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किसी भी संगठन के लिए बूथ स्तर पर बने संगठनात्मक ढांचे की भूमिका सबसे अहम होती है, कहना गलत नहीं होगा कि संगठनात्मक ढांचा एक तरह से पार्टी या संगठन की जान होता है। यदि संगठनात्मक ढांचा बिना किसी गतिरोध के काम कर रहा हो तो कामयाबी से इंकार नहीं किया जा सकता लेकिन बात यदि प्रदेश कांग्रेस की हो तो इस पार्टी में यह ढांचा पूरी तरह से दम तोड़ा चुका है। फ्रंटल संगठन तक अपना औचित्य खो चुके हैं। स्थिति यह है कि वे जिस मकसद को लेकर बनाए गए हैं उसके अनुरूप काम ही नहीं कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर पार्टी के कई वरिष्ठ नेता बगावत का झण्डा उठाए हुए हैं। कार्यकर्ता स्वयं इस बात को मानते हैं कि प्रदेश कांग्रेस मृतप्राय दशा में है। इधर कार्यकर्ता प्रदेश अध्यक्ष की रीति और नीति से सामन्जस्य नहीं बिठा पा रहे हैं तो दूसरी ओर प्रदेश अध्यक्ष भी यूपीसीसी के कार्यकर्ताओं को अपने विश्वास में लेने में अब तक नाकाम साबित हुए हैं। 
अगले वर्ष लोकसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक दलों ने अपनी तैयारियों को धार देनी शुरु कर दी है लेकिन उत्तर प्रदेश के कांग्रेसी अभी भी कोमा से बाहर नहीं आ पा रहे हंै। कोमा में जाने का कारण भी बिलकुल साफ है। जब से उत्तर प्रदेश कांग्रेस की बागडोर अभिनेता से नेता बने राज बब्बर के हाथों में सौंपी गयी है तब से यूपी कांग्रेसियों के बीच बौखलाहट साफ देखी जा सकती है। यह बौखलाहट इसलिए भी बनी हुई है क्योंकि यूपी की राजनीति के धुरंदरों को नजरअंदाज कर रूपहले पर्दे के एक ऐसे कलाकार के हाथों में यूपी कांग्रेस की कमान सौंपी गयी है जो ठीक तरह से अपने कार्यकर्ताओं पर ही प्रभाव नहीं डाल पा रहा है। पिछले चार महीनों का रिकाॅर्ड प्रदेश अध्यक्ष के अकुशलता का जीता-जागता प्रमाण है। पिछले चार महीनों से भी ज्यादा समय से आगामी लोकसभा चुनाव को लेकर यूपी कांग्रेस मुख्यालय में एक भी बैठक आयोजित नहीं की जा सकी है जबकि विरोधी दलों की बैठकों का दौर लगातार जारी है। राज बब्बर की अगुवाई वाली प्रदेश कांग्रेस की गहन निद्रा का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है कि जहां एक ओर सपा और बसपा कार्यालय से सरकार विरोधी वक्तव्य और प्रदर्शनों का दौर जारी है वहीं कांग्रेस की सुप्तावस्था यह बताती है कि उसने चुनाव से पहले ही हथियार डाल दिए हैं। जो पार्टी के वफादार हैं वे चिंतित हैं लेकिन प्रदेश अध्यक्ष की तरफ से आगामी लोकसभा चुनाव को लेकर अभी तक कोई खाका तक नहीं खींचा गया है। स्थिति यह है कि पीसीसी का मुख्यालय भूत बंगला बना हुआ है। कुछ लोग भले ही चहल-कदमी करते दिख जाएं लेकिन खानापूर्ति करने के लिए कार्यालय आने वाले भी आगामी चुनाव को लेकर संजीदा नहीं है। यहां तक कि पार्टी प्रवक्ताओं का लश्कर भी खामोशी की चादर ताने हुए है। ऐसा इसलिए कि प्रदेश अध्यक्ष और कार्यकर्ताओं के बीच सामन्जस्य की बेहद कमी है। ज्ञात हो आपसी सिर-फुटौवल और पीसीसी कार्यकर्ताओं के भारी विरोध के कारण ही राजबब्बर ने अपना इस्तीफा हाई कमान को भेजा था, हालांकि उस इस्तीफे को अभी तक मंजूर नहीं किया गया है लेकिन कयास लगाए जा रहे हैं कि बहुत जल्द राजबब्बर का इस्तीफा मंजूर कर किसी ऐसे के हाथों यूपीसीसी की बागडोर सौंपी जायेगी जिससे पार्टी में गतिरोध को समाप्त किया जा सके। मौजूदा स्थिति यहां तक खराब है कि यूपीसीसी के अनेक वरिष्ठ कार्यकर्ता एक बार फिर से बगावत का मंसूबा बना चुके हैं। इन नेताओं का कहना है कि यदि हाई कमान स्तर से गतिरोध को समाप्त करने की दिशा में कदम नहीं उठाया गया तो निश्चित तौर पर यूपी कांग्रेस में बगावती कार्यकर्ता एक नया इतिहास लिख डालेंगे। इसके नुकसान का आंकलन भी आसानी से लगाया जा सकता है। विगत लोकसभा चुनाव में पूरी तरह से साफ हो चुकी कांग्रेस इस बार अपना वोट प्रतिशत भी खो देने वाली स्थिति में है।
कार्यकर्ताओं की नाराजगी हाई कमान स्तर से कुछ ऐसे फैसलों को लेकर भी है जो प्रदेश कांग्रेस के हित में कभी नहीं रहे। चाहें 1996 में बसपा के साथ गठजोड़ का फैसला रहा हो या फिर पिछले चुनाव में सपा के साथ गठजोड़ का फैसला। प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ कार्यकर्ता गठबन्धन से हुए नुकसान का ब्यौरा भी हाई कमान को भेज चुके हैं। प्रदेश कांग्रेसियों का मानना है कि गठजोड़ की राजनीति से कांग्रेस के सहयोगी दल तो लाभ कमा ले गए लेकिन कांगे्रसियों के भाग्य में सिर्फ कटोर ही हाथ लगा है। यूपीसीसी के नेता इस संभावना से भी इंकार नहीं करते हैं कि यदि आगामी लोकसभा चुनाव के दौरान मोदी विरोधी लहर काम कर गयी तो निश्चित तौर पर इसका फायदा सिर्फ और सिर्फ कांग्रेस को ही मिल सकता है बशर्ते इस काम के लिए अभी से गतिरोध को समाप्त कर चुनावी प्रक्रिया में जुटना होगा।
बताते चलें कि हाल ही में राहुल गांधी की अध्यक्षता में हुए कांग्रेस के पहले अधिवेशन में यूपी कांग्रेस की नयी कमेटी गठित किए जाने की बात कही गयी थी। दावा यह भी किया गया था कि कमेटी के सदस्यों का चयन हो चुका है जिसकी घोषणा जल्द कर दी जायेगी। घोषणा के बावजूद कमेटी को धरातल पर न उतार पाने के पीछे का मकसद भी बिलकुल साफ है। कमेटी इसलिए धरातल पर नहीं उतर सकी क्योंकि इस नयी गठित कमेटी में ज्यादातर चेहरे ऐसे थे जिनका यूपी की राजनीति में कोई खास योगदान नहीं रहा है। नयी कमेटी में शामिल सदस्यों की जानकारी मिलने के बाद से प्रदेश कांग्रेस के कई बडे़ नेता बगावत पर उतर आए थे। ऐन लोकसभा चुनाव के वक्त कांग्रेस हाई कमान नहीं चाहता था कि यूपीसीसी में बगावत का फायदा उसके विरोधी दलों को मिले, फिलहाल नयी कमेटी अभी तक अस्तित्व में नहीं आ पायी है।
प्रदेश संगठन मंत्री संजय दीक्षित मानते हैं कि पार्टी में कुछ लोग ऐसे हैं जो राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी को गलत तरीके से फीडबैक दे रहे हैं। यदि इसी तरह से चलता रहा और दागी नेताओं को पार्टी में शामिल किया जाता रहा तो निश्चित तौर पर आगामी लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को मुंह की खानी पडे़गी। श्री दीक्षित खुलकर कहते हैं कि मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष के नेतृत्व में कांग्रेस मृतप्राय स्थिति में है। यदि जल्द कोई हल न निकाला गया तो निश्चित तौर पर आगामी लोकसभा चुनाव भी कांग्रेस के हाथ से निकल जायेगा।
फिलहाल प्रदेश कांग्रेस नेताओं के दावों को मानें तो जल्द ही प्रभारी से लेकर अध्यक्ष पद तक में बदलाव किए जाने की प्रक्रिया शुरु हो जायेगी, संभावित अगले माह तक प्रदेश कांग्रेस का चेहरा बदला नजर आयेगा। ये नया चेहरा किसके नेतृत्व में अपनी छाप आगामी लोकसभा चुनाव में छोडे़गा? भ्रम की स्थिति अनवरत जारी है। चर्चा तो यहां तक कि हाई कमान की तरह से आया यह संदेश महज मृगतृष्णा मात्र है।
क्या कहते हैं पार्टी प्रवक्ता वीरेन्द्र मदान
उत्तर प्रदेश कांग्रेस के पार्टी प्रवक्ता वीरेन्द्र मदान का कहना है कि ‘ऐसा नहीं है कि यहां खामोशी छायी हुई है, प्रत्येक जनपद और बूथ स्तर पर गतिविधियां जारी हैं। आगामी लोकसभा चुनाव को लेकर तैयारियों को कोई कमी नहीं है। जहां तक पिछले चार-पांच माह से  कार्यकर्ताओं के साथ मीटिंग न किए जाने का आरोप है तो ये पूरी तरह से निराधार है। पिछले हफ्ते ही हमारे प्रदेश अध्यक्ष राज बब्बर यूपीसीसी आए थे। कार्यकर्ताओं के साथ मीटिंग भी हुई और चुनाव की तैयारियों को लेकर चर्चा भी। जहां तक नाराज कार्यकर्ताओं का सवाल है तो पार्टी मंे अनुशासन बनाए रखने के लिए पार्टी विरोधी गतिविधियों में लिप्त ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई जरूर होती रहेगी, जाहिर सी बात है कि ऐसे लोग पार्टी की छवि खराब करेंगे ही।’
प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ पार्टी प्रवक्ता वीरेन्द्र मदान के दावों के विपरीत सच्चाई यह है कि प्रदेश स्तर पर कांग्रेस में कोई भी ऐसा पुराना चेहरा नजर नहीं आता जिसमें यूपी कांग्रेस को पुनजीर्वित करने की दम-खम हो। यूपी कांग्रेस के पन्नों में पूर्व राज्यसभा सदस्य प्रमोद तिवारी ही एक ऐसा नाम जिन्हें वरिष्ठ कांग्रेसी कहा जा सकता है लेकिन हाई कमान ने इन्हें भी पार्टी में कोई पद नहीं दिया है लिहाजा पार्टी के प्रति इनकी वफादारी को संज्ञान में नहीं लिया जा सकता। इसके विपरीत बगावती नेताओं की संख्या में उत्तरोत्तर बढ़ोत्तरी हो रही है।
यूपी कांग्रेस की वेबसाईट भी यूपी कांग्रेस की हकीकत को बयां करने के लिए काफी है। वेबसाइट का ‘प्रेस विज्ञप्ति’ वाला खाली बाॅक्स इस बात का जीता-जागता प्रमाण है कि पिछले कुछ महीनों से यूपीसीसी में सन्नाटा पसरा हुआ है। लोकसभा चुनाव की तैयारियों को लेकर एक भी प्रेस विज्ञप्ति नजर नहीं आती। इतना ही नहीं ‘भविष्य के घटनाक्रम’ वाला खाली बाॅक्स भी कांग्रेस के कोमा में जाने की हकीकत को बयां कर रहा है। यह दीगर बात है कि यूपीसीसी में तैनात पार्टी प्रवक्ता पत्रकारों द्वारा पूछे गए सवालों का जवाब अपने मनमाफिक देकर पिंड छुड़ा रहे हैं जबकि यूपी कांग्रेस के वर्तमान और भविष्य का भान इन्हें भी है। गौरतलब है कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं में शुमार संजय दीक्षित पहले ही इस बात को स्पष्ट तौर पर कह चुके हैं कि यूपी कांग्रेस मृतप्राय हो चुकी है।

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