[gtranslate]
Country

सुप्रीम कोर्ट की रोक के बावजूद नए कृषि कानूनों पर हो रहा अमल ,सुप्रीम कोर्ट पहुंचे व्यापारी 

पिछले दो महीनों से भी ज्यादा समय से नए कृषि कानूनों के खिलाफ देशभर के किसानों का आंदोलन जारी है। बीते  मानसून सत्र में केंद्र सरकार द्वारा पास किए गए ये तीनों नए कृषि कानून सरकार के लिए गले ही हड्डी बने हुए हैं।लेकिन इस बीच कृषि कानूनों के समर्थन में सर्वोच्च न्यायालय में याचिकाएं दर्ज  होने से कहा जा रहा है कि इस लड़ाई  में  नया मोड़ आ गया है।

इन कृषि कानूनों को लेकर  जहां एक ओर देशभर के किसान इन कृषि कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं वहीं अब कानूनों के समर्थक भी अपनी मांगें लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंचने लगे हैं। पहले आटा मिलों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर कृषि कानूनों को लागू करने की मांग की थी तो अब उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा की दो चावल मिलों ने भी कानूनों का समर्थन करते हुए कोर्ट से सरकार को तीनों कानून लागू करने का आदेश देने की मांग की है।उनका कहना   है कि ये कानून किसान, व्यापारी और आम जनता  के हित में हैं। इनसे कृषि उत्पाद काफी सस्ते दाम पर उपलब्ध होंगे।

राइस मिलों ने कोर्ट से यह भी अनुरोध किया है कि जब तक मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है तब तक मंडी समितियों को टैक्स वसूलने पर रोक लगाई  जाए।दरअसल , याचिकाकर्ता राइस मिलों ने जो धान कानून लागू रहने के दौरान खरीदा था उसे भी वे कहीं ले जा नहीं पा रहे, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट से कानूनों पर रोक लगने के बाद से मंडी समिति उसे नई खरीद मान कर टैक्स वसूल रही हैं।

कृषि कानूनों के समर्थन में यह याचिका फारचून राइस लिमिटेड, फारचून एग्रोमार्ट प्राइवेट लिमिटेड और फारचून राइस लिमिटेड और फारचून एग्रोमार्ट प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक अजय भलोथिया ने वकील डीके गर्ग केजरिए  दाखिल की है। याचिका में केंद्र के अलावा उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और कृषि उत्पादन मंडी परिषद उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश स्टेट एग्रीकल्चर मार्के¨टग बोर्ड को पक्षकार बनाया गया है। इस याचिका में कहा गया है कि याचिकाकर्ताओं की राइस मिलें ग्रेटर नोएडा में हैं और उनका ओपेन मार्केट ऑक्शन यार्ड बुलंदशहर में है।

याचिका में जीवन और रोजगार के मौलिक अधिकार की दुहाई देते हुए कोर्ट से सरकार को तीनों कृषि कानूनों को लागू करने का निर्देश देने की मांग की गई है। और कहा है कि नए कानूनों में उन्हें कुछ अधिकार दिए गए हैं। अगर वे कृषि मंडियों के बजाय कहीं और से कृषि उत्पाद खरीदते हैं तो उन्हें मंडियों को टैक्स या शुल्क नहीं देना होगा।

ऐसे में ये तीनों कानून किसान, व्यापारी तथा आम जनता सभी के लिए लाभकारी हैं, क्योंकि इससे सस्ती कीमत पर कृषि उत्पाद उपलब्ध होगा। अत: आम जनता के हित में यही होगा कि जब तक मामला कोर्ट में लंबित रहता है तब तक के लिए किसानों, व्यापारियों आदि को मंडी शुल्क अदा करने के लिए मजबूर न किया जाए, क्योंकि किसानों से सीधे खरीदने की मनाही है और उन लोगों के पास मंडियों से कृषि उत्पाद खरीदने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।

 मंडी समिति नयी खरीद मानकर रही वसूल शुल्क 

तीनों नए कृषि कानूनों पर कोर्ट ने 12 जनवरी को  अंतरिम रोक लगा दी थी। उसके बाद से राज्य मार्केट कमेटी व मंडी समिति उत्तर प्रदेश ने 1.50 फीसद और मध्य प्रदेश की मंडी समिति ने 0.7 फीसद की दर से उस खरीद पर भी मंडी शुल्क वसूलना शुरू कर दिया है जो कि कोर्ट के 12 जनवरी के रोक आदेश के पहले कानून लागू रहने के दौरान मंडी क्षेत्र से बाहर खरीदा गया था। जबकि याचिका कर्ताओं ने कहा है कि  पहले खरीदे जा चुके कृषि उत्पाद पर भी मंडी समिति नयी खरीद मानकर शुल्क वसूल रही हैं। अगर मंडी समितियों को शुल्क न दो तो वे व्यापारियों का धान और चावल जब्त कर लेती हैं। याचिका में कानूनी सवाल उठाते हुए कहा गया है कि जो कृषि उत्पाद कानून लागू रहने के दौरान और कोर्ट के रोक आदेश के पहले खरीदा गया है उस पर एपीएमसी एक्ट के मुताबिक, मंडी शुल्क कैसे वसूला जा सकता है।

किसान और व्यापारी को मंडी में उत्पाद बेचने और खरीदने के लिए मजबूर करने से मार्केट शुल्क व अन्य शुल्क के तौर पर 200 से 400रुपए  प्रति कुंतल अतिरिक्त खर्च आता है जिससे महंगाई बढ़ेगी। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि कानूनों में मंडी के बाहर से खरीदे गए अनाज पर मंडी शुल्क से छूट दी गई है। ऐसे में किसान और व्यापारी दोनों ही मंडी शुल्क अदा करने के इच्छुक नहीं हैं।

You may also like

MERA DDDD DDD DD