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आजादी के दशकों बाद भी स्वास्थ्य सेवाएं इतनी खराब हैं कि अस्पतालों में बच्चे काल-कवलित हो रहे हैं। मामूली बीमारियों का इलाज तक उपलब्ध नहीं हैं। जिम्मेदार लोगों ने स्वास्थ्य सेवाओं की बेहतरी के लिए न तो कभी जज्बा दिखाया और न ही संवेदनशीलता
आजादी के बाद देश ने बेशक ज्ञान-विज्ञान,  शिक्षा, चिकित्सा, संचार, रक्षा आदि तमाम क्षेत्रों में तरक्की कर ली है। अंतरक्षित में भी भारतीय वैज्ञानिकों का अच्छा दखल है, लेकिन विकास के सारे मायने तब निरर्थक लगते हैं जब इलाज को मोहताज देश के मासूम नौनिहाल असमय काल- कवलित हो जाएं। माना कि एक्यूट इंसेफलाइटिस सिंड्रोम जिसे कि चमकी बुखार कहा जा रहा है, पर काबू पाने में देश आज भी सक्षम नहीं है। लेकिन तस्वीर का दूसरा भयावह पहलू यह भी है कि अस्पतालों में भर्ती बच्चों के इलाज के लिए न तो पर्याप्त डॉक्टर, स्टाफ और दवाइयां है और न ही व्यवस्था में बैठे लोगों के भीतर उन्हें बचा पाने का जज्बा ही दिखाई दिया। पूरा का पूरा तंत्र एकदम लचर दिखाई दिया। समूची दुनिया देख रही है कि आजादी के वर्षों बाद भी भारत में स्वास्थ्य सेवाएं कितनी बदहाल हैं।
हालांकि आजादी के बाद स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए हर सरकार बड़े-बड़े दावे करती रही है। तमाम योजनाएं भी चिकित्सा क्षेत्र में बनी हैं, लेकिन बिहार में जहां एक ओर दिमागी बुखार से बच्चे काल-कवलित हो गए, वहीं ‘लू’ लगने जैसी मामूली तकलीफ से भी बड़ी संख्या में लोगों के मारे जाने की खबर है। कितना हास्यास्पद है कि लू लगने से लोग जान गंवा रहे हैं। बिहार के मुजफ्फरपुर और इसके आस-पास के इलाकों में एक्यूट इंसेफलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) और जापानी इंसेफलाइटिस (जेई) से पिछले एक हफ्ते में तकरीबन 130 से ज्यादा बच्चों की मौत हो चुकी है। सवाल यह है कि जब यह बीमारी हर साल इसी मौसम में बच्चों को अपनी चपेट में लेती आई है तो फिर सत्ता और शासन में जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग संवेदनशील क्यों नहीं हो पाते हैं? जिम्मेदार लोगों की उदासीनता या संवेदनहीनता ही कही जाएगी कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ हर्षवर्धन जब अस्पताल का दौरा कर बाहर निकल रहे थे तो जनता द्वारा उन्हें काले झंडे दिखाए गए। इसी तरह राज्य के मुखिया नीतीश कुमार की नींद देर से खुली। वे अस्पताल में जाकर मरीजों की सुध लेने पहुंचे तो उनका जमकर विरोध किया गया। अस्पताल के बाहर खड़े लोगों ने ‘नीतीश गो बैक’ के नारे भी लगाए। सरकार एक्शन का दावा कर रही है तो वहीं अभी भी अस्पतालों में भर्ती बीमार बच्चों की संख्या बढ़कर 414 हो गई है।
स्वास्थ्य के प्रति राज्य सरकार की लापरवाही का आलम यह है कि केंद्र सरकार के निर्देश के बावजूद बीते पांच वर्षों में एसकेएमसीएच में सौ बेड का विशेष एईएस वार्ड नहीं बन सका है। इस वार्ड के निर्माण के लिए सरकार ने राशि भी उपलब्ध करा दी है। फिलहाल, ईएनटी वार्ड के ऊपरी मंजिल पर सौ बेड का पीआईसीयू वार्ड बनाना था। इस विशेष वार्ड के नहीं बनने से चार जगहों पर चमकी बुखार से पीड़ित बच्चों को रखकर उनका इलाज किया जा रहा है। उल्लेखनीय है कि तीन वर्ष पहले भी जब मुजफ्फरपुर में दिमागी बुखार से बच्चे मर रहे थे तब मामले की जांच करने मुंबई के मशहूर डॉक्टर जैकब गए। उन्होंने भी इस थ्योरी पर जांच करने की कोशिश की, लेकिन वो सफल नहीं हो पाए। डॉक्टरों के मुताबिक चमकी बुखार से पीड़ित बच्चों में शुगर की कमी देखी जाती है। इसीलिए इस बात का भी खास ध्यान रखना चाहिए। बच्चों को थोड़-थोड़ी देर में लिक्विड फूड भी देते रहें, ताकि उनके शरीर में पानी की कमी न हो। डॉक्टर इस बीमारी का कारगर इलाज नहीं ढूंढ पाए हैं। चूंकि इस बीमारी में मृत्युदर सबसे ज्यादा 35 प्रतिशत है। इसीलिए डॉक्टर्स सावधानी को ही दूसरा इलाज बनाते हैं। स्वास्थ्य सेवाओं के प्रति यह लापरवाही ही है कि बीमारियों की वजह ही डॉक्टरों की पकड़ में नहीं है।
सवाल सिर्फ बिहार का नहीं है, बल्कि देश के अन्य भागों में भी स्वास्थ्य सेवाएं बदहाल हैं। दो साल पहले उत्तर प्रदेश के गोरखपुर स्थित बीआरडी अस्पताल में ऑक्सीजन सिलेंडर की कमी के कारण लगभग 60 से अधिक बच्चों की मौत हो गई थी। इस घटना के बाद उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार द्वारा निलंबित कर दिए गए डॉ कफील खान ने इस मामले की जांच सीबीआई से कराए जाने की मांग की थी। इस त्रासदी के लिए जिम्मेदार लोग खुले घूम रहे हैं। विभागीय जांच पिछले 18 महीनों से चल रही है, जबकि इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मार्च 2018 में आदेश दिया था कि इसे तीन महीने के भीतर पूरा किया जाए।
भारत में स्वास्थ्य सेवाएं कितनी खराब हैं इस संबंध में ब्रिटिश मेडिकल जर्नल की हिलया रिपोर्ट काफी कुछ उजागर कर देती है। रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 54 फीसदी हेल्थ प्रोफेशनल यानी डॉक्टर, नर्स, चिकित्सा-सहायक और दाइयों के पास योग्यता भी नहीं है। 20 फीसदी काबिल डॉक्टर सेवा में ही नहीं हैं। 58 फीसदी डॉक्टर पुरुष हैं, यानी महिलाओं की इस क्षेत्र में भागीदारी का अनुपात बेहद कम है। इतना ही नहीं एक सर्वे के मुताबिक 80 फीसदी भारतीय डॉक्टर और 70 फीसदी नर्स-दाइयां प्राइवेट अस्पतालों के लिए काम करना चुनती हैं। उन्हें लगता है कि प्राइवेट अस्पताल उन्हें ज्यादा अनुकूल माहौल दे सकते हैं।
वर्ष 2016 के नेशनल सैम्ेपल सर्वे में भी भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था के खोखले होने की बात कही गई थी। इस सर्वे के मुताबिक लगभग एक चौथाई एलोपैथिक चिकित्सक के पास जरूरतभर योग्यता नहीं है। इसके साथ ही दो तिहाई डॉक्टर और नर्स शहरों में काम कर रहे हैं। वहीं ग्रामीण इलाकों में महज 29 फीसदी लोग काम कर रहे हैं। कई गांवों में हेल्थ प्रोफेशनल के मामले में भारत कई अफ्रीकी देशों से पीछे है। स्वास्थ्य सेवा पर भारत का कम खर्च सालों से जानकारों के लिए एक चिंता का विषय है। दुनिया की छठवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के बावजूद भारत अपनी जीडीपी का महज 1.5 फीसदी ही स्वास्थ्य सेवा पर खर्च करता है, जो दुनिया के सबसे कम खर्च करने वाले देशों में से एक है।
भारत में स्वास्थ्य की स्थिति ऐसे समझी जा सकती है कि औसतन एक डॉक्टर पर करीब 11 हजार की जनसंख्या आश्रित है, तय मानकों से 10 गुना अधिक है। इतनी खराब स्थिति के बावजूद चरमराती स्वास्थ्य व्यवस्था का मुद्दा सरकारों के एजेंडे में शीर्ष पर नहीं है। हाल ही में हुए लोकसभा चुनावों में भी इस मुद्दे पर बहुत चर्चा नहीं हुई थी।

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