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फिर ‘कामराज प्लान’ को अपनाती दिख रही कांग्रेस

कांग्रेस अध्यक्ष राजीव गांधी लोकसभा चुनाव में हार की जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफे की जो पेशकश की उसके बाद पार्टी के सभी वरिष्ठ पार्टी नेताओं में इस्तीफे देने की लाईन लग गई है। पार्टी महासचिव दीपक बाबरिया तथा एआइसीसी के साथ-साथ ही राज्यों के तकरीबन 150 कांग्रेस नेताओं ने इस्तीफा सौंप दिया। कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने कहा कि राहुल गांधी को ही पार्टी अध्यक्ष बना रहने चाहिए। वहीं गोवा के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गिरीश चोडानकर ने हार की जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा सौंप दिया। लोकसभा में बड़ी हार के बाद राहुल गांधी अध्यक्ष पद छोड़ने पर अड़े हैं। पार्टी में बदलाव का रास्ता खोजने में लगे हैं। छत्तीसगढ़ में नए प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष मोहन मरकाम ने भी इस्तीफा दे दिया।
राहुल के बाद बाबरिया पार्टी के संगठन का पद छोड़ने की पेशकश करने वाले सबसे बड़े पदाधिकारी हैं। कांग्रेस की नई राज्य इकाइयों के अध्यक्षों, कार्यकारी अध्यक्षों, पार्टी के राष्ट्रीय सचिवों के अलावा युवा और महिला इकाई के करीब 150 पदाधिकारियों ने भी इस्तीफे भेजे। कांग्रेस पाटी्र के कुछ वरिष्ठ दिग्गजों के इस्तीफों का सिलसिला शुरू हो गया है। एआइसीसी के सचिवों में ज्यादातर नए हैं। इनमें अनिल चैधरी, राजेश धनानी, वीरेंद्र राठौर तथा प्रकाश जोशी शामिल हंै। बहरहाल, दिल्ली प्रदेश के कार्यकारी अध्यक्ष राजेश लिलोठिया से लेकर तेलंगाना के कार्यकारी अध्यक्ष पोनम प्रभाकर भी इस्तीफा भेजने वालों में शामिल हैं।
कांग्रेस पार्टी में ये इस तरह पहली बार नहीं हो रहा है। इससे पहले 1963 में कामराज प्लान के तहत कई नेताओं से इस्तीफे ले लिये गये थे। के ़कामराज एक आम कार्यकर्ता से कांग्रेस अध्यक्ष के पद तक पहुंचे। एक गरीब परिवार में जन्म लेने वाले के ़कामराज ने आजादी की लड़ाई भाग लिया। महात्मा गांधी के साथ जुड़कर तमिलनाडु में जमीनी स्तर पर कांग्रेस पार्टी को खड़ा करने में अहम योगदान दिया था। आजादी की लड़ाई में वे कई बार जेल गए और उनके जीवन के करीब आठ साल जेल में रहेे। 1954 में कामराज पहली बार तमिलनाडु या उस वक्त के मद्रास से मुख्यमंत्री बने। के ़ कामराज आजादी के बाद लगातार तीन बार तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बने। साल 1962 में तीसरी बार चुनाव जीतने के बावजूद कामराज को एहसास हुआ कि अब उनकी पार्टी यानी कांग्रेस की जमीन खिसकने लगी है। यही वजह है कि मुख्यमंत्री बनने के एक साल बाद साल 1963 में उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर पार्टी संगठन में रहकर जनता के बीच काम करने का फैसला किया। कामराज ने इसके साथ ही प्रधानमंत्री नेहरू को भी सलाह दी कि वह अपने मंत्रियों से इस्तीफा लेकर उन्हें जनता के बीच भेजें ताकि आम जनता की परेशानियों को समझा जा सके। नेहरू को उनकी सलाह जंच गई। इस पर नेहरू सरकार के छह बड़े मंत्रियों ने इस्तीफा ले लिया गया। इस तरह यह योजना कामराज प्लान के नाम से मशहूर हो गई। आज भी मुसीबत के वक्त कई राजनीतिक पार्टियां कामराज प्लान की वकालत करती दिखती हैं।
 कामराज के पिता की जल्दी मौत होने के कारण उन्हें अपनी पढ़ाई पूरी करने का मौका नहीं मिला था। शायद यही वजह थी कि वह शिक्षा की आवश्यकता से अच्छी तरह से वाकिफ थे। कामराज ने तमिलनाडु में बड़ी संख्या में स्कूल खुलवाए। आजाद भारत में पहली बार स्कूलों में मिड डे मील की शुरुआत कामराज ने ही की। छात्रों को मुफ्त यूनिफार्म और किताबें देने के साथ-साथ उन्होंने अपने राज्य में 11वीं कक्षा तक मुफ्त शिक्षा की व्यव्स्था की। कामराज ने सुनिश्चित किया कि तीन मील की दूरी पर कम से कम एक स्कूल होना ही चाहिए। उनके कार्यकाल के दौरान ही मद्रास राज्य में साक्षरता की दर सात फीसदी से 37 फीसदी तक पहुंच गई।
कामराज को आजाद भारत के पहले किंगमेकर राजनेता के तौर पर भी जाना जाता है। दो बार प्रधानमंत्री बनने का मौका मिलने के बावजूद उन्होंने यह पद नहीं लिया। साल 1964 में नेहरू की मौत के बाद कांग्रेस पार्टी नेतृत्व के संकट से जूझ रही थी। ऐसे में बतौर कांग्रेस अध्यक्ष कामराज ने लाल बहादुर शास्त्री को प्रधानमंत्री पद की कुर्सी पर पहुंचाया। इसके बाद लालबहादुर शास्त्री की आकस्मिक मौत के बाद जब एक बार फिर से प्रधानमंत्री की कुर्सी खाली हुई तब भी कामराज के पास उसे हासिल करने का अच्छा मौका था।
अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के डीक्लासिफाइड दस्तावेजों के मुताबिक उस वक्त सीआईए, भी यह मान के चल रही थी कि कामराज ही अगले प्रधानमंत्री होंगे। लेकिन कामराज एक बार फिर से सत्ता से दूर ही रहे और उन्होंने इंदिरा गांधी को देश की तीसरी प्रधानमंत्री बना दिया।
 कामराज और उनके सहयोगियों को कांग्रेस के भीतर ‘सिंडिकेट’ के नाम से जाना जाता था। नेहरू की मौत के बाद ‘सिंडिकेट’की ताकत बहुत बढ़ गई थी। इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद कांग्रेस पार्टी में कामराज की पकड़ को कमजोर करने का काम शुरू कर दिया। सिंडिकेट पार्टी चला रहा था और इंदिरा सरकार चला रही थीं। पार्टी और सरकार के बीच मतभेद इस स्तर पर पहुंच गए कि साल 1969 में औपचारिक रूप से पार्टी का विभाजन हो गया। साल 1971 के आम चुनाव में इंदिरा की कांग्रेस को जनादेश मिला और कामराज की राजनीति अवसान की ओर बढ़ गई।

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