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भाजपा को उसी के हथियार से मात देने की रणनीति में कांग्रेस

भाजपा को उसी के हथियार से मात देने की रणनीति में कांग्रेस

कांग्रेस मुक्त भारत के अपने नारे को साकार करने के लिए भारतीय जनता पार्टी राज्यों में कांग्रेस विधायकों को तोड़कर वहां अपनी सरकारें बनाती रही है। तोड़फोड़ की रणनीति में असफल होने के बावजूद वह अपने इस अभियान पर डटी रही है, लेकिन अब पूर्वोत्तर के मणिपुर राज्य से मिले संकेत इशारा कर रहे हैं कि कांग्रेस भी उसे जवाब देने में पीछे नहीं हटेगी। वह भी भाजपा को उसी के हथियार का इस्तेमाल कर मात देने की रणनीति में आ गई है।

उल्लेखनीय है कि वर्ष 2016 में उत्तराखंड की हरीश रावत सरकार को गिराने के लिए भाजपा के रणनीतिकारों ने न सिर्फ कांग्रेस विधायकों को तोड़कर अपने पाले में शामिल किया था, बल्कि राज्य में चुनी हुई सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन भी लगा दिया गया था। हालांकि, बाद में न्यायालय के निर्देश पर रावत सरकार की बहाली हो गई थी। इसके बावजूद भाजपा निरंतर कांग्रेस की सरकारों को गिराने की रणनीति में जुटी हुई है। इसी क्रम में उसने पहले कर्नाटक में उस गठबंधन सरकार का गणित बिगाड़ा जिसमें कांग्रेस भी शामिल थी और फिर मध्य प्रदेश में कमलनाथ की सरकार पलट डाली। मध्य प्रदेश में तो भाजपा कोरोना काल में भी कमल खिलाने की कोशिशों में जुटी रही।

गुजरात और मध्यप्रदेश जैसे राज्यों की राज्यसभा सीटों के लिए होने जा रहे चुनावों के लिए भी भाजपा ने कांग्रेस विधायकों को तोड़कर उसका गणित बिगाड़ा है, लेकिन भाजपा की यह चाल अब पूर्वोत्तर के मणिपुर राज्य में उसी के लिए उल्टी पड़ गई है। राज्य में उसकी सरकार के लिए संकट खड़ा हो चुका है। इस बीच राज्य में मुख्यमंत्री बीरेन सिंह के नेतृत्व वाली भाजपा गठबंधन सरकार को उस वक्त भारी झटका लगा है जब भाजपा के तीन विधायकों ने इस्तीफा दे दिया और छह अन्य विधायकों ने सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया। ऐसे में 60 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार अल्पमत में आ गई है।

अभी राज्य विधानसभा की प्रभावी सदस्य संख्या 59 है क्योंकि एंद्रो सीट से कांग्रेस टिकट पर निर्वाचित श्याम कुमार सिंह पार्टी छोड़कर भाजपा में जाने पर अयोग्य ठहरा दिये गये थे। तीन भाजपा विधायकों के कांग्रेस में शामिल होने पर विधानसभा में अब उसकी सदस्य संख्या 24 रह गई है। गौरतलब है कि 2017 के चुनाव में कांग्रेस 28 सीटें हासिल कर सबसे बड़ी पार्टी बनी थी। भाजपा को 21 सीटें मिली थी, लेकिन वह कांग्रेस के सात विधायकों को अपने पाले में लाकर एनपीपी के समर्थन से सरकार बनाने में सफल रही थी, लेकिन आज हालत बदल गए हैं।

उपमुख्यमंत्री वाई. जॉयकुमार के नेतृत्व में नेशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीपी) के चार विधायकों, तृणमूल कांग्रेस के एक विधायक और एक निर्दलीय विधायक ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया है। इस तरह अब मुख्यमंत्री बीरेन सिंह के खिलाफ विधायकों की संख्या 28 हो गई है। भाजपा के 18 विधायक, नगा पीपुल्स फ्रंट के चार विधायक और लोजपा का एक विधायक ही बीरेन सिंह के साथ रह गए हैं। इस तरह अब राज्य में भाजपा के लिए सरकार को बचाने का संकट है। अब भाजपा के रणनीतिकारों पर निर्भर करता है कि वे कैसे इस संकट से पार पाते हैं। संकट न सिर्फ सरकार बचाने का है, बल्कि राज्यसभा की एक सीट के लिए होने वाले चुनाव में भी भाजपा का गणित गड़बड़ा चुका है। बहरहाल संभावनाएं जताई जा रही हैं कि यदि भाजपा के रणनीतिकार मणिपुर में अपनी सरकार को बचाने में असफल होते हैं, तो वहां राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता है।

-दाताराम चमोली

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