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कोरोना वैक्सीन बनी अभिशाप!

आपातकालीन स्थिति में ईजाद की गई कोरोना वैक्सीन अलग-अलग उम्र के लोगों पर तरह-तरह के प्रभाव डाल रही है। युवाओं में न केवल हार्टअटैक बल्कि कैंसर, रक्तचाप, मधुमेह और प्रजनन अंगों पर भी इसके प्रभाव देखे जा रहे हैं। इस बीच सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता और मानवाधिकार कार्यकर्ता कॉजिन गोंजाल्विज ने कोरोना वैक्सीन के चलते हो रही मौतों के लिए केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहराते हुए एक याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की है। गोंजाल्विज ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका की सुनवाई के दौरान तर्क दिया कि यदि वैक्सीन के दुष्परिणामों की बाबत केंद्र सरकार टीकाकरण से पहले लोगों की सहमति लेकर वैक्सीन लगाती तो इतनी मौतें नहीं होती

बीते कुछ समय से लगातार हार्ट अटैक से हो रही मौतों के मामले बढ़ते जा रहे हैं। खासकर भारत में 25 से 50 वर्ष की आयु के लोग इसके शिकार हो रहे हैं। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या ये मौतें कोरोना वैक्सीन की वजह से हो रही हैं? इस संबंध में कई प्रकार के शोध भी सामने आये हैं जिनमें कोरोना वैक्सीन को इसका मुख्य कारण बताया जा रहा है। शोधकर्ताओं का कहना है कि आपातकालीन स्थिति में ईजाद की गई वैक्सीन अलग-अलग उम्र के लोगों पर अलग-अलग तरह के प्रभाव डाल रही है। युवाओं में न केवल हार्ट अटैक, कैंसर, रक्तचाप, मधुमेह, जैसी खतरनाक बीमारियां बल्कि प्रजनन अंगों पर भी इसके प्रभाव देखे जा रहे हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, दुनिया भर में खासकर युवा तबके में दिल से संबंधित बीमारियों का आंकड़ा पिछले कुछ सालों में 80 प्रतिशत बढ़ा है, जिनमे 1.79 करोड़ मौतों में से 20 फीसदी भारत में हो रही हैं। यानी दुनियाभर में हो रही मौतों में भारत में होने वाली मौतों के आंकड़े सबसे अधिक हैं। इंडियन हार्ट एसोसिएशन के आंकड़े बताते हैं कि ‘भारत में दिल के दौरे से मरने वालों में 10 में से चार की उम्र 45 साल से कम है। 10 साल के भीतर भारत में हार्ट अटैक से होने वाली मौतें करीब 75 फीसदी तक बढ़ गई हैं, और इन आंकड़ों में अत्याधिक वृद्धि पिछले दो सालों में देखी गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि 40 साल से कम उम्र के 25 फीसदी और 50 साल से कम उम्र के 50 फीसदी लोगों में हार्ट अटैक का खतरा बढ़ता जा रहा है। जिसके चलते कोविड-19 वैक्सीन को लेकर विश्व भर की स्वास्थ्य संस्थाएं लगातार शोध कर रही हैं।

गौरतलब है कि दिल का दौरा पड़ने के मामले आमतौर पर ‘मोटापे’ और ‘उच्च कॉलेस्ट्रॉल’ के शिकार लोगों के बीच देखने को मिलते हैं, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में, हृदयाघात के मामलों में वृद्धि हुई है, विशेष रूप से 25 से 50 वर्ष की आयु के लोग इसकी चपेट में आ रहे हैं। युवाओं में सामने आई ऐसी घटनाएं दुनियाभर के लिए चिंताजनक तस्वीर पेश करती हैं। ऐसे कई वीडियो सामने आए हैं, जिनमें सैर, जिम में कसरत जैसी रोजमर्रा की गतिविधियां करते और शादी में नाचते समय लोग हृदयाघात के शिकार हो रहे हैं। हृदय रोग विशेषज्ञों का मानना है कि ‘असामान्य व्यायाम’ या ‘अति व्यायाम’ युवाओं में दिल के दौरे का कारण बन रहा है।

वैक्सीन से हो रही घातक बीमारियां
अमेरिकी स्वास्थ्य एजेंसी ‘सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (सीडीसी) का एक शोध सामने आया है जिसमें शोधकर्ताओं ने बीते तीन वर्षों के दौरान अमेरिकी स्वास्थ्य संस्था ‘फेडरल ड्रग एजेंसी’ (एफडीए) द्वारा प्रमाणित सभी वैक्सीन के प्रभावों का आंकलन किया है। इनके द्वारा पेश किए गए शोध के अनुसार ‘कोविड-19’ वैक्सीन सबसे घातक सिद्ध हो रही है। इससे पैदा हो रही तमाम बीमारियों के आंकड़े भी रिपोर्ट में दिए गए हैं जिसमें कैंसर के 837 मामले, 88 मौतें, 66 स्थायी विकलांगता और 104 जानलेवा घटनाएं शामिल हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि अभी यह आंकड़े पूरी तरह एकत्रित नहीं हो पाए हैं। अनुमान है कि वैक्सीन से होने वाली बीमारियों की संख्या इनसे भी अधिक हो सकती है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि वैक्सीन से होने वाली बीमारियों का असर आने वाले 30 वर्षों तक लोगों के शरीर में अलग-अलग रूपों से देखा जा सकेगा। कोविड-19 वैक्सीन के असर को खत्म होने में लगभग 360 महीने यानी 3 सालों का समय लग सकता है।

गौरतलब है कि कोविड के टीकों के बाद 20 महीनों में हार्ट से संबंधित 837 मामले रिपोर्ट किए गए थे, लेकिन दिसंबर 2020 के बाद ये आंकड़े बढ़कर 10,661.4 हो गए। इसके पीछे सीधा ताल्लुक वैक्सीन को बताया जा रहा है। इसी के संदर्भ में टेक्सास में स्थित स्वास्थ्य संगठन की प्रमुख शिल्हावी कहती हैं कि ‘वैक्सीन के कारण वह बीमारियां जो केवल वृद्ध अवस्था में पाई जाती थी वह वैक्सीन के बाद से 12 वर्ष से लेकर 25 की युवावस्था में अधिक देखने को मिल रही है, इन खतरनाक बीमारियों का युवावस्था में प्रवेश करना दुनिया के लिए एक खतरनाक अभिशाप बन गया है। रिपोर्ट पर काम कर रहे पैथोलॉजिस्ट डॉ. रेयान कोल ने बताया कि ‘वे उन रोगियों में विभिन्न ऑटोइम्यून बीमारियों और कैंसर में बड़े पैमाने पर वृद्धि देख रहे हैं, जिनका कोविड-टीकाकरण हो चुका है। 1 जनवरी से 2020 से प्रयोगशाला में, मैं सालाना आधार पर एंडोमेट्रियल कैंसर की 20 गुना वृद्धि देख रहा हूं।’

वैक्सीन से महिलाओं की मेंस्ट्रुअल साइकिल पर प्रभाव
अमेरिका के ऑर्गन हेल्थ एंड साइंस यूनिवर्सिटी की रिसर्च में शामिल 55 फीसदी महिलाओं ने फाइजर, 35 प्रतिशत ने मॉडर्ना और 7 फीसदी को जॉनसन एंड जॉनसन वैक्सीन लगवाई जिनमें करीब 1,556 महिलाएं ऐसी थीं जिन्होंने वैक्सीन नहीं लगवाई थी। वैज्ञानिकों ने इस रिसर्च में वैक्सीन के पहले और बाद के 3-3 पीरियड साइकिल को फॉलो किया और वहीं जिन महिलाओं को वैक्सीन नहीं लगी थी उनके 6 पीरियड साइकिल पर ध्यान दिया गया। इस रिसर्च में यह बात सामने आई कि महिलाओं को वैक्सीन के पहले डोज के बाद पीरियड 5 दिन लेट हुए, वहीं दूसरी वैक्सीन के बाद पीरियड में 7-8 दिन की देरी देखी गई। इसके विपरीत जिन महिलाओं को वैक्सीन नहीं लगी थी उनके पीरियड सही समय पर आए। वहीं वैक्सीन लगवाने वाली 358 महिलाएं ऐसी भी थीं जिनके जिनके पीरियड साइकिल की अवधी 10-15 दिन तक बढ़ गई थी। हालांकि रिसर्च में यह भी पाया गया कि इन महिलाओं के 6वीं पीरियड साइकिल आने तक यह अंतर कम होते हुए देखा गया।

वैक्सीन कैसे करती है वार
मानव शरीर में टी-कोशिकाएं पाई जाती हैं जो मानव शरीर में प्रवेश करने वाले सभी वायरस से लड़ने में मदद करती है। लेकिन कोरोना वैक्सीन लेने वाले सभी व्यक्तियों में इन कोशिकाओं की कमी देखी गई है। प्रतिरोधक क्षमताओं वाली कोशिकाओं की कमी होने के कारण लोगों के शरीर में कैंसर, मधुमेह, रक्तचाप और हार्ट की बीमारी पैदा करने वाले वायरस उत्पन्न होकर बढ़ने लगते हैं। सीडीसी द्वारा 29 जुलाई 2021, को जारी किए डेटा अनुसार संयुक्त राज्य अमेरिका में कोविड-19 टीकों के बाद कुल 1,357,937 स्वास्थ्य संबंधी मामले सामने आए हैं जिसमें 14 दिसंबर, 2020 और 22 जुलाई, 2022 के बीच 29,790 मौतें और 2,47,686 गंभीर बीमारियां शामिल थीं। इनमें 55,719 स्थायी विकलांगता, मायोकार्डिटिस/पेरिकार्डिटिस के 50,739 मामले और शिंगल्स के 14,374 रिपोर्ट किए गए मामले हैं। चूंकि ऐसे आंकड़े स्वैच्छिक रिपोर्ट पर आधारित होते हैं, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि वे वास्तविक आंकड़ों में केवल ‘टिप ऑफ द आइसबर्ग’ समान हैं।

जिम्मेदारी लेने से केंद्र सरकार का इंकार
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता और मानवाधिकार कार्यकर्ता कॉजिन गोंजाल्विज ने कोरोना वैक्सीन के चलते हो रही मौतों के लिए केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहराते हुए एक याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की है। इस याचिका की सुनवाई के दौरान गोंजाल्विज ने तर्क दिया यदि वैक्सीन के दुष्परिणामों की बाबत नागरिकों को केंद्र सरकार टीकाकरण से पहले सूचित कर उनसे सहमति लेकर ही वैक्सीन लगाती तो इतनी मौतें नहीं होती। केंद्र सरकार ने इसके जवाब में कहा कि ‘सहमति का जवाब वैक्सीन जैसी दवा पर लागू नहीं होता है।’ केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया कि कोविड टीका लगवाना कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं है। वैक्सीन लगवाने की सूचना के लिए किसी तरह की सहमति की जरूरत नहीं है। हालांकि सरकार सभी को प्रोत्साहित करती है कि वे जनहित में वैक्सीन लगवा लें, लेकिन इसकी कोई कानूनी बाध्यता नहीं है।

गोंजाल्विज द्वारा दायर याचिका पिछले साल दो युवतियों की कथित तौर पर कोरोना टीकाकरण बाद हुई मौत को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका से जुड़ी है। केंद्र ने हलफनामे के साथ दायर जवाब में कहा कि जिन मामलों में टीके के कारण मौत हुई हो, उनमें दीवानी कोर्ट में मुकदमा दायर कर मुआवजा मांगा जा सकता है। इस याचिका में बहस के दौरान कोरोना टीकाकरण की वजह से कथित मौतों को लेकर केंद्र सरकार ने किसी भी तरह की जिम्मेदारी लेने से इनकार कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट में दायर हलफनामे में केंद्र ने कहा कि मृतकों व उनके परिजनों के प्रति उसकी पूरी हमदर्दी है, लेकिन टीके के किसी भी प्रतिकूल प्रभाव के लिए उसे जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

दरअसल, याचिका में मांग की गई है कि कोविड वैक्सीन से मौत के मामलों की स्वतंत्र जांच कराई जाए और टीकाकरण के बाद किसी भी प्रतिकूल प्रभाव का समय रहते पता लगाकर उससे बचाव के उपाय करने के लिए विशेषज्ञ चिकित्सा बोर्ड बनाने का आग्रह किया गया है। याचिका का जवाब केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने पिछले सप्ताह दायर किया। इसमें कहा गया है कि टीकों के प्रतिकूल प्रभाव के कारण बेहद कम मौतों व मुआवजे के लिए केंद्र को जिम्मेदार मानना कानूनी रूप से उचित नहीं होगा।

अभी निश्चित कुछ कहना जल्दबाजी होगी
कोरोना वैक्सीन के बाद बहुत सारे ऐसे मामले आए हैं जिनमें लोगों में शारीरिक कमजोरी और शारीरिक बदलाव देखे गए हैं। मरीजों की संख्या में वृद्धि भी देखी गई है। ऐसा इसलिए भी हो सकता है क्योंकि किसी भी बिमारी के लिए चाहे वह पोलियों हो, चिकनपॉक्स हो, खसरा हो या कोई और अन्य बिमारी सभी वैक्सीन को मनुष्य से पहले अलग-अलग तरह के जानवरों और पशुओं पर उनका एक्सपेरिमेंट किया जाता है। क्योंकि कोरोनाकाल में यह वैक्सीन भले ही आठ महीनों के बाद लोगों के लिए तैयारी की गई थी लेकिन इसका एक्सपेरिमेंट उस तरह नहीं हो पाया जिस तरह अन्य वैक्सीन का होता है। हालांकि यह भी कहना गलत होगा कि इसे बिना किसी एक्सपेरिमेंट के लोगों को लगाया गया है, लेकिन समय कम होने और हालातों के दिन प्रतिदिन खराब होने के कारण इसके अलग-अलग प्रभाव लोगों के शरीर में देखे जा रहे हैं। कोरोना वैक्सीन के बाद मैंने पेशेंट के शरीर में अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखी हैं, जब कोई भी टीकाकरण किया जाता है तो उसकी प्रतिक्रिया में बुखार, चक्कर आना जैसी शिकायतें अमूमन देखी जाती हैं। कोरोना वैक्सीन के चलते लेकिन लोगों के न केवल शरीर अपितु उनके मस्तिष्क पर भी गहरा प्रभाव पड़ रहा है। लोगों के दिमाग में खून के चट्टे और उनकी सोचने-समझने की गति में भी धीमा पन महसूस किया गया है। यदि स्पष्ट शब्दों में कहा जाये तो कोरोना के बाद लोगों के शरीर में उसके कुप्रभाव देखे गए हैं। हालांकि इन सभी घटनाओं का केवल अनुमान लगाया जा रहा है जब तक ठोस परिणाम सामने नहीं आते तब तक केवल कोरोना वैक्सीन को ही इसका जिम्मेदार मानना उचित नहीं होगा।
डॉ. आदित्य सिंह भाटी, वरिष्ठ न्यूरोलॉजिस्ट, अपोलो इंद्रप्रस्थ हॉस्पिटल, नई दिल्ली

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