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हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव को लेकर सियासत गरमाने लगी है। इस बीच सुखराम के वंशजों का असमंजस अब दूर हो गया है और उनके पोते हिमाचल कांग्रेस के महासचिव आश्रय शर्मा ने पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया है। लेकिन इस असमंजस से निकलने में आश्रय शर्मा और उनके पिता अनिल शर्मा को करीब साढ़े तीन साल लगे। आश्रय के इस कदम से सुखराम परिवार एवं उनके समर्थकों का संशय भी दूर होने के साथ ही यह साफ हो गया है कि वीरभद्र बनाम सुखराम वाली परंपरा अगली पीढ़ी तक उतर आई है।

गौरतलब है कि आश्रय शर्मा कांग्रेस और उनके पिता अनिल शर्मा सदर से भाजपा के विधायक थे। 2019 के लोकसभा चुनाव में पोते के लिए टिकट की इच्छा ने सुखराम के परिवार को दोबारा भाजपा-कांग्रेस में बांट दिया था। उन्होंने पोते आश्रय के साथ कांग्रेस में वापसी कर ली थी। अनिल शर्मा भाजपा में रहते हुए भी भाजपा के साथ नहीं थे। इस कारण उनका मंत्रिपद भी चला गया था। अलग-अलग दलों में होने के चलते पिता-पुत्र को राजनीतिक गाड़ी आगे बढ़ाने में दिक्कत आ रही थी।

मंडी जिले के सदर हलके से सुखराम ने वर्ष 1962 में राजनीतिक सफर की शुरुआत की थी। पहली बार निर्दलीय चुनाव लड़ विधानसभा में पहुंचे थे। फिर कांग्रेस का दामन थामा था। 1983 तक सदर हलके का लगातार प्रतिनिधित्व किया। डॉ वाईएस परमार और रामलाल ठाकुर ने मंत्रिमंडल में विभिन्न पदों पर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया था। सुखराम ने विधानसभा एवं लोकसभा के कुल 14 चुनाव लड़े थे। 1989 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के महेश्वर सिंह से पराजित हुए थे।

वर्ष 1983 में वीरभद्र सिंह केंद्र से प्रदेश की राजनीति में लौटे थे। सुखराम को केंद्र की राजनीति में उनकी इच्छा के बिना भेजा गया था। यहीं से वीरभद्र सिंह व सुखराम के बीच रिश्तों में खटास आ गई थी। दोनों तरफ से कई बार एक-दूसरे को गले लगाने के प्रयास हुए, लेकिन दिल कभी नहीं मिल पाए। वीरभद्र सिंह और सुखराम आज इस दुनिया में नहीं हैं। दोनों परिवारों के बीच 39 साल बाद भी खटास बरकरार है। केंद्र की राजनीति में जाने के बाद सुखराम का सितारा राजीव गांधी व पीवी नरसिम्हा राव सरकार में चमका। रक्षा व दूरसंचार राज्य मंत्री बने। संचार क्रांति से देश भर में नाम कमाया था। 1996 में सीबीआई की दबिश में घर में करोड़ों की नकदी मिलने से संचार क्रांति के तमगे की चमक फीकी पड़ गई थी।

पंडित सुखराम ने हिमाचल विकास कांग्रेस (हिविकां) के नाम से अपनी पार्टी बनाई। 1998 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को पांच सीटें मिली। उस समय भाजपा व कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था। सत्ता की चाबी सुखराम के हाथ आ गई थी। तब उन्होंने वीरभद्र को समर्थन देने के बजाय भाजपा से हाथ मिला लिया था। 2002 के विधानसभा चुनाव में हिविकां को लोगों का समर्थन नहीं मिल पाया था। दोबारा कांग्रेस में वापसी हो गई थी। सुखराम के बेटे अनिल शर्मा ने 1993 से अपना राजनीतिक सफर शुरू किया था। चौथी बार सदर हलके का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। सुखराम परिवार के भाजपा में जाने की मुख्य वजह भी वीरभद्र सिंह रहे हैं। यह परिवार अक्सर उन पर अपमानित करने का आरोप लगाता रहता था। पिता पुत्र का यह निर्णय कसौटी पर कितना खरा उतरेगा, चुनाव नतीजे के बाद इस बात का पता चलेगा।

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