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डॉ. राममनोहर लोहिया: पुण्यतिथि विशेष

डॉ. राममनोहर लोहिया भारत में गैर-कांग्रेसवाद के शिल्पी थे, और आज़ाद भारत में यह उन्हीं के अथक प्रयास से संभव हो सका कि कभी अपराजेय समझी जाने वाली कांग्रेस सन् 1967 तक कई राज्यों में चुनाव हारी। लोहिया जी ने स्वतंत्रता संग्राम के कई आंदोलनों में भी अपना योगदान दिया। 9 अगस्त 1942 को जब गांधी जी व अन्य कांग्रेस के नेता गिरफ्तार कर लिए गए, तब लोहिया ने भूमिगत रहकर भारत छोड़ो आंदोलन  को पूरे देश में फैलाया।

डॉ. राममनोहर लोहिया का जन्म 23 मार्च 1910 को हुआ था और मृत्यु 12 अक्टूबर 1967 को हो गयी थी। डॉ लोहिया अपना जन्मदिन नहीं मनाते थे क्योंकि 23 मार्च शहीद-ए-आज़म भगत सिंह का शहादत दिवस है। लोहिया आज़ाद भारत के उन कुछ चुनिंदा राजनेताओं में शुमार किए जा सकते हैं जो समाजवादी नेता होने के साथ-साथ मौलिक विचारक और देश में मातृभाषा के पक्षधर थे। हालांकि वे हिंदी के अलावा अंग्रेजी और एक और दूसरी भाषा जर्मन के भी जानकार थे। गौरतलब है कि डॉ. लोहिया ने उनके डॉक्टरेट की डिग्री जर्मनी के हम्बोल्ट यूनिवर्सिटी से हासिल की थी।

वे देश में अंग्रेजी हटाओ आन्दोलन के प्रणेता थे और इस मुद्दे पर वे बेबाक राय रखते थे। उनके लिए स्वभाषा राजनीति का मुद्दा नहीं बल्कि अपने स्वाभिमान का प्रश्न और लाखों-करोड़ों को हीन ग्रंथि से उबरकर आत्मविश्वास से भर देने का स्वप्न था। डॉ. लोहिया न केवल एक गंभीर चिन्तक थे बल्कि सच्चे कर्मवीर भी थे। लोहिया ही थे जो राजनीति की गंदी गली में भी शुद्ध आचरण की बात करते थे। वे एक मात्र ऐसे नेता थे जिन्होंने उनकी पार्टी की सरकार से खुलेआम त्यागपत्र की मांग की, क्योंकि उस सरकार के शासन में आंदोलनकारियों पर गोली चलाई थी। लोहिया जी ने स्वतंत्रता संग्राम के कई आंदोलनों में भी अपना योगदान दिया। 9 अगस्त 1942 को जब गांधी जी व अन्य कांग्रेस के नेता गिरफ्तार कर लिए गए, तब लोहिया ने भूमिगत रहकर भारत छोड़ो आंदोलन  को पूरे देश में फैलाया।लोहिया मात्र 57 वर्ष ही जीवित रह सके मगर इतने कम समय में भी वे भारतीय राजनीति पर अलग और अमिट छाप छोड़ गए। डॉ. लोहिया उनकी ठेठ देसी सोच और कर्मवीरता की वजह से सदियों तक याद किए जाते रहेंगे।

आइये आज हम डॉ. राममनोहर लोहिया की 52वीं पुण्य तिथि पर जानते हैं ‘भारत विभाजन पर लोहिया जी के विचार’

देश की आजादी के 73  साल पूरे हो गए हैं और आज जब हम आजादी से जी रहे हैं तो उन कारणों पर भी ध्यान देना जरूरी है जिनकी वजह से हमें विभाजन का परिणाम झेलना पड़ा था। इस पर डॉ. राम मनोहर लोहिया ने अपने विचार रखे हैं।

राममनोहर लोहिया उस समय युवा थे और देश की आजादी और बॅटवारे के घटनाक्रम को बहुत करीब से देख रहे थे। उस समय की तमाम ऐसी घटनाओं और स्थितियों का जिनके प्रति एक आम भारतीय नागरिक के मन में बहुत स्पष्ट और तार्किक व्याख्या नहीं है, लोहिया ने अपनी पुस्तक ‘गिल्टी मैन एंड इंडियाज पार्टीशन’ (भारत विभाजन के गुनहगार) में परद दर परत रहस्यों को खोला है जिस पर उन्होंने भारत विभाजन पर अपने कुछ विचारों उल्लेख किया हैं।

ब्रितानी कपट– किताब में लोहिया ब्रितानी कपट के बारे में चर्चा करते हुए उसे तो दोष देते ही हैं लेकिन साथ ही जवाहरलाल नेहरू और दूसरे कांग्रेसी नेताओं के उस कपट में फंसने का उल्लेख करते हैं। वो लिखते हैं, ‘श्री नेहरू ने अपने राजनीतिक मतलबों के लिए लेडी माउंटबेटन का इस्तेमाल किया था। लेडी माउंटबेटन और उनके लार्ड ने भी उसी तरह अपने राजनीतिक मतलबों के लिए श्री नेहरू का इस्तेमाल किया। पारस्परिक लाभ के ऐसे रिश्तों में स्वाभाविक रूप से एक हद तक कोमलता पनप ही आती है।’

कांग्रेस नेतृत्व का उतार- साल 1946 के आसपास नोआखाली (नोवाखाली, ये मौजूदा बांग्लादेश के चटगांव मंडल में एक जिला है) में नेहरू से लोहिया की मुलाकात हुई थी। लोहिया के मुताबिक इस मुलाकात के लिए महात्मा गांधी ने उन्हें विवश किया था। इस मुलाकात में नेहरू ने लोहिया से कहा कि वो भारत देश से पूर्वी बंगाल को अलग कर देना चाहते हैं। नेहरू की इस बात का लोहिया के मानस पर गहरा असर पड़ा और वो अपनी किताब में लिखते हैं, ‘ये लोग बूढ़े हो गए थे और थक गए थे। वो अपनी मौत के निकट आ गए थे या कम से कम ऐसा उन्होंने सोचा जरूर ही होगा। यह भी सच है कि पद के आराम के बिना ये अधिक दिनों तक जिंदा भी नहीं रहते।’

गांधी की अहिंसा- लोहिया, महात्मा गांधी से गहरे प्रभावित थे। इस किताब में एक जगह वो कहते हैं कि नेहरू की कुछ बात पर भरोसा नहीं किया जा सकता लेकिन गांधी की किसी बात पर शक करने की कोई गुंजाइश ही नहीं है। लोहिया चाहते थे कि बंटवारे को लेकर गांधी सख्त रुख लें। वो नेहरू और पटेल को ऐसा करने या ऐसे किसी प्रस्ताव पर विचार करने से न केवल रोकें बल्कि उन्हें ऐसा न करने की कड़ी हिदायत दें। लेकिन गांधी ने ऐसा कुछ नहीं किया। उन्होंने नेहरू से असहमत होने के बाद कांग्रेसजनों से अपने नेताओं की बात मानने के लिए कहा जिससे लोहिया को गहरा धक्का लगा था।

हिंदू-मुस्लिम दंगों की प्रत्यक्ष परिस्थिति- साल 1946 भारत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण समय था। जहां एक तरफ इस वक्त आज़ादी मिलने की खुशी लोगों में शुरू गई थी और अंग्रेजों का देश से जाना पक्का था वहीं दूसरी तरफ देश का बड़ा हिस्सा सांप्रदायिक दंगे में जल रहा था। महात्मा गांधी और उनके साथ खुद लोहिया दिल्ली से दूर बंगाल के हिंसाग्रस्त इलाकों में शांति के लिए प्रयास कर रहे थे।

हिंदू अहंकार– लोहिया अपनी किताब में भारत विभाजन के लिए हिंदूवादी संगठनों को भी जिम्मेदार मानते थे। ‘अखंड भारत के लिए सबसे अधिक व उच्च स्वर में नारा लगाने वाले, वर्तमान के जनसंघ और उसके पूर्व पक्षपाती जो हिंदूवाद की भावना के अहिंदू तत्व के थे, उन्होंने ब्रिटिश और मुस्लिम लीग की देश के विभाजन में सहायता की।

मुस्लिम लीग की कूटनीति– लोहिया ने अपनी किताब में लिखा है कि जिन्ना, मौलाना आजाद से बढ़िया मुसलमान नहीं थे फिर भी भारतीय मुसलमानों ने उन्हें अपनी अगुवाई के लिए चुना। वो लिखते हैं, ‘मौलाना आजाद मुस्लिम हितों के मिस्टर जिन्ना से अधिक अच्छे सेवक थे, लेकिन मुसलमानों ने उनकी सेवा को ठुकरा दिया।

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