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भ्रष्ट अधिकारी को संरक्षण

मामला यदि किसी विभाग के बड़े अधिकारी के भ्रष्टाचार से संबंधित हो तोशीर्ष अफसरों की पूरी बिरादरी ही उसे बचाने में जुट जाती है, फिर भले ही उस अधिकारी के खिलाफ पर्याप्त सुबूत इस बात की तस्दीक क्यों न कर रहे होंकि उक्त अधिकारी ने नियम-कानूनों को ताक पर रखकर भ्रष्टाचार को अंजाम दिया। ऐसे मामले तब और गंभीर हो जाते हैं जब विभागीय जांच रिपोर्ट के बावजूद भ्रष्ट अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई नहीं होती और वह भी परस्पर दो कट्टर शत्रुओं (राजनीतिक शत्रु) की सरकारों के कार्यकाल में। मामला उत्तर प्रदेश जल विद्युत निगम लिमिटेड के सहायक अभियंता ललित वाष्र्णेय (अधिशासी अभियंता का अतिरिक्त प्रभार) से संबंधित है। 
जहां एक ओर मौजूदा योगी सरकार तत्कालीन अखिलेश सरकार के कार्यकाल में अंजाम दिए गए भ्रष्टाचार और कथित भ्रष्ट अफसरों के खिलाफ कार्रवाई किए जाने का दावा कर रही है वहीं दूसरी ओर उत्तर प्रदेश जल विद्युत निगम लिमिटेड का एक सहायक अभियंता खुलेआम सरकार की नेक-नीयत पर उंगली उठा रहा है। यहां तक कि सम्बन्धित विभाग के आला अधिकारी तक इस अभियंता के समक्ष बौने बने हुए हैं। ऐसा तब जब कथित भ्रष्ट अभियंता के खिलाफ तमाम सुबूत मौजूद हैं।
बताते चलें कि ऐसा तब है जब बीती 08 फरवरी 2018 को विभाग के दो जांच अधिकारियों गौरव अग्रवाल (लेखाधिकारी एवं सदस्य, जांच समिति) और अजय कुमार पुरवार (मुख्य अभियंता एवं संयोजक, जांच समिति) ने अपनी जांच रिपोर्ट में सहायक अभियंता ललित कुमार वाष्र्णेय को दोषी माना है।
भ्रष्टाचार से संबंधित यह मामला तब और गंभीर हो जाता है जब तमाम दस्तावेजी सुबूतों के बावजूद पिछले लगभग साढे़ तीन वर्षों तक दोषी अभियंता के खिलाफ न तो विभागीय कार्रवाई की जाती है और न ही विधि सम्मत कार्रवाई। वर्ष 2013 में अंजाम दिए गए भ्रष्टाचार से संबंधित इस मामले का प्रथम बार खुलासा 31 जनवरी 2015 को किया गया था और वह भी विभाग के ही एक कर्मचारी द्वारा। बताते चलें कि यह मामला पूरी तरह से धोखाधड़ी और सरकारी धन के दुरुपयोग से संबंधित है। लिहाजा इस मामले में धोखाधड़ी को संज्ञान में लेते हुए आईपीसी की उपयुक्त धाराआंे में मुकदमा पंजीकृत करके कार्रवाई की जानी चाहिए। अब यदि जांच समिति द्वारा उत्तर प्रदेश पावर कार्पोरेशन के निदेशक को भेजी गयी जांच रिपोर्ट की तारीख (08 फरवरी 2018) को ही आधार मान लें तो लगभग छह माह का समय बीत जाने के बावजूद सिर्फ कागजी सवाल-जवाब के अतिरिक्त संबंधित तत्कालीन सहायक अभियंता के खिलाफ न तो किसी प्रकार की विभागीय कार्रवाई की यी और न ही विधि सम्मत कार्रवाई। संदेह तब और बलवान हो जाता है जब कथित भ्रष्टाचार पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के कार्यकाल में अंजाम दिया गया हो और मौजूदा योगी सरकार ऐसे अधिकारियों के खिलाफ सख्ती की बात कर रही हो लेकिन कार्रवाई दूर-दूर तक नजर नहीं आ रही हो।
विभाग के पूर्व कर्मचारी और मौजूदा अधिवक्ता (हाई कोर्ट) नन्दलाल जायसवाल की दस्तावेजी शिकायत के आधार पर सहायक अभियंता ललित कुमार वाष्र्णेय के खिलाफ जांच समिति गठित कर जांच स्थापित की गयी थी। भ्रष्टाचार से संबंधित यह मामला सहायक अभियंता ललित कुमार वाष्र्णेय द्वारा अप्रैल, मई और जून माह (वर्ष 2013) में फर्जी यात्रा बिल के सहारे विभागीय कोष को नुकसान पहुंचाने से संबंधित है।
भ्रष्टाचार से जुडे़ इस प्रकरण में आरोपित सेवक ललित कुमार वाष्र्णेय (सहायक अभियंता) ने जांच समिति के समक्ष अपना पक्ष रखते हुए यह कहा था कि उनके द्वारा प्रस्तुत किए गए यात्रा बीजक सही हैं और उन्होंने त्रुटिवश पीएनआर नम्बर गलत लिख दिया था। श्री वाष्र्णेय ने इस संबंध में जांच समिति को आश्वस्त किया था कि वे सही पीएनआर नम्बर शीघ्र उपलब्धरवा देंगे लेकिन काफी समय व्यतीत हो जाने के बावजूद जांच रिपोर्ट तैयार किए जाते समय तक भी श्री वाष्र्णेय द्वारा कोई भी सूचना जांच समिति को उपलब्ध नहीं करवायी। इस बात को जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट में भी लिखा है। कहा जा रहा है कि इस सम्बन्ध में जांच समिति के अधिकारियों ने श्री वाष्र्णेय को कई बार अनेक माध्यमों से सही पीएनआर नम्बर उपलब्ध करवाए जाने का अवसर दिया था, लेकिन उनके द्वारा तय समय में कोई भी दस्तावेजी सुबूत उपलब्ध नहीं करवाए गए। इस पर जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट लिखा है कि इससे परिलक्षित होता है कि आरोपित सेवक के पास किसी प्रकार के साक्ष्य मौजूद नहीं हैं।
सहायक अभियंता ललित कुमार वाष्र्णेय ने मई 2013 में विभागीय कार्यों से की गयी यात्राओं के लिए विभाग को जो यात्रा बीजक प्रस्तुत किया वह अपने आप में ही भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा का एक प्रमाण है। अरोपित सेवक के द्वारा प्रस्तुत बीजक के मुताबिक पीएनआर संख्या-2346988016 (दिनांक 13 मई 2013) पर लखनऊ से सहारनपुर की यात्रा थर्ड एसी की श्रेणी में दर्शायी गयी। प्रस्तुत किए गए बीजक में स्पष्ट लिखा था आरोपित सेवक ने 13 मई 2013 को रात्रि 11 बजकर 30 मिनट पर लखनऊ से सहारनपुर के चले थे और अगले दिन 14 मई 2013 को वह सुबह 7 बजकर 30 मिनट पर सहारनपुर पहुंए गए थे। जब इस सम्बन्ध में रेलवे विभाग से जानकारी ली गयी तो चैंकाने वाला खुलासा हुआ।
रेलवे विभाग ने अपने पत्रांक संख्या-एनडीसीआरध् /ई-36/एलटीसी/37/2017  के माध्यम से यह अवगत कराया कि उक्त पीएनआर संख्या का टिकट 23 मई 2013 को सहारनपुर से लखनऊ तक की यात्रा के लिए टेªन संख्या 12232 (थर्ड एसी) के लिए ललित कुमार के नाम से निर्गत किया गया था न कि लखनऊ से सहारनपुर के लिए और इस टिकट को भी 8 बजकर 42 मिनट पर निरस्त भी करा दिया गया था। साफ जाहिर है कि रेलवे विभाग ने जो जानकारी उपलब्ध करवायी उसके मुताबिक प्रस्तुत किए गए यात्रा बीजक के मुताबिक यात्रा ही नहीं की गयी थी।
उपरोक्त आधार पर जांच समिति ने सहायक अभियंता ललित कुमार वाष्र्णेय द्वारा उपलब्ध करवायी जानकारी को गलत माना। इससे सम्बन्धित समस्त प्रमाण विभाग के जिम्मेदार अधिकारी को कार्रवाई के बाबत सौंप दिए गए। अभियोजित आरोप के अनुसार 12 सितम्बर 2013 में ललित कुमार वाष्र्णेय ने स्वयं को बादशाहीबाग पहुंचने का समय प्रातः 10 बजकर 45 मिनट दर्शाया है जबकि आरोपी सेवक ने उसी दिन सुबह की पाली में कार्य को भी दर्शा दिया जबकि सुबह की पाली सुबह 6 बजे से दोपहर 2 बजे तक होती है। यानी हैरतअंगेज तरीके से बादशाहीबाग पहुंचने से पहले ही आरोपी सेवक ने कार्यभार ग्रहण कर लिया था।
जांच समिति द्वारा जांच के दौरान सामने आए ये चन्द मामले तो महज एक बानगी भर हैं जबकि ऐसे तमाम मामले जांच के दौरान प्रमाणित हो चुके हैं कि सहायक अभियंता ललित कुमार वाष्र्णेय ने फर्जी तरीके से यात्रा बीजकों के सहारे विभागीय कोष को नुकसान पहुंचाया। उत्तर प्रदेश जल विद्युत निगम के सहायक अभियंता के भ्रष्टाचार से सम्बन्धित यह मामला मौजूदा समय में खासतौर से इसलिए चर्चा का विषय बना हुआ है क्योंकि तमाम पुख्ता सुबूत और जांच रिपोर्ट के बावजूद मौजूदा योगी सरकार के कार्यकाल में आरोपित सेवक के खिलाफ कार्रवाई नहीं की जा रही।
फिलहाल सहायक अभियंता ललित कुमार वाष्र्णेय वर्तमान समय में भी सहायक अभियंता के पद पर विराजमान हैं और अपने विरोधियों को सबक सिखाए जाने की बात कर रहे हैं। कहना गलत नहीं होगा यदि श्री वाष्र्णेय अपने विरोधियों को सबक सिखाने की बात कर रहे हैं जो शायद अब यह काम उनके लिए मुश्किलों भरा हो सकता है क्योंकि जांच रिपोर्ट आने के बाद उनके विरोधियों की संख्या निश्चित तौर पर बढ़ गयी है। उनके विरोधियों में अब सिर्फ शिकायतकर्ता ही शेष नहीं है अपितु जांच अधिकारी से लेकर वे आला अधिकारी भी शामिल हैं जिनके आदेश पर जांच समिति गठित कर जांचोपरांत उन्हें दोषी माना गया है। हालांकि मौजूदा समय में श्री वाष्र्णेय ने खामोशी की चादर ओढ़ रखी है, ऐसा इसलिए कि यदि उन्होंने इस मामले में जरा भी होशियारी दिखाने की कोशिश की तो निश्चित तौर पर फाइलों में कैद हो चुकी जांच रिपोर्ट बाहर आकर उनका भविष्य खराब कर सकती है। विभागीय कर्मचारियों की मानें तो श्री वाष्र्णेय ने विभाग के आला अधिकारियों से उन पर रहम की गुजारिश की है जिसे संबंधित विभाग के जिम्मेदार अधिकारी भलीभांति अंजाम दे रहे हैं।

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