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सवालो के घेरे में उत्तर प्रदेश विजिलेंस कमीशन के अध्यक्ष दीपक सिंघल

1982 बैच के आईएएस अधिकारी दीपक सिंघल का आरोपों के साथ चोली-दामन का साथ रहा है। शायद ही कोई ऐसी जगह होगी जहां पर पोस्टिंग के दौरान विवाद उनके साथ-साथ न चला हो। पूर्ववर्ती मायावती सरकार के कार्यकाल में तो श्री सिंघल की तूती बोलती ही थी साथ ही पूर्ववर्ती अखिलेश सरकार के कार्यकाल में भी दीपक सिंघल को काफी अहमियत दी जाती रही है और वह भी यह जानते हुए कि श्री सिंघल पर दर्जनों घोटालों-घपलों के आरोप हैं। सूबे में मुख्य सचिव का पद संभाल चुके दीपक सिंघल वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश विजिलेंस कमीशन एण्ड एडमिनिस्टेटिव ट्रिब्यूनल में अध्यक्ष के पद पर हैं।
वरिष्ठ आईएएस अधिकारी दीपक सिंघल पर आरोप है कि पूर्ववर्ती मायावती सरकार के कार्यकाल में हुए कनिष्ठ लिपिक भर्ती में उन्होंने नियमों को दरकिनार करते हुए गलत ढंग से नियुक्तियां कर डालीं। चूंकि श्री सिंघल उस वक्त सिंचाई विभाग में प्रमुख सचिव के पद पर थे लिहाजा उन्हें जिम्मेदारी से किनारे नहीं किया जा सकता। हालांकि विभागीय कर्मचारियांे का दावा है कि श्री सिंघल के इशारे पर ही रिश्वत के रूप में मोटी रकम लेकर ऐसे युवकों को कनिष्ठ लिपिक के पदों पर नियुक्ति दे दी गयी थी जिनमें से अधिकतर ऐसे थे जो अर्हता ही नहीं रखते थे। हालांकि रिश्वत लेकर अनियमित नियुक्ति से सम्बन्धित यह मामला उस वक्त भी उठा था जब (वर्ष 2008-09) नियुक्तियों की गयी थीं लेकिन मायावती सरकार के कार्यकाल में चहेते और विश्वासपात्र अफसरों में गिने जाने वाले श्री सिंघल से सम्बन्धित इस मामले को दफन कर दिया गया था।
सूबे की सत्ता पर जब अखिलेश यादव ने कदम रखा तो पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के इस चहेते अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की उम्मीद जगी लेकिन जैसे ही श्री सिंघल को सूबे के सर्वोच्च पद पर बिठाया गया, श्री सिंघल का विरोध करने वाले विभागीय कर्मचारी भयवश चुप्पी साधकर बैठ गए क्योंकि उन्हें इस बात का आभास हो चुका था कि यदि अब दीपक सिंघल के खिलाफ आवाज उठायी गयी तो निश्चित तौर पर सरकार के निशाने पर वे आ जायेंगे लिहाजा पानी में रहकर मगरमच्छ से कोई बैर नहीं लेना चाहता था।
वर्ष 2017 में एक बार फिर से सूबे की सत्ता बदली और कमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के हाथ में आयी तो विभागीय कर्मचारियों का वह धड़ा एक बार फिर से सक्रिय हो गया जो पूर्ववर्ती सरकार के कार्यकाल में भयवश चुप्पी साधे बैठा था। इस बार कर्मचारियों की कोशिशें रंग लायीं और सरकार की पैरवी पर कोर्ट में मामले को नयी दिशा मिली।
परिणामस्वरूप विगत दिनों सीजेएम आनन्द प्रकाश सिंह ने इन्दु बनाम दीपक सिंधल केस की सुनवाई करते हुए सिंचाई एवं जल संसाधन विभाग के तत्कालीन प्रमुख सचिव दीपक सिंघल, प्रमुख अभियंता (परिकल्प एवं नियोजन) अवध नरेश गुप्ता और तत्कालीन प्रमुख अभियंता (शारदा, गंगा सिंचाई) मुकेश कुमार शर्मा सहित नौ अन्य कर्मचारियों को कोर्ट में तलब किया है। एक बार फिर बताते चलें कि वर्ष 2008-2009 के दौरान कनिष्ठ लिपिकों की भर्ती में हुए कथित घोटाले को लेकर इन अधिकारियों को कोर्ट में 16 मार्च 2019 को तलब किया गया है। इन सभी पर आईपीसी की धारा 419 और 420 के तहत केस चलाया जायेगा। ज्ञात हो यह परिवाद इन्दु यादव नाम की एक महिला द्वारा दायर किया गया था। इन्दु यादव का दावा है कि वर्ष 2008-09 में सिंचाई विभाग में 282 कनिष्ठ लिपिकों के चयन में बडे़ पैमाने पर भ्रष्टाचार और अनियमितता को अंजाम दिया गया था। भर्ती प्रक्रिया के दौरान भर्ती के लिए गठित की गयी चयन समिति के सदस्यों ने नियम-कानून को ताक पर रखकर कम अर्हता वाले और अनुत्तीर्ण अभ्यर्थियों का चयन कर लिया था।
कहा जाता है कि चूंकि उस दौरान सूबे में मायावती की सरकार थी और दीपक सिंघल पाॅवरफुल अधिकारी लिहाजा इस मामले की शिकायत अखिलेश सरकार के कार्यकाल (18 अप्रैल 2012) में मुख्यमंत्री से की थी। शिकायत के आधार पर विभागीय जांच भी करायी गयी थी और जांच में घोर अनियमितताएं प्रकाश में आयी थीं। जांच समिति ने पूरी भर्ती प्रक्रिया को ही दोषपूर्ण घोषित किया था। यह जांच रिपोर्ट ही दोषी अधिकारियों को सजा देने के लिए काफी थी लेकिन अखिलेश सरकार के कार्यकाल में जब दीपक सिंघल को मुख्य सचिव के पद पर बिठाया गया तो जांच समिति से जुडे़ अधिकारी से लेकर उन अधिकारियों के भी हाथ बंध गए जिन्हें दोषी अधिकारियों को दण्डित करने के लिए संस्तुति किए जाने का अधिकार प्राप्त था। स्पष्ट है कि शीर्ष स्तर पर भ्रष्टाचार से सम्बन्धित इस मामले में कार्रवाई करने की हिम्मत कोई नहीं कर सका, या यूं कह लीजिए कि सरकार अपने कमाऊ पूत को येन-केन-प्रकारेण पाल रही थी तो शायद गलत नहीं होगा।
अब मौजूदा भाजपा सरकार के कार्यकाल में इस मामले ने एक बार फिर से जोर पकड़ा है। कोर्ट भी सख्त नजर आ रही है तो दूसरी ओर परिवाद दायर करने वाली इन्दु यादव भी कमर कसकर तैयार बैठी हैं। इन्दु यादव का दावा है कि उपरोक्त समस्त आरोपियों ने मिलकर अपराध कारित किया है लिहाजा इन्हें आईपीसी की सम्बन्धित धाराओं के आधार पर सजा सुनायी जाए। सीजेएम आनन्द प्रकाश सिंह के सख्त लहजे का अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने इस मामले में और डेट देने के बजाए परिवादी इन्दु यादव को आदेश दिया है कि वे एक सप्ताह में गवाहों की सूची प्रस्तुत करें ताकि कार्रवाई को आगे बढ़ाया जा सके।
फिलहाल सीजेएम कोर्ट में यह मामला अब जोर पकड़ चुका है। कहा जा रहा है कि यदि इन्दु यादव ने समय के भीतर गवाहों को कोर्ट में पेश कर दिया तो निश्चित तौर पर यूपी कैडर का एक और आईएएस अधिकारी भ्रष्टाचार के मामले में जेल की सजा काटता नजर आयेगा।

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