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जागरूकता के बावजूद घरेलू हिंसा पर चुप्पी!

भारत के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है कि पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की आबादी ज्यादा हो गई है। नेशनल फैमिली एंड हेल्थ सर्वे के अनुसार देश में अब 1,000 पुरुषों की तुलना में महिलाओं की आबादी 1,020 हो गई है। 90 के दशक में नोबेल प्राइज विजेता अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन के एक लेख में महिलाओं की कम आबादी को लेकर ‘मिसिंग वूमन’ की आरोप झेलने वाले देश के लिए ये आंकड़े किसी खुशखबरी से कम नहीं हैं। वहीं प्रजनन दर का 2.0 पर पहुंचना यह बताता है कि भारत में महिला सशक्तिकरण के कार्यक्रमों का असर हो रहा है। आंकड़े बताते हैं कि समय के साथ भारत में महिलाएं जागरुक हो रही हैं। लेकिन नेशनल फैमिली एंड हेल्थ सर्वे के ये आंकड़े महिलाओं की जागरुकता पर सवाल की स्थिति पैदा कर रहे हैं। क्योंकि इसी सर्वे के अनुसार महिलाएं और पुरुष कुछ कारणों से घरेलू हिंसा को सही बता रहे हैं।

दरअसल, नेशनल फैमिली एंड हेल्थ सर्वे में घरेलू हिंसा के बारे में महिलाओं से एक सवाल पूछा गया था कि पति का पत्नी को पीटना कितना उचित है? सवाल के जवाब देने के लिए नेशनल फैमिली एंड हेल्थ सर्वे ने स्थितियां रखी थी। इनमें पहला पति को बगैर बताए घर से बाहर जाना, घर या बच्चों को नजरअंदाज करने, पति के साथ बहस करने, पति के साथ शारीरिक संबंध बनाने से इंकार करने, खाना ठीक तरह से न बनाने, पति को पत्नी के चाल-चलन पर शक होने, ससुराल वालों का आदर न करने जैसे ऑप्सन रखे गए थे। नेशनल फैमिली एंड हेल्थ सर्वे में 18 राज्यों और जम्मू और कश्मीर के महिलाओं और पुरुषों से इसका जवाब मांगा गया था। जवाब चौंकाने वाले सामने आए हैं। सर्वे में शामिल राज्यों में घरेलू हिंसा को सही मानने वालों का आंकड़ा 80 फीसदी से ज्यादा है। तेलंगाना में सबसे ज्यादा 83.8 फीसदी और आंध्र प्रदेश 83.6 फीसदी महिलाओं का मानना है कि घरेलू हिंसा जायज है। आसान शब्दों में समझा जाए तो घरेलू हिंसा पर महिलाएं खुद ही राजी हैं। वही इसी सर्वे के अनुसार, महिलाओं में शिक्षा का स्तर घर के निर्णयों में उनके अधिकार, भविष्य की सुरक्षा जैसे मामलों पर उनकी जागरुकता लगातार बढ़ रही है।

नेशनल फैमिली एंड हेल्थ सर्वे के 11 राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों के आंकड़ों के अनुसार घरेलू हिंसा के मामले में तमिलनाडु (38.1 फीसदी) अव्वल नंबर पर है। उत्तर प्रदेश (34.8 फीसदी) दूसरे नंबर पर है। इसके बाद झारखंड (31.5 फीसदी), ओडिशा (30.6 फीसदी), पुडुचेरी (30.5 फीसदी) मध्य प्रदेश (28.1 फीसदी), अरुणाचल प्रदेश (24.8 फीसदी), राजस्थान (24.3 फीसदी), दिल्ली (22.6 फीसदी), छत्तीसगढ़ (20.2 फीसदी), हरियाणा (18.2 फीसदी), उत्तराखण्ड (15.1 फीसदी), पंजाब (11.6 फीसदी) और चंडीगढ़ (9.7 फीसदी) में है। सर्वे के अनुसार घरेलू हिंसा को सही मानने के सबसे आम कारणों में एक ससुराल वालों का अनादर और घर और बच्चों की अनदेखी करना है। महिलाओं और पुरुषों ने घर से बिना बताए जाने, चाल-चलन पर शक होने जैसे कारणों को घरेलू हिंसा के लिए अनुचित माना है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि जब सभ्य समाज में किसी भी तरह की हिंसा का स्थान नहीं है तो घरेलू हिंसा को महिलाएं सही क्यों मान रही हैं?

सर्वे में यह बात भी सामने आई है कि सरकार सिर्फ कानून बनाने तक ही सीमित है। सरकार के महिला सशक्तिकरण के प्रयासों से महिलाएं अपने अधिकारों को लेकर जागरुक हो रही हैं। लेकिन घरेलू हिंसा पर महिलाओं का मौन चौंकने वाला है। आखिर महिलाएं अपनी सोच के इस दायरे को क्यों नहीं तोड़ पा रही हैं कि घरेलू हिंसा हर प्रकार से गलत है। कर्नाटक में 76.9 फीसदी, मणिपुर में 65.9 फीसदी और केरल में 52.4 फीसदी लोग घरेलू हिंसा से सहमत नजर आते हैं। महिला सशक्तिकरण को लेकर चलाए जा रहे अभियानों पर ये आंकड़े एक दाग हैं। महिलाओं के लिए सरकारें केवल कानून बनाने तक ही सीमित नजर आती है। उनके कड़ाई से पालन को लेकर गंभीरता दिखती ही नहीं है, उसमें भी वैवाहिक बलात्कार यानी मैरिटल रेप के मामलों पर सरकारें और अदालतें भी चुप्पी साध लेते हैं। वैवाहिक बलात्कार को अपराध घोषित करने की मांग करने वाले बिल पर देश की संसद में ही सहमति नहीं बन पाती है। एक संसदीय स्थायी समिति कहती है कि यदि वैवाहिक बलात्कार को अपराध बनाया गया तो परिवार व्यवस्था तनाव में आ जाएगी और इससे व्यावहारिक कठिनाइयां पैदा हो सकती हैं।

गौरतलब है कि अगर महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा को खत्म करना है तो सरकारों को केवल विज्ञापन तक सीमित नहीं रहना चाहिए बल्कि समाज के सबसे छोटे स्तर पर भी लोगों के बीच जागरुकता अभियानों को चलाना चाहिए। महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए उनके आर्थिक सशक्तीकरण पर ध्यान देना चाहिए। ये प्रयास केवल शहरों तक ही सीमित नहीं होने चाहिए। घरेलू हिंसा के खिलाफ महिलाओं और पुरुषों में व्यापक समझ विकसित करने के लिए इस देश के कोने-कोने में बसे गांवों की महिलाओं को भी आत्मनिर्भर बनाना जरूरी है। तभी महिलाओं की सोच में ये परिवर्तन आएगा कि जिस घरेलू हिंसा को वो जायज मान रही हैं वो किसी भी मायने में जरूरी नहीं है। महिलाओं के आत्मनिर्भर होने से उनके आत्मविश्वास में बढ़ोत्तरी होगी और वो घरेलू हिंसा पर खुलकर अपनी बात रख पाएंगी।

समाज में सभी को कुछ न कुछ काम मिले हुए हैं। महिलाओं को लगता है कि मेरे लिए ये पर्टिकुलर काम है, घर की देख-भला करना,बच्चों की देखभाल करना, किसी से अफेयर नहीं रखना है, बाहर नहीं निकलना है, सोशल लाइफ नहीं रखना है, इत्यादि। अगर इनमें से कोई भी एक मानक पर महिलाएं खड़ी नहीं उतरी तो मर्द का उसे मारना जायज माना जाता है। ऐसा स्वयं महिलाएं मानकर चलती हैं। लेकिन ऐसा नहीं है। इन सबको ठीक करना इतना आसान नहीं है। हमारी शिक्षा व्यवस्था ग्रामीण इलाके में बहुत ही खराब है। स्कूली शिक्षा सही तरीके से बच्चों को मिल ही नहीं पाती है। ग्रामीण इलाके की महिलाओं के पास कोई रोल मॉडल नहीं है।
शिवानी प्रिया, छात्रा

अद्यतन सर्वेक्षण के अनुसार पहली बार महिलाओं की संख्या का अनुपात पुरुषों के सापेक्ष बढ़ गया है और यह भ्रूण हत्या में आई निर्णायक कमी का द्योतक भी है। शिक्षा के सकारात्मक प्रभाव के कारण सामाजिक चेतना का सम्यक् विकास हुआ है, जिसके कारण नारी-उत्पीड़न में काफी कमी आई है लेकिन कुछ अवांछनीय तत्वों का दुस्साहस बढ़ा है और गैंगरेप जैसी टर्मिनोलॉजी से आचरण की भाषा विचलित हुई है। सीता को महीनों अशोक वाटिका में सुरक्षित रखने वाले रावण ने इस कुत्सित स्वैराचार की कल्पना भी न की होगी। किन्तु शहरी जीवन में घरेलू हिंसा क्षीण हुई है। हां, गांवों में अभी इसके अवशेष प्रभूत मात्रा में उपलब्ध हैं। सूक्ष्म रूप में घरेलू हिंसा की उपस्थिति सार्वभौमिक है और यह श्रेष्ठता-बोध की देन है। पुरुष की यह अधिकार-चेतना अब नारी में भी शिफ्ट हो रही है। इसलिए परिवार में एक लोकतांत्रिक परिवेश निर्मित होता जा रहा है और पति- पत्नी में समन्वय और सहकार उत्तरोत्तर बढ़ता जा रहा है।
अजित कुमार राय, वरिष्ठ पत्रकार

बहुत सारी महिलाएं घेरलू हिंसा पर चुप इसलिए रह जाती हैं क्योंकि उन्हें परिवार संभालना है, बहुत सी चुप रहती हैं क्योंकि उन्हें पता होता है समाज का नजरिया क्या होगा। छोटा सा उदाहरण कि अगर कोई तलाकशुदा औरत है तो तलाकशुदा औरत को जिस तरह से देखा जाएगा उस तरह से तलाकशुदा मर्द को नहीं। कई सारे जो तत्व हैं, सामाजिक तत्व हैं जो प्रभावित करते हैं इस मानसिकता को बने रहने के लिए। ये मानसिकता इसलिए बनी हुई हैं, इसलिए महिलाएं चुप्पी तोड़ नहीं पा रही हैं। बहुत सी महिलाएं है जो वोकल होती हैं और आवाज उठाती हैं तो आप देखिए, उनके लिए क्या सिचुएशन बनती है। हां, बशर्ते अगर वो किसी पावरफुल पॉजीशन पर हैं, जैसी वो बड़ी सेलेब्रिटी हैं, टीवी स्टार हैं तो वो अपने निर्णय ले पाती हैं। उसका क्रियान्वयन अपने जीवन में कर पाती है लेकिन निम्न वर्गीय औरतों के पास समझौते के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता क्योंकि सामाजिक सरंचना ऐसी है। लेकिन इस पर काम होना चाहिए।
शोभा अक्षर, वाणी प्रकाशन से सम्बद्ध

 

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