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‘आप’ के हवाले दिल्ली

दिल्ली की सत्तारूढ़ पार्टी ‘आप’ ने एमसीडी चुनाव में शानदार प्रदर्शन कर एक बड़ा संदेश दिया है। इस चुनाव में पार्टी ने न सिर्फ जीत हासिल की है, बल्कि देश की सबसे बड़ी पार्टी भाजपा को दिल्ली के एमसीडी से बेदखल कर यह साबित भी कर डाला है कि अगर शिद्दत से चुनाव लड़ा जाए तो भाजपा को हराया जा सकता है

अन्ना आंदोलन से जन्मी आम आदमी पार्टी का पहले दिल्ली फिर पंजाब के बाद अब दिल्ली के एमसीडी पर भी कब्जा हो गया है। एक तरह से अब पूरी दिल्ली पर आम आदमी पार्टी की डबल इंजन की सरकार स्थापित हो जाएगी। इस जीत के साथ ही पार्टी ने यह संदेश भी दिया है कि अगर आप शिद्दत से चुनाव लड़े तो बीजेपी को हरा सकते हैं, लेकिन उसके लिए संगठित होकर एजेंडे पर बात करनी होगी। जैसा दिल्ली के एमसीडी चुनाव में दिखा है।

दरअसल, आम आदमी पार्टी ने दिल्ली के एमसीडी चुनाव में भारी मतों से शानदार जीत के साथ एमसीडी में 15 सालों से चला आ रहा बीजेपी का राज समाप्त कर दिया है। ऐसे में राजनीतिक पंडित मानते हैं कि दो ही नेता जुमलों को भुनाने में सबसे ज्यादा सफल होते नजर आए हैं। एक तो गुजरात के मुख्यमंत्री बनने से लेकर देश के पीएम की कुर्सी पर आसीन नरेंद्र मोदी और दूसरे दिल्ली के रामलीला मैदान से शुरू हुए अन्ना हजारे के आंदोलन से राजनीतिक मैदान में पैर जमाने वाले अरविंद केजरीवाल। दोनों ही लगातार सफल होते जा रहे हैं। लेकिन राजनीति में अगर आपका विरोधी इसी आधार पर जनता का समर्थन पाने लगे तब देश की सत्ता में बैठी पार्टी के लिए यह खतरे की घंटी से कम नहीं है। इसका स्पष्ट उदाहरण दिल्ली एमसीडी चुनाव के नतीजे हैं।

भाजपा और कांग्रेस से नगर निगम की सीटें अपने पाले में करके आम आदमी पार्टी ने 134 सीटों के साथ एमसीडी में बीजेपी को करारी शिकस्त दी है। इस चुनाव में भाजपा को जहां 59 सीटों का नुकसान हुआ, वहीं कांग्रेस को भी 13 सीटें कम मिली। दोनों को क्रमशः 104 और नौ सीटों पर संतोष करना पड़ा। अब आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल दिल्ली की सरकार चलाएंगे और आम आदमी पार्टी का मेयर दिल्ली नगर निगम को चमकाएगा। ‘आप’ के दावे को देखें तो अब न भ्रष्टाचार होगा और न कूड़े का पहाड़ नजर आएगा।

एमसीडी चुनाव में जीत के बाद जश्न मनाते ‘आप’ कार्यकर्ता

एमसीडी के नतीजों ने मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया, मंत्री गोपाल राय के हौसले बुलंद जरूर किए हैं। लेकिन सिसोदिया के पटपड़गंज विधानसभा में कुल चार नगर निगम की सीटें आती हैं। इनमें तीन पर उनकी पार्टी हार गई है। इस क्षेत्र में आम आदमी पार्टी को केवल एक सीट मिली है। तीन पर भाजपा के प्रत्याशी जीते हैं। भाजपा के नेता रवि नेगी, यशपाल कैंतुरा चुनाव जीत गए हैं। फिर भी एमसीडी में जीत से लबरेज मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की ओर से दिल्ली में डबल इंजन की सरकार चलाने के लिए भाजपा, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी को वोट न देने वाले मतदाताओं से भी सहयोग की मांग की गई है।

आधुनिक युग के अभिमन्यु साबित हुए केजरीवाल
एमसीडी चुनाव प्रचार के दौरान दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल ने एक टीवी समाचार चैनल से कहा था कि भाजपा ने चक्रव्यूह तैयार किया है, लेकिन वे आधुनिक जमाने के अभिमन्यु हैं। उन्हें भाजपा के चक्रव्यूह से बाहर निकलना बेहतर तरीके से आता है। वह इस चक्रव्यूह से निकल आएंगे।

कहां रही चौंकाने वाली स्थिति
दिल्ली एमसीडी के वार्ड नंबर 203 लक्ष्मी नगर में चौंकाने वाली स्थिति रही। यहां दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया रहते हैं। यहां आम आदमी पार्टी को हार का सामना करना पड़ा। भाजपा की अलका राघव ने ‘आप’ की मीनाक्षी शर्मा को यहां हरा दिया।
वार्ड नंबर 189 जाकिर नगर में यह दिल्ली वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष और ‘आप’ विधायक अमानतुल्लाह खान रहते हैं। यहां न आप को जीत मिली, न भाजपा जीत सकी। कांग्रेस की नाजिया दानिश ने दोनों पार्टियों के उम्मीदवारों को यहां हरा दिया। वार्ड नंबर 74 चांदनी चौक इलाके में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का घर है। इस वार्ड से सुबह आए रुझानों में आम आदमी पार्टी पिछड़ रही थी। यहां चौंकाने वाले नतीजे आ सकते थे। हालांकि आखिर में ‘आप’ के पुनर्दीप सिंह जीत गए।
वार्ड 58 सरस्वती विहार, वार्ड 59 पश्चिम विहार और वार्ड 60 रानी बाग। ये तीनों वार्ड मंत्री सत्येंद्र जैन की विधानसभा में आते हैं। तीनों वार्ड में भाजपा को जीत मिली है।

‘नोटा’ ने तोड़े रिकॉर्ड
राजधानी दिल्ली के नगर निगम (एमसीडी) चुनाव के नतीजों में 57,000 से अधिक वोट ‘उपरोक्त में से कोई नहीं’ (नोटा) को पड़े हैं। राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा साझा किए आंकड़ों के अनुसार चार दिसंबर को हुए चुनाव में कुल मतों में से 57,545 (0.78 प्रतिशत) वोट नोटा को डाले गए हैं। इस वर्ष दिल्ली नगर निगम के चुनावों में ‘नोटा’ वोटों में वृद्धि दर्ज की गई, जो 2017 के नगर निगम चुनाव में दर्ज किए गए वोटों की तुलना में आठ हजार से अधिक थी। यह आंकड़ा 2017 में देखे गए 49,235 नोटा वोटों की तुलना में ठीक 8,310 वोट अधिक हैं।

किसे फायदा किसे नुकसान
स्पष्ट तौर पर इस चुनाव में आम आदमी पार्टी को फायदा और भाजपा को नुकसान हुआ है। भाजपा यहां साल 2007 से लगातार जीत हासिल कर रही थी। यानी 15 साल से एमसीडी पर बीजेपी काबिज थी। साल 2002 में यहां कांग्रेस जीती थी, लेकिन उससे पहले 1997 में भी यहां भाजपा को जीत चखने को मिली थी। इस चुनाव में दिल्ली के मतदाताओं ने भाजपा को बहुमत हासिल करने से रोक दिया।
आम आदमी पार्टी के लिए यह अच्छी खबर इसलिए है क्योंकि अब तक वह सिर्फ विधानसभा में मजबूत थी। तीन बार से एमसीडी और दो बार से लोकसभा चुनाव में भाजपा ही मजबूत नजर आती थी। अब 15 साल बाद एमसीडी भाजपा के हाथ से फिसल गया है।

अब आगे क्या
दिल्ली नगर निगम के चुनाव नतीजों ने बीजेपी नेतृत्व को मंथन करने के लिए एक बड़ा सबक यह दिया है कि केंद्र से लेकर देश के कई राज्यों में अपना डंका बजाने वाली पार्टी से दिल्ली में आखिर कहां, कैसे और क्यों ऐसी चूक हो रही है कि लगातार उसका अस्तिस्व कम होता जा रहा है। दिल्ली के अधिकांश लोग इसे मानते हैं कि दिल्ली से निकला कोई भी सियासी संदेश देश के बहुत बड़े हिस्से पर असर डालता है।
इसलिए यह एक बड़ा सवाल भी है कि बीजेपी के लिए दिल्ली विधानसभा की सत्ता में आने का रास्ता क्या अब इतना मुश्किल बन चुका है कि उसे पार कर पाना लगभग नामुमकिन प्रतीत हो रहा है? अभी तक तो बीजेपी के पास अपने विरोधियों को जवाब देने के लिए यह जवाब मौजूद था कि देश की राजधानी के होने के नाते सबसे बड़े नगर निगम में उसकी सत्ता काबिज है। लेकिन 15 साल तक उसका स्वाद चखने वाली पार्टी को अवसर मिलते ही बेदखल करने में दिल्ली वालों ने क्षण भर की देर न की।

पार्टी के जमीनी और दिग्गज नेता मदनलाल खुराना के नेतृत्व में 1993 में अपने दम पर दिल्ली में सरकार बनाने वाली बीजेपी पिछले 24 साल से सत्ता पाने का वनवास झेल रही है। लेकिन पार्टी का रिमोट कंट्रोल रखने वाले संघ से लेकर बीजेपी नेतृत्व तक ने कभी इस बात पर गहराई से गौर नहीं किया कि दिल्ली में पहले 15 साल राज करने वाली शीला दीक्षित का मुकाबला करने के लिए उनके पास इतना मजबूत नेता क्यों मौजूद नहीं है।

उसके बाद साल 2013 में दिल्ली के राजनीतिक मानचित्र पर उभरे अरविंद केजरीवाल को टक्कर देने के लिए भाजपा में प्रभावशाली नेताओं का ऐसा अकाल पड़ा कि उसे एक के बाद एक कई प्रदेश अध्यक्षों को बदलने पड़ें। लेकिन कोई फायदा होता नजर नहीं आया। इसलिए बीजेपी को सोचना होगा कि पिछले आठ सालों से देश के दो तिहाई राज्यों में अपना असर दिखा रहा ‘मोदी मैजिक’ दिल्ली में क्यों गायब हो गया?

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