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अफस्पा को पूरी तरह हटाने की उठी मांग

  •  वृंदा यादव, प्रशिक्षु

अफस्पा कानून असम, मणिपुर, त्रिपुरा, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, नागालैंड, पंजाब, चंडीगढ़ और जम्मू-कश्मीर समेत कई हिस्सों में लागू किया गया था। हालांकि बाद में कई इलाकों से इसे हटा भी दिया गया। अमित शाह की घोषणा से पहले यह कानून जम्मू-कश्मीर, नागालैंड, मणिपुर की (राजधानी इम्फाल के 7 क्षेत्रों को छोड़कर), असम और अरुणाचल प्रदेश के कुछ हिस्सों में लागू था। त्रिपुरा, मिजोरम और मेघालय से इसे पहले ही हटा दिया गया है

दशकों पहले पूर्वोत्तर के राज्यों में लागू किए गए सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (अफस्पा) को केंद्र सरकार ने असम, नागालैंड और मणिपुर के कुछ जिलों से हटा लिया है। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने 31 मार्च को एक ट्वीट कर यह जानकारी दी है। यह अधिनियम सेना को पूर्वोत्तर राज्यों के अशांत इलाकों में विशेष अधिकार देता था, जिसे लेकर दशकों से कई बार विरोध और विवाद होता आया है। केंद्र सरकार के इस फैसले के बाद अब अन्य जिलों से भी अफस्पा को हटाने को लेकर आम नागरिकों सहित राजनीतिक पार्टियां इस कानून को पूर्ण रूप से खत्म करने की मांग उठाने लगे हैं।

नागा पीपुल्स फ्रंट के राज्य महासचिव होनरेखुई काशुंग का कहना है कि ‘हमारा आंदोलन पूरे पूर्वोत्तर से अफस्पा को वापस लेने के लिए है, न कि केवल विशिष्ट क्षेत्रों से।’ हालांकि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार पिछले कुछ समय से अफस्पा को हटाने के संकेत दे रही थी। उन्होंने मणिपुर के विधानसभा चुनावों के दौरान भी इसे हटाने की बात कही थी। इसे पूरी तरह तो नहीं हटाया गया है लेकिन इन तीन राज्यों में कई जिलों को इस अधिनियम की हद से बाहर कर दिया गया है। केंद्र सरकार का कहना है कि पूर्वोत्तर में सुरक्षा की दृष्टि से स्थिति बेहतर हो रही है। इन राज्यों को अलगववादी घटनाओं में कमी आने के बाद से विकास कार्यों में तेजी आई है। यही कारण है कि असम में 23 जिलों से पूर्ण रूप से और एक जिले से आंशिक रूप से सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम को हटाया गया है। साथ ही नागालैंड के 7 जिलों के 15 पुलिस थाना क्षेत्रों से इसे खत्म किया गया है। वहीं मणिपुर में 6 जिले राहत पाने वालों में हैं, जहां 15 पुलिस थाना इलाकों में इस एक्ट का प्रभाव हटाया गया है लेकिन अरुणाचल में अभी जहां लागू है, वहां लागू रहेगा।

केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने अपने ट्वीट में यह भी कहा कि अफस्पा के इलाकों का दायरा घटाने में सरकार के शांति लाने के लिए किए जा रहे प्रयास मददगार रहे हैं। इन इलाकों में उग्रवाद पर भी नियंत्रण बढ़ा है। कई समझौतों के कारण सुरक्षा के हालात और विकास ने भी कानून हटाने में मदद की है।

नागालैंड से उठी थी अफस्पा हटाने की मांग
पिछले साल दिसंबर में नागालैंड में सेना के हाथों 13 आम लोगों के मारे जाने और एक अन्य घटना में एक व्यक्ति के मारे जाने के बाद असम में सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम हटाने की मांग ने जोर पकड़ लिया था। यह एक्ट मणिपुर में (इंफाल नगर परिषद क्षेत्र को छोड़ कर), अरुणाचल प्रदेश के चांगलांग, लोंगदिंग और तिरप जिलों में, असम से लगने वाले उसके सीमावर्ती जिलों के आठ पुलिस थाना क्षेत्रों के अलावा नगालैंड और असम में लागू है। केंद्र सरकार ने जनवरी की शुरुआत में नागालैंड में इसे छह महीने के लिए बढ़ा दिया था। गृह मंत्रालय की वेबसाइट के मुताबिक पूर्वोत्तर में विद्रोह की घटनाएं घटकर 2021 में केवल 209 रह गईं, जबकि 1999 में इनकी संख्या 1749 थी। 2019 से 2022 तक 6900 से ज्यादा उग्रवादियों ने 4800 हथियारों के साथ सरेंडर किया है।

क्या है अफस्पा
अफस्पा एक ऐसा कानून है जो अंग्रेजी शासन के दौरान ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ को सैनिकों द्वारा कुचलने के लिए लागू किया गया था। आजाद भारत में इसे सबसे पहले 1958 में मणिपुर और असम में लागू किया गया, 1972 में मणिपुर, त्रिपुरा, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम और नागालैंड सहित समस्त पूर्वोत्तर भारत में लागू किया गया। 1987 में त्रिपुरा में, 1983 में पंजाब एवं चंडीगढ़ और 1990 में जम्मू-कश्मीर में लागू किया गया। इनमें से 2008 में पंजाब, 2012 में चंडीगढ़,2015 में त्रिपुरा और मेघालय से 2017 में इसे पूर्ण रूप से हटाया जा चुका है। यह कानून अशांत क्षेत्रों में लागू किया गया है। अशांत क्षेत्र से अभिप्राय उन क्षेत्रों से है जहां शांति बनाए रखने के लिए सैन्य बल की आवश्यकता होती है। इस कानून के द्वारा सेना को कुछ विशेष अधिकार (शक्तियां) दी गई हैं। अशांत क्षेत्र कौन-कौन से होंगे, ये भी केंद्र सरकार ही तय करती है।

अभी तक इन जगहों पर लागू है अफस्पा
अफस्पा कानून असम, मणिपुर, त्रिपुरा, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, नागालैंड, पंजाब, चंडीगढ़ और जम्मू-कश्मीर समेत कई हिस्सों में लागू किया गया था। हालांकि बाद में कई इलाकों से इसे हटा भी दिया गया। अमित शाह की घोषणा से पहले यह कानून जम्मू-कश्मीर, नागालैंड, मणिपुर की (राजधानी इम्फाल के 7 क्षेत्रों को छोड़कर), असम और अरुणाचल प्रदेश के कुछ हिस्सों में लागू था। त्रिपुरा, मिजोरम और मेघालय से इसे पहले ही हटा दिया गया है।

विरोध में हुई थी ये घटनाएं
अफस्पा के विरोध का जिक्र करें तो सबसे पहले मणिपुर की आयरन लेडी भी कही जाने वाली इरोम शर्मिला का जिक्र होता है। नवंबर 2000 में एक बस स्टैंड के पास दस लोगों को सैन्य बलों ने गोली मार दी थी। इस घटना के वक्त इरोम शर्मिला वहीं मौजूद थीं। इस घटना का विरोध करते हुए 29 वर्षीय इरोम ने भूख हड़ताल शुरू कर दी थी, जो 16 साल तक चली। अगस्त 2016 में भूख हड़ताल खत्म करने के बाद उन्होंने चुनाव भी लड़ा था, जिसमें उन्हें नोटा (नोटा) से भी कम वोट मिले।
इसके अलावा वर्ष 2004 की दरमियानी रात 32 साल की थंगजाम मनोरमा का कथित तौर पर सेना के जवानों ने रेप कर हत्या कर दी थी। मनोरमा का शव क्षत-विक्षत हालत में बरामद हुआ था। इस घटना के बाद 15 जुलाई 2004 को करीब 30 मणिपुरी महिलाओं ने 17वीं असम राइफल्स के इम्फाल स्थित मुख्यालय के सामने नग्न होकर प्रदर्शन किया था।

आम नागरिकों पर इसका प्रभाव
यह कानून देश की सुरक्षा और देश में शांति बनाए रखने के लिए बनाया गया है लेकिन इसका दुरुपयोग भी होता रहा है। मानवाधिकार संगठन भी इसका विरोध करता रहा है। सेना पर इस कानून का दुरुपयोग करने के आरोप लगते रहे हैं। मणिपुर में साल 2000 के नवंबर में असम राइफल्स के जवानों पर दस निर्दोष लोगों को मारने का आरोप लगा था। 2004 में असम में सेना पर बलात्कार और थांगजम मनोरमा नाम की एक महिला की हत्या का आरोप लगा है।

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