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डीएनए पर कोर्ट का फैसला, टेस्ट कराने को नहीं कर सकते मजबूर 

 18 नवंबर 2020 :  इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा है कि डीएनए टेस्ट सबसे वैध और वैज्ञानिक रूप से परिपूर्ण साधन है जिसका उपयोग पति अपनी बेवफाई के दावे को स्थापित करने के लिए कर सकता है। न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल की खंडपीठ ने इसपर  कहा कि इसी तरह इसे पत्नी के लिए भी सबसे प्रामाणिक, सही और सटीक साधनों के रूप में माना जाना चाहिए ताकि वह प्रतिवादी-पति द्वारा किए गए दावे का विरोध कर सके और यह स्थापित करने के लिए कि वह बेईमान, व्यभिचारी या बेवफा नहीं है।

9 नवंबर 2021 :  इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने कहा कि बलात्कार पीड़िता को उसके पितृत्व का पता लगाया जा सके इसके लिए अपने बच्चे का डीएनए टेस्ट कराने की अनुमति देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है। इसके साथ ही पीठ ने पॉस्को कोर्ट के उस आदेश को भी खारिज कर दिया जिसमें दुष्कर्म मामले के नाबालिग आरोपी की याचिका पर बच्ची का डीएनए टेस्ट कराने का निर्देश दिया गया था। जस्टिस संगीता चंद्रा की खंडपीठ ने पीड़िता की मां की पुनर्विचार याचिका को स्वीकार करते हुए यह फैसला सुनाया। यही नहीं बल्कि उन्होंने अपने आदेश में कहा कि यह स्पष्ट है कि पॉक्सो जज ने अपनी शक्ति को गलत तरीके से निर्देशित किया।  हाईकोर्ट ने कहा कि पॉक्सो जज के सामने सवाल यह निर्धारित करने के लिए था कि क्या आरोपी ने पीड़िता से बलात्कार किया है ?  यह निर्धारित करने के लिए नहीं था कि घटना के बाद पीड़िता से जन्मे बच्चे का पिता कौन है?

हाईकोर्ट इलाहाबाद की खंडपीठ ने डीएनए के मामले में दो अलग अलग फैसले सुनाए है। जिसमे एक मामले में न्यायालय डीएनए को जरुरी तो दूसरे में गैरजरूरी बता रहा है। ताजा मामला उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर का है। 17 दिसंबर 2017 को थाने में एक महिला ने रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि उसकी नाबालिग बेटी के साथ दुष्कर्म किया गया है। इसके बाद जांच हुई। जांच में स्थानीय पुलिस ने एक नाबालिग आरोपी के खिलाफ बलात्कार के आरोप में चार्जशिट भी की। इस मामले की सुनवाई के दौरान नाबालिग आरोपी ने बलात्कार पीड़िता के बच्चे के डीएनए टेस्ट की मांग की। लेकिन 25 मार्च 2021 को यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी गई कि याचिका केवल बचाव स्तर पर ही उठाई जा सकती है। इसके बाद नाबालिग आरोपी ने पॉक्सो कोर्ट के समक्ष अपील दायर की।  जिसके आधार पर पॉक्सो कोर्ट ने बच्चे के डीएनए टेस्ट का निर्देश दे दिया। पॉक्सो कोर्ट के इस आदेश के खिलाफ पीड़िता की मां ने हाईकोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर की। दरअसल पीड़िता की माँ को अंदेशा है कि अगर डीएनए टेस्ट की रिपोर्ट आरोपी के विरुद्ध आती है तो पीड़िता पर चरित्रहीन के आरोप लग सकते है।  इसके बाद हाईकोर्ट इलाहाबाद ने पीड़िता का डीएनए टेस्ट ना कराने के आदेश दिए।

डीएनए पर क्या कहता है कोर्ट : 

जो हालात उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर मामले में बने है उसके मद्देनजर हाईकोर्ट का एक आदेश कहता है कि जहां रिश्ते को साबित करने के लिए अन्य सबूत उपलब्ध हो अदालत को आमतौर पर डीएनए टेस्ट का आदेश देने से बचना चाहिए। ऐसा इसलिए है कि इस तरह के परीक्षण किसी व्यक्ति के निजता के अधिकार को प्रभावित करते हैं और इसके बड़े सामाजिक प्रभाव भी हो सकते हैं। कोर्ट का  ऐसे मामलों में स्पष्ट कहना है कि हमारा मानना है कि जब किसी व्यक्ति की निजता का मामला आता है तो उस पर डीएनए टेस्ट कराने का दबाव नहीं डाला जा सकता । एक बच्चे के पिता का पता लगाने के लिए कोर्ट को डीएनए टेस्ट का निर्देश सामान्य तौर पर नहीं देना चाहिए । इसके साथ ही कोर्ट को सभी परिणामों पर विचार करने के साथ-साथ साक्ष्य अधिनियम की धारा 112 के तहत निकाले जाने वाले जो भी अनुमान है उन पर भी विचार करना चाहिए । साथ ही न्यायालय कहता है कि  इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि डीएनए टेस्ट की कितनी जरूरत है । क्या डीएनए टेस्ट के बिना सच्चाई का पता लगाया जा सकता है या नहीं । क्योंकि डीएनए टेस्ट कराने के बाद बच्चे की वैधता और उसकी सुरक्षा का भी मामला आता है ।

क्या होता है डीएनए : 

डीएनए एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में ट्रांसफर होता रहता है और इसके द्वारा ही पीढ़ी में होने वाले बदलाव के बारे में जानकारी इकट्ठा की जा सकती है| डीएनए के माध्यम से इंसानी शरीर की कोशिकाओं में मौजूद जानकारी को काफी लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है। यही नहीं बल्कि इस जानकारी का इस्तेमाल विभिन्न प्रकार के गुप्त रहस्य का पता लगाने के लिए किया जा सकता है। जिससे कि व्यक्ति के असली वारिस या फिर वंशज के बारे में भी जानकारी प्राप्त हो सकती है।  डीएनए के अंदर अनुवांशिकी जानकारी का एक स्टोर होता है। इस स्टोर को ही जीन कहा जाता है।

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