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पिछले कुछ वर्षों से केंद्र और राज्यों में कांग्रेस का जनाधार सिमटता जा रहा था, लेकिन अब हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनावों की जीत ने पार्टी को संजीवनी देने का काम किया है। इस जीत को लेकर राजनीतिक पंडितों का कहना है कि हिमाचल में मिली जीत का फायदा पार्टी को आगामी चुनावों में भी मिल सकता है

देश की सबसे पुरानी और सबसे ज्यादा समय तक राज करने वाली कांग्रेस के बहुत बुरे दिन चल रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों से केंद्र और राज्यों में उसका जनाधार सिमटता जा रहा था, वहीं अब हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनाव में मिली जीत ने पार्टी को संजीवनी देने का काम किया है। कांग्रेस की इस जीत को लेकर राजनीतिक पंडितों का कहना है कि हिमाचल में मिली जीत का असर आगामी चुनावों में भी देखने को मिलेगा। दरअसल हिमाचल प्रदेश में पिछले तीन दशक से हर बार सत्ता परिवर्तन का ट्रेंड रहा है। हिमाचल में पिछले तीन दशकों से कोई भी पार्टी अपनी सत्ता को बरकरार रखने में सफल नहीं हो पाई। हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022 के परिणाम में एक बार फिर यही पैटर्न देखने को मिला और भाजपा सत्ता में वापसी नहीं पाई है। जबकि प्रदेश में भाजपा की कमान राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने खुद संभाली थी और एंटी इन्कम्बेंसी के रिवाज को तोड़ने की ठानी थी लेकिन अपने गृह राज्य में नड्डा की सारी गणित यहां के लोगों के मूड के पैटर्न को नहीं बदल सकी।

गौरतलब है कि हिमाचल में एंटी इन्कंबेंसी का ट्रेंड रहा है। पहाड़ी राज्य में 1985 के बाद से अल्टरनेटिंग पार्टी को यहां की जनता ने वोट दिया है। हालांकि हिमाचल में हर विधानसभा चुनाव बीजेपी और कांग्रेस के बीच मुकाबला रहा है, 1985 के बाद से प्रत्येक पार्टी वैकल्पिक रूप से सत्ता में आ रही है। हिमाचल में लंबे समय से कांग्रेस का दबदबा रहा है, लेकिन आपातकाल के बाद से सियासी हालत बदल गए हैं। प्रदेश में 1952 से लेकर 1977 तक कांग्रेस का राज रहा है। यशवंत सिंह परमार और रामलाल ठाकुर कांग्रेस सरकार में मुख्यमंत्री बनते रहे। हिमाचल में नए युग की शुरुआत आपातकाल के बाद शुरू हुई, जब 1977 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को सत्ता से बेदखल होना पड़ा था और जनता पार्टी की सरकार बनी थी। जनता पार्टी की सरकार में शांता कुमार मुख्यमंत्री बने थे। इस तरह से प्रदेश में पहली बार गैर-कांग्रेस सरकार बनी थी। फिर कांग्रेस ने आपातकाल के बाद 1980 में सत्ता में वापसी की थी। 1985 में दोबारा सत्ता में काबिज हुई, लेकिन इसके बाद से ही प्रदेश में सत्ता परिवर्तन का ट्रेंड शुरू हो गया।

हिमाचल प्रदेश में साल 1990 के विधानसभा चुनाव हुए तो भाजपा 46 सीटें जीतकर सत्ता में आई, लेकिन अयोध्या में बाबरी विध्वंस के बाद साल 1992 में सरकार बर्खास्त कर दी गई थी। ऐसे में साल 1993 में विधानसभा चुनाव हुए तो कांग्रेस वापसी करने में कामयाब रही और वीरभद्र सिंह मुख्यमंत्री थे। 5 साल के बाद 1998 में विधानसभा चुनाव हुए भाजपा ने कांग्रेस को मात देकर सत्ता में वापसी की और प्रेम कुमार धूमल मुख्यमंत्री बने थे। हिमाचल में कांग्रेस और भाजपा के बीच ही नहीं बल्कि वीरभद्र सिंह और प्रेम कुमार धूमल के इर्द-गिर्द भी सत्ता घूमती रही थी। साल 2003 में विधानसभा चुनाव हुए, कांग्रेस ने भाजपा को मात देकर फिर से सत्ता में वापसी की और वीरभद्र सिंह मुख्यमंत्री बने थे। इस चुनाव में कांग्रेस 43 सीटें जीती तो भाजपा 16 सीटों पर सिमट गई थी। इसके बाद साल 2007 में विधानसभा चुनाव हुए तो भाजपा को 41 और कांग्रेस को 23 सीटें मिलीं थी। इस तरह भाजपा सरकार बनाने में कामयाब रही थी। पांच साल के बाद 2012 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस वापसी करने में कामयाब रही थी।

विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 36 और भाजपा को 26 सीटें मिली थी। कांग्रेस से वीरभद्र सिंह मुख्यमंत्री बने और पांच साल के बाद चुनाव हुए तो अपनी कुर्सी नहीं बचा पाए थे। 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को करारी मात खानी पड़ी और भाजपा सत्ता में वापसी करने में कामयाब रही थी। धूमल चुनाव हार गए थे, जिसके बाद भाजपा ने जयराम ठाकुर के सिर सत्ता का ताज सजाया था। अब फिर से कांग्रेस ने वापसी की है, जिसमें कांग्रेस ने 39 सीटें जीतकर बहुमत का आकड़ा हासिल किया है।

 

बागियों ने बिगाड़ा भाजपा का खेल
हिमाचल प्रदेश में हर पांच साल पर सत्ता परिवर्तन का ट्रेंड रहा है, लेकिन इसके बावजूद भाजपा का खेल बागी नेताओं ने बिगाड़ा है। भाजपा के 21 नेताओं ने बगावत का झंडा उठाकर चुनावी ताल ठोकी थी। इसी के चलते भाजपा के कई सीटों पर सियासी समीकरण गड़बड़ा गए हैं। हालांकि जेपी नड्डा से लेकर जयराम ठाकुर तक भाजपा के बागी नेताओं को समझाने की कवायद कर चुके हैं, लेकिन बात नहीं बन पाई थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांगड़ा जिले की फतेहपुर विधानसभा सीट से निर्दलीय चुनाव लड़ रहे कृपाल परमार को फोन करके समझाने की कोशिश की थी। इस बातचीत का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया था, जिसमें निर्दलीय चुनाव लड़ रहे भाजपा के बागी नेता कृपाल परमार को बैठ जाने की गुजारिश पीएम मोदी कर रहे थे। इस बात से समझा जा सकता है कि भाजपा के लिए बागी नेता कितनी बड़ी मुश्किल खड़ी कर दी है, जिसके वजह से हार का सामना करना पड़ा है। क्योंकि हिमाचल बहुत छोटा राज्य है, जहां पर जीत हार में बहुत ज्यादा वोटों का अंतर नहीं होता है।

ओपीएस ने छीनी भाजपा से सत्ता
हिमाचल प्रदेश के चुनाव में भाजपा के गले की फांस पुरानी पेंशन स्कीम भी बना था, जिसके वजह से हार का सामना करना पड़ा है। वहीं कांग्रेस ने वायदा किया था कि अगर राज्य में उनकी सरकार बनती है तो फिर कर्मचारियों के लिए ओल्ड पेंशन स्कीम को लागू किया जाएगा। कांग्रेस के नेता लोगों को विश्वास दिलाने के लिए छत्तीसगढ़ और राजस्थान में वायदा पूरा करने का हवाला दिए थे, जहां पर पुरानी पेंशन को लागू किया जा चुका है। हिमाचल में बड़ी संख्या में रिटायर्ड सरकारी कर्मचारी हैं और मौजूदा कर्मचारी भी ओल्ड पेंशन स्कीम की मांग को लेकर अड़े हुए थे, जो भाजपा के लिए चुनाव में चिंता का सबब बन गया है।

कांग्रेस की चुनौती
हिमाचल प्रदेश में भले ही कांग्रेस सत्ता में लौट आई है, लेकिन उसको यह सत्ता अपनी मेहनत के बदौलत नहीं मिली है। पिछले तीन दशक से प्रदेश की सत्ता में जो परिवर्तन ट्रेंड रहा है, यह जीत उसी का नतीजा है। गुजरात विधानसभा चुनाव और दिल्ली नगर निगम चुनाव में कांग्रेस को जो झटका लगा है वह कांग्रेस के लिए चिंता की बात है कि उसकी राजनीतिक जमीन धीरे-धीरे आम आदमी पार्टी कब्जा कर रही है। भाजपा के सामने कांग्रेस का विकल्प आम आदमी पार्टी बन रही है। दिल्ली नगर निगम में कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा है तो गुजरात में शिकस्त खानी पड़ रही है। दिल्ली में कांग्रेस के वोट बैंक को आम आदमी पार्टी अपने नाम करती जा रही है। दिल्ली में भाजपा का अपना 35 फीसदी वोट उसके साथ है, लेकिन कांग्रेस का वोट आप आदमी पार्टी में पूरी तरह से शिफ्ट हो गया है। साल 2013 में आदमी पार्टी बनी और दिल्ली की सत्ता से कांग्रेस विदा हो गई। इसके बाद से लगातार कांग्रेस का सियासी आधार सिमटता जा रहा है। हालत यह है कि दिल्ली में कांग्रेस का पिछले दो विधानसभा चुनावों में एक भी विधायक नहीं जीत पाया। वहीं गुजरात में पहली बार उतरी आम आदमी पार्टी कांग्रेस के वोट बैंक में सेंधमारी कर अपनी दमदार मौजूदगी दर्ज कराने में सफल होती दिखी है।

आप को गुजरात में अच्छा- खासा वोट मिलने का अनुमान है, जबकि कांग्रेस को पिछले चुनाव से काफी कम वोट मिले हैं। ऐसे में राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि आने वाले समय में आम आदमी पार्टी तीसरी ताकत के तौर पर उभरती नजर आ रही है, जो कांग्रेस के लिए चिंता का विषय है। आंकड़ों के मुताबिक, एससी, एसटी, ओबीसी, ठाकोर, कोली, सवर्ण और मुसलमान सभी जातियों के वोटों में ‘आप’ ने सेंधमारी की है। गुजरात में इन समुदायों को कांग्रेस का कोर वोट बैंक माना जाता है। इससे एक बात साफ है कि गुजरात में कांग्रेस का विकल्प बनकर आम आदमी पार्टी उभरी है। गुजरात विधानसभा चुनाव में ट्रायंगल फाइट होने का फायदा भाजपा को मिला है, क्योंकि सत्ता विरोधी वोट एक जगह जाने के बजाय आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच बट गया। दिल्ली नगर निगम चुनाव में भाजपा और ‘आप’ की सीधी लड़ाई में कांग्रेस का वोटर भी केजरीवाल खेमे में शिफ्ट हो गया। इस तरह से एक के बाद एक राज्य में कांग्रेस की सियासी जमीन पर आम आदमी पार्टी अपने राजनीतिक फसल उगा रही है। पंजाब में भी इसी तर्ज पर आम आदमी पार्टी ने अपनी जगह बनाई थी।

 

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