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उत्तराखण्ड कांग्रेस में कलह

पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह का आसानी से तख्ता पलट करने वाले पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव हरीश रावत अपने गृहराज्य उत्तराखण्ड में पार्टी भीतर मचे घमासान को नहीं थाम पा रहे हैं। रावत को राहुल गांधी का विश्वस्त माना जाता है। राहुल ने कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद अपनी टीम में हरीश रावत को न केवल पार्टी की शीर्ष संस्था कांग्रेस वर्किंग कमेटी का स्थाई सदस्य बनाया था बल्कि उन्हें राष्ट्रीय महासचिव और असम का प्रभारी पद भी दिया था। पंजाब कांग्रेस में चल रहे घमासान को थामने में विफल रही केंद्रीय प्रभारी आशा कुमारी की जगह 2020 में हरीश रावत को प्रभारी बनाया जाना भी राहुल गांधी की सहमति से उठाया गया कदम था। पार्टी सूत्रों का दावा है कि पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी ने राहुल की सलाह पर ही रावत को ‘मिशन पंजाब’ का इंचार्ज बनाया था।

रावत ने चार्ज संभालने के साथ ही अमरिंदर सिंह के पर कतरने की व्यूह रचना शुरू कर दी थी। गत् सप्ताह कैप्टन का मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा इस ‘मिशन पंजाब’ का क्लाइमेक्स था। अपने गृह राज्य उत्तराखण्ड में लेकिन हरीश रावत पूरा दमखम लगाने के बाद भी अपने अनुसार पार्टी को चला नहीं पा रहे हैं। पार्टी सूत्रों की मानें तो उत्तराखण्ड के केंद्रीय प्रभारी देवेंद्र यादव संग टीम रावत की पटरी नहीं बैठ पा रही है। हालांकि रावत अपनी पसंद का प्रदेश अध्यक्ष बना पाने में तो सफल रहे हैं लेकिन उनका विरोधी धड़ा तीन कार्यकारी अध्यक्ष पदों पर अपने गुट के नेताओं को लाने में सफल रहा। जानकारों का दावा है कि हरीश रावत के लिए एक बड़ा सदमा उनके घोर विरोधी रणजीत सिंह रावत का कार्यकारी अध्यक्ष बनना है। देवेंद्र यादव ने बगैर रावत से सलाह-मशविरा किए ही रणजीत को कार्यकारी अध्यक्ष बनाने में सक्रिय भूमिका निभाई जिसने प्रदेश कांगे्रस में रावत विरोधियों को थोड़ी राहत पहुंचाने का काम किया।

जानकारों का कहना है कि यह समझते हुए भी कि हरीश रावत बगैर कांग्रेस का राज्य में कोई अस्तित्व नहीं, राज्य के प्रभारी देवेंद्र यादव रावत को पूरा सहयोग करने से बचते नजर आ रहे हैं। हरीश रावत के सभी विरोधी इस समय एकजुट हो भाजपा के खिलाफ खड़े होने के बजाय रावत की राह में नित नए रोड़ा अटकाने में जुटे हुए हैं। इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि ये रावत विरोधी एक समय में उनके खासे विश्वस्त हुआ करते थे। 2002 में गठित राज्य की पहली निर्वाचित सरकार में शामिल प्रीतम सिंह और किशोर उपाध्याय उन दिनों रावत के घोर समर्थक होते थे। तत्कालीन मुख्यमंत्री एनडी तिवारी को घेरने का कोई मौका ये दो नेता तब नहीं छोड़ते थे।
कहा जाता है कि तब सीएम बनने से रह गए रावत की शह पर ही ये दोनों एनडी की मुखालफत करते थे। रणजीत रावत को तो हरीश का हनुमान कहा जाता था।

रावत सरकार में बतौर सलाहकार रणजीत की तूती बोला करती थी। अब ये तीनों ही हरीश रावत के सबसे बड़े विरोधी बन चुके हैं। रावत को घेरने का कोई मौका नहीं छोड़ने वाले इन नेताओं के चलते जनता में कांग्रेस के ‘डिवाइडेड हाउस’ होने का संदेश जा रहा है जो आगामी विधानसभा चुनाव में पार्टी को निश्चित ही नुकसान पहुंचाने का काम करेगा। चरणजीत सिंह चन्नी के पंजाब का मुख्यमंत्री बनने के बाद हरीश रावत ने बयान दिया कि वे चाहते हैं कि उत्तराखण्ड में भी एक दलित कभी मुख्यमंत्री बने। रावत के इस बयान का राजनीतिक निहितार्थ समझे बगैर नेता प्रतिपक्ष प्रीतम सिंह और पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष किशोर उपाध्याय ने इस बयान को आधार बनाते हुए रावत की घेराबंदी करने में देर नहीं लगाई है। प्रीतम सिंह ने रावत के इस बयान पर चुटकी लेते हुए कह डाला ‘बड़ी देर कर दी हुजूर आते-आते’ तो वहीं किशोर उपाध्याय ने 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की करारी हार का जिक्र करते हुए हरीश रावत की नेतृत्व क्षमता पर सवाल खड़े कर डाले हैं। कुल मिलाकर ‘मिशन पंजाब’ के हीरो बन उभरे रावत स्वयं के प्रदेश में मची कांगे्रसी रार को रोक नहीं पा रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यदि कांग्रेस आलाकमान ने समय रहते हस्तक्षेप नहीं किया तो 2022 में सत्ता वापसी का सपना कांग्रेस के लिए सपना बनकर ही रह जाएगा।

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