़कर आम कार्यकर्ताओं को मौका देने की पैरवी कर रहे थे।

तब छह फरवरी को लोकसभा के लिए उम्मीदवारों के चयन को लेकर जयपुर मे होने वाली राजस्थान चुनाव समिति की बैठक से पहले सचिन पायलट ने सीधा संदेश मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को दिया था। क्योंकि पायलट बखूबी जानते थे कि गहलोत पुत्र मोह में पूरी तरह फंसे हुए हैं। वे अपने पुत्र वैभव गहलोत को चुनाव लडाने के लिए कोई भी दांवपेंच आजमा सकते हैं।

सब जानते हैं कि राजस्थान में तीसरी बार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज हुए अशोक गहलोत, इसे आखिरी पारी के रुप में खेल रहे है। यही कारण है कि उनकी राजनीति के हाशिये पर काफी समय से मंडराते रहे बेटे वैभव गहलोत को वे सेंटर स्टेज पर लाने की जुगत लगाते रहे है। तब पुत्र वैभव को सांसद की कुर्सी तक पहुँचाने के लिए बकायदा सर्वेक्षण किया था। गहलोत ने दो सप्ताह तक जालोर-सिरोही, जोधपुर और टोंक-सवाईमाधोपुर सीटों में दोरे किये । पुत्र मोह का बुखार उन पर इतना हावी था कि संयम लोढ़ा, जिनको वे फूटी आंख देखना भी पंसद नही करते थे, गहलोत ने उनसे भी लंबी मंत्रणा की थी।

 

राजेश पायलट के पुत्र के रुप में राजनीति में प्रवेश करने वाले सचिन पायलट ने तब अपना रुख साफ तरीके से रख दिया है था कि वे परिवारवाद को बढावा देने के पक्ष में नही है। इसके बावजूद भी गहलोत दस जनपथ के रसूखो के बल पर बेटे वैभव गहलोत को जोधपुर से टिकट दिलाने में कामयाब हो गयें थे। हालांकि बाद में वैभव गहलोत लोकसभा का चुनाव बुरी तरह हारे थे।

पांच बार सांसद और पांचवी बार विधायक बने तीसरी बार के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अपनी राजनीतिक पारी में अभी तक केवल दो चुनाव हारे है। एक उनका पहला चुनाव था और दूसरा 1989 का लोकसभा चुनाव, जब वे राम लहर की चपेट में आ गये।

कहने वाले ये भी कह सकते है कि ज्यादातर बड़े नेता पहला चुनाव हार कर ही शुरुआत करते है। पर, वैभव गहलोत का राजनीतिक करियर उनके खुद से ज्यादा, उनके पिता के राजनीतिक बागवानी के स्किल की परीक्षा बनता जा रहा है। वैसे भी राजनीति में अभी तक कोई ऐसी तकनीक ईजाद नही हो पायी है जिससे बंजर सिर पर बालो की फसल उगाई जा सके। बीज का पौधा या पौधे का पेड़ बनेगा या नही, ये भविष्य के गर्भ में है पर एक बात निश्चित है कि अशोक गहलोत ने सिचांई करने में कोई कसर बाकी नही छोड़ी।

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