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लगातार पराजय से कांग्रेस नेतृत्व बैकफुट पर; विरोधी सुरों को शांत करने के प्रयास शुरू

पहले बिहार में करारी हार और अब पांच राज्यों से भी कांग्रेस को चुनावी हार का सामना करना पड़ा है। उस वक्त भी कांग्रेस में मंथन किया गया था और अब भी मंथन किया गया। होना भी चाहिए मंथन क्योंकि मंथन नहीं किया तो अमृत कैसे निकलेगा? लेकिन अगर मंथन के बाद भी अमृत न निकले तो फिर क्या लाभ मंथन का ? अब तक देश के सबसे पुराने राजनीतिक दल कांग्रेस को किसी मंथन से ‘संजीवनी’ मिली हो, ऐसा नजर नहीं आया। कांग्रेस के शीर्ष नेताओं के पास हर चुनावी हार का जवाब होता है कि जीत और हार होती रहती है, अब वे प्रतियोगिता में मजबूती से प्रवेश करेंगे।

देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस अब तक के इतिहास में बहुत बुरे दौर से गुजर रही है। जहां एक ओर केंद्र और राज्यों में उसका जनाधार लगातार सिकुड़ता जा रहा है, वहीं पार्टी के सामने अहम सवाल यह भी है कि आखिर भविष्य में पार्टी का खिवैया कौन होगा? क्योंकि खिवैया नहीं तो नैया कैसे पार होगी ? पार्टी अपना नेतृत्व ही तय नहीं कर पा रही है। लोकसभा चुनाव 2019 के बाद सोनिया गांधी ही अंतरिम अध्यक्ष के तौर पर काम कर रही हैं। एक तरफ पार्टी को अध्यक्ष नहीं मिल पा रहा है तो वहीं पार्टी को लगातार चुनावों में जीत भी नहीं मिल रही है। लगातार करारी हार से पार्टी के भीतर कलह जारी है। ऐसे में दस मई को होने वाली कांग्रेस कार्यसमिति (सीडब्ल्यूसी) की बैठक काफी अहम मानी जा रही थी। इस बैठक में मंथन से शायद अमृत निकलेगा।

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हाल में संपन्न हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी का प्रदर्शन काफी निराशाजनक रहा है। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में हार के कारणों पर मंथन  करने के लिए कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कांग्रेस कार्यसमिति (सीडब्ल्यूसी) की बैठक बुलाई गई थी। बैठक में हार के कारणों पर मंथन के साथ कोरोना महामारी से निपटने में केंद्र सरकार की विफलता पर भी चर्चा होनी थी ।

कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में हार के कारणों पर विचार करने के साथ-साथ कांग्रेस अध्यक्ष का चुनावी कार्यक्रम भी तय किया जाना था। कोरोना संक्रमण के कारण अगले महीने प्रस्तावित चुनाव स्थगित करने का निर्णय लिया गया है। यह तीसरी बार है जब कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव पिछले साल अगस्त से स्थगित कर दिए गए हैं।

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गौरतलब है कि हालिया चुनाव में कांग्रेस को सबसे ज्यादा उम्मीद केरल और असम से थी। इन दोनों प्रदेशों में पार्टी सत्ता में वापसी की उम्मीद कर रही थी। लेकिन दोनों प्रदेशों में पार्टी को निराशा ही हाथ लगी । पुडुचेरी में भी पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा , जबकि दो महीने  पहले तक पार्टी सत्ता में थी। तमिलनाडु में डीएमके-कांग्रेस गठबंधन को जीत मिली, पर जीत का श्रेय डीएमके नेता स्टालिन को गया। वहीं पश्चिम बंगाल में लेफ्ट के साथ गठबंधन के बावजूद पार्टी अपना खाता तक नहीं खोल पाई। ऐसे में पार्टी के अंदर असंतुष्ट नेता एक बार फिर मुखर हो सकते हैं।

पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि असंतुष्ट नेताओं के साथ कई अन्य नेता भी पिछले कई चुनावों में कांग्रेस के प्रदर्शन से खुश नहीं है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी खुद स्वीकार कर चुकी है कि विधानसभा चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन काफी ख़राब रहा है। पार्टी सांसदों के साथ वीडियों कॉन्फ्रेंसिंग के साथ बैठक में उन्होंने कहा था कि इन चुनावों में हार से सबक लेने की जरूरत है।

 

विरोधी सुरों को शांत करने के प्रयास शुरू

कांग्रेस को पूरे दो साल बाद पूर्णकालिक अध्यक्ष मिलने की उम्मीद थी। लोकसभा चुनावों में हार की जिम्मेदारी लेते हुए राहुल गांधी ने 2 जुलाई 2019 को कांग्रेस अध्यक्ष का पद छोड़ दिया था। बहुत रूठना मनाना के बाद सोनिया गांधी अंतरिम अध्यक्ष बनने के लिए सहमत हुईं। यह एक आंतरिक मुद्दा हो सकता है कि किसे और कब किसी पार्टी का अध्यक्ष बनाया जाए।

इसके प्रमुख का चुनाव कांग्रेस के लिए चुनौतीपूर्ण होने जा रहा है, जो वर्षों से वंशवादी पार्टी होने का आरोप झेल रही है। हो सकता है कि जब भी चुनाव तय हों, पार्टी गांधी-नेहरू परिवार से किसी को फिर से नेतृत्व सौंप दे। हालांकि, पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब सब कुछ नामांकन आधारित न होकर चुनाव प्रक्रिया के माध्यम से हो।

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अगर ऐसा होता है, तो पार्टी ग्रुप -23 से जुड़े नेताओं से दूर होने के आरोपों से भी बच सकेगी। हो सकता है कि चुनाव प्रक्रिया में एक नया नेतृत्व कांग्रेस को जीवन देने में सफल हो। वैसे भी, अगर आंतरिक लोकतंत्र को मजबूत किया जाता है, तो इससे कांग्रेस कमजोर नहीं होगी, बल्कि इसे और मजबूती मिलेगी।

कार्यसमिति की बैठक में, अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी ने स्पष्ट रूप से कहा है कि लगातार चुनावी पराजय के कारणों को जानते हुए हमें आगे के लिए सबक लेना होगा। सोनिया गांधी की चिंता भी जायज है। वह भी ऐसे समय में जब गैर-भाजपा और गैर-कांग्रेस शासित राज्यों में क्षेत्रीय दल मजबूत होते जा रहे हैं।

देश में एक मजबूत विपक्ष का होना भी जरूरी है, क्योंकि कमजोर विपक्ष के बावजूद सत्ता पर अंकुश लगाना मुश्किल है। हालांकि, नेतृत्व चयन के लिए कांग्रेस में टालने और विचार मंथन की बैठकों को अगली बैठकों तक टाल देना पार्टी और लोकतंत्र दोनों के लिए यह शुभ संकेत नहीं हैं। 

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