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चिंतित कांग्रेस का चिंतन शिविर

देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी कही जाने वाली कांग्रेस जब-जब चुनावी हार से निराश होती है और अपनी टीम में जोश की कमी महसूस करती है तो चिंतन शिविर का आयोजन करती है। लगातार मिल रही हार से हताश पार्टी का अगला चिंतन शिविर राजस्थान के उदयपुर में 13 से 15 मई तक होने जा रहा है। जिसमें वर्किंग कमेटी के सदस्य, सांसद, राज्यों के प्रभारी और महासचिव, सभी राज्यों के प्रदेश अध्यक्ष, विधायक दल के नेता और वरिष्ठ नेता मौजूद रहेंगे। इस शिविर में करीब 400 नेता शामिल होंगे। राजनीति में दिनों-दिन गिरते ग्राफ पर चिंतित कांग्रेस इस समय पॉलिटिकल एनर्जी के साथ ही भाजपा की काट का नया हथियार तलाशने में जुटी है

कांग्रेस में चिंतन शिविरों की परंपरा पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कार्यकाल में शुरू हुई थी। तब समाजवादी नेता के तौर पर चर्चित रहे जयप्रकाश नारायण के बढ़ते प्रभाव चलते कांग्रेस में इस तरह के चिंतन की जरूरत महसूस हुई थी। उस समय पार्टी ने तय किया कि तीन दिवसीय शिविर में पार्टी की चुनौतियों पर चर्चा होनी चाहिए। वर्ष 1974 में 22 से 24 नवंबर तक पार्टी का चिंतन यूपी के बुलंदशहर जिले के नरौरा में हुआ था। इंदिरा गांधी ने इस शिविर की जिम्मेदारी उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा को दी थी। हालांकि तब इसे चिंतन शिविर का नाम ना देकर पार्टी की महत्वपूर्ण बैठक कहा गया था। इसके बाद 1998 में पंचमढ़ी तो 2003 में शिमला और 2013 में जयपुर में चिंतन शिविर लग चुके हैं। ये तीनों ही चिंतन शिविर सोनिया गांधी के अध्यक्ष रहते आयोजित हुए हैं। लेकिन इन चिंतन शिविरों से भी पार्टी की स्थिति में कोई खास इजाफा नहीं हो सका है। अब एक बार फिर पार्टी में चिंतन शिविर की जरूरत महसूस की जा रही है।

खासकर तब से जब पिछले दिनों पार्टी पांच राज्यों में चुनाव हारी है। हाल ही में राहुल गांधी ने पांच राज्यों में हार स्वीकार करने के साथ ही हार से सीख लेने की बात कही है। राहुल गांधी लोकसभा और विधानसभा में हार मिलने के बाद पिछले 9 सालों में 11वीं बार ऐसी सीख लेने की बात कह चुके हैं। हालांकि हार की समीक्षा के लिए हर बार कमेटी बनती है। 1999 और 2014 की हार की समीक्षा के लिए पार्टी ने वरिष्ठ नेता एके एंटनी की अध्यक्षता में कमेटी बनाई थी। दोनों बार एंटनी ने अपनी रिपोर्ट हाईकमान को सौंपी जरूर लेकिन उस पर अमल कुछ नहीं हुआ। एंटनी ने अपनी रिपोर्ट में 2014 के चुनाव के बाद सिफारिश की थी कि संगठन में बड़े पैमाने पर फेरबदल किए जाने की आवश्यकता है। लेकिन कांग्रेस में आज तक इस रिपोर्ट पर अमल नहीं हुआ।

फिलहाल, कांग्रेस ने राजस्थान में चिंतन शिविर के दौरान पेपर तैयार करने और चर्चा का नेतृत्व करने के लिए 6 समन्वय पैनल का गठन किया है। जिसमें गुलाम नबी आजाद, शशि थरूर, मनीष तिवारी, आनंद शर्मा जैसे जी-23 गुट के नेताओं को भी शामिल कर निष्पक्षता बरतने का संदेश दिया गया है। इसमें आर्थिक मामलों की कमेटी का प्रमुख पी चिदंबरम को बनाया गया है। आनंद शर्मा, सचिन पायलट सहित कुल 9 नेताओं शामिल किया गया है। सामाजिक न्याय से जुड़े मुद्दे पर बनी कमेटी का नेतृत्व सलमान खुर्शीद करेंगे। इसी तरह संगठन को लेकर बनी कमेटी का मुखिया मुकुल वासनिक को तो किसानों के मुद्दे पर भूपेंद्र सिंह हुड्डा को जिम्मेदारी सौपी गई है। युवाओं के मामले पर बनी कमेटी की कमान राजा वडिंग को दी गई है। यह सभी अपने-अपने विचार प्रस्तुत करेंगे। उसके बाद उनके मुख्य अंश चिंतन शिविर में रखे जाएंगे।

इस शिविर में नेताओं और कार्यकर्ताओं से हार के कारण जानने की कोशिश की जाएगी। इस वर्ष गुजरात, हिमाचल प्रदेश के साथ ही अगले साल होने वाले कर्नाटक, राजस्थान, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश जैसे राज्यों के विधानसभा चुनावों को लेकर भी इस चिंतन शिविर में रणनीति बनाएगी। 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के मुकाबले से लिए हो सकता है कि गठबंधन की नई सियासत शुरू करने पर भी चर्चा हो। चर्चा यह भी है कि कुछ नेताओं की ओर से कार्यक्रम के दौरान नई रणनीति बनाने के साथ ही राहुल गांधी की अध्यक्ष के तौर पर फिर से ताजपोशी की तैयारी भी हो रही है। इनमें सबसे आगे राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का नाम शामिल है। 9 साल पहले हुए चिंतन शिविर में ही राहुल गांधी को पार्टी अध्यक्ष बनाने की घोषणा की गई थी। संयोग है कि तब भी राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ही थे। इस बार प्रशांत किशोर के बताए प्लान के अनुसार गैर गांधी परिवार के नेता को पार्टी उपाध्यक्ष बनाए जाने की भी बात उठ सकती है। इसमें भी अशोक गहलोत का नाम पहले नंबर पर है। गहलोत को अगर अध्यक्ष बनाया गया तो फिर सचिन पायलट को राजस्थान की कमान सौपी जा सकती है। जबकि गहलोत ऐसा नहीं चाहते हैं। वे चाहते हैं कि किसी तरह पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी को बना दिया जाए और राजस्थान की सत्ता उनके हाथों में रहे।

जब 2013 में भी राजस्थान के जयपुर को चिंतन शिविर के लिए चुना गया था और इस बार भी राजस्थान का उदयपुर तय हुआ तो ऐसा क्यों? इसके पीछे कांग्रेस से जुड़े लोगों का मानना हैं कि दो कारणों से चिंतन शिविर के लिए मेवाड़ को चुना गया है। उनका कहना है कि जिस तरह दिल्ली की सत्ता तक पहुंचने के लिए उत्तर प्रदेश महत्वपूर्ण है, ठीक उसी तरह राजस्थान की गद्दी पर बैठने के लिए मेवाड़ को फतह करना जरूरी है। राजनीतिक पंडितों के अनुसार मेवाड़ में जो पार्टी सबसे ज्यादा सीट जीतती है, उसी की सरकार राजस्थान में बनती है। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की पहली चाहत भी मेवाड़ फतह करने की हैं। दूसरा कारण ये है कि यह इलाका गुजरात से लगा हुआ है। आगामी दिसंबर में गुजरात के विधानसभा चुनाव हैं। कहा जा रहा है कि कांग्रेस के इस चिंतन शिविर में गुजरात में 27 साल पुराने भाजपा के किले को भेदने की रणनीति भी तैयार की जाएगी। इस तरह चिंतन शिविर का मेवाड़ के उदयपुर में लगना राजस्थान के साथ-साथ गुजरात के आगामी चुनावों की रणनीति के तहत भी सही माना जा रहा है।

फिलहाल, कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी समस्या अपने गिरते जनाधार को रोकने की है। 2014 में जब नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बने थे, उस दौरान कांग्रेस की देश के एक दर्जन से अधिक प्रदेशों में सरकार चल रही थी। मौजूदा समय की बात करे तो देश में सिर्फ दो राज्यों राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार हैं। जबकि महाराष्ट्र और झारखंड में कांग्रेस सत्तासीन गठबंधन में सहयोगी दल के तौर पर है। साल के शुरुआत में पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस कुछ खास नहीं कर पाई। पंजाब में जहां चुनाव से पहले कांग्रेस की सरकार चल रही थी वहां भी वह चुनाव हार कर एक चौथाई सीटों पर ही सिमट गई। पंजाब में पार्टी अपने ही वरिष्ठ नेताओं की कलह का शिकार हो गई। चुनाव से ठीक पहले मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह को पद से हटाकर नेतृत्व परिवर्तन करना पार्टी को भारी पड़ गया। कैप्टन के स्थान पर मुख्यमंत्री बनाए गए चरणजीत सिंह चन्नी दोनों विधानसभा सीटों से हार गए। जबकि पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू भी अमृतसर पूर्व विधानसभा सीट से चुनाव हार गए। पंजाब में पार्टी के ज्यादातर बड़े नेता चुनाव नहीं जीत पाए। चुनाव के बाद पार्टी ने बेशक विधायक दल का नेता और प्रदेश अध्यक्ष पद पर नए लोगों को नियुक्त कर दिया है। इसके बावजूद भी पार्टी में खींचतान पूर्व की भांति ही जारी है।

पार्टी के पांच राज्यों में चुनावी हार के बाद वहां के प्रदेश अध्यक्ष व विधायक दल के नेता को तो बदल दिया गया है लेकिन चुनाव के दौरान वहां प्रदेश प्रभारी रहे नेता आज भी अपने पदों पर पहले की तरह ही बरकरार हैं। पार्टी के प्रदेश प्रभारी पद पर ज्यादातर ऐसे नेताओं को नियुक्त किया गया है जिनका अपना कोई जनाधार नहीं रहा है। इतना ही नहीं बल्कि वह बड़े अंतर से चुनाव भी हार चुके हैं। जनता में उनकी नकारात्मक छवि है। जबकि पार्टी द्वारा ऐसे प्रदेश प्रभारियों पर नकेल डाला जाना जरूरी था। लेकिन सवाल यह है कि उन पर कोई कार्रवाई करने के बजाय उनको बदला तक नहीं गया। उत्तराखण्ड राज्य इसका सबसे बड़ा उदहारण है। वहां के कई वरिष्ठ नेताओं के द्वारा खुलेआम पार्टी की करारी हार के पीछे प्रदेश प्रभारी रहे देवेंद्र यादव को पूरी तरह जिम्मेदार ठहराया जा चुका है। बावजूद इसके यादव को प्रभारी पद पर बिठाए रखने से पार्टी की छिछलेदार जारी है। पार्टी में गुटबाजी इस कदर हावी है कि उत्तराखण्ड में मुख्यमंत्री के प्रबल दावेदार हरीश रावत चुनाव हार गए। वहां कांग्रेस मात्र 19 सीटें ही जीत सकी है। उत्तराखण्ड में नए प्रदेश अध्यक्ष और विधायक दल के नेता की नियुक्ति के बाद तो आपसी कलह खुलकर सड़कों पर आ गई है। हालत यह हो गई है कि कई विधायकों ने पार्टी छोडने तक की धमकी तक दे डाली। कांग्रेस को सबसे अधिक आस उत्तराखण्ड में ही सरकार बनाने की थी। लेकिन सारे कयास धरे के धरे रह गए और उत्तराखण्ड में भाजपा ने लगातार दूसरी बार सरकार बनाकर इतिहास रच डाला है। इसी तरह गत विधानसभा चुनावों में गोवा और मणिपुर में भी कांग्रेस कुछ खास नहीं कर पाई। गोवा में कांग्रेस को 11 सीटें मिली, जबकि मणिपुर में तो कांग्रेस की सीटों की संख्या 28 से घटकर 5 रह गई है।

कांग्रेस की सबसे बुरी गत तो उत्तर प्रदेश जैसे देश के सबसे बड़े राज्य में हुई। 2017 में जहां कांग्रेस के पास 7 विधानसभा सीटें थी वहां कांग्रेस महज 2 सीटों तक ही सिमट गई। कांग्रेस में तीसरे नंबर की नेता कही जाने वाली प्रियंका गांधी ने राजनीति में सक्रिय होने के बाद अपना पूरा ध्यान उत्तर प्रदेश पर फोकस किया हुआ था। पहले उनके साथ महासचिव के रूप में ज्योतिरादित्य सिंधिया उत्तर प्रदेश के पश्चिमी उत्तर प्रदेश के प्रभारी थे। लेकिन सिंधिया के पार्टी छोड़ने के बाद उत्तर प्रदेश का जिम्मा प्रियंका गांधी के कंधों पर था। पिछले 3 साल से प्रियंका उत्तर प्रदेश के गांव-गांव में जाकर लोगों से मिल रही थी। प्रियंका गांधी की सक्रियता के चलते पार्टी को उम्मीद थी कि इस बार के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस बेहतर स्थिति में रहेगी। लेकिन जब चुनावी नतीजे आए तो प्रियंका ने पार्टी की आशाओं को धराशायी कर दिया। 397 सीटों पर चुनाव लड़ कर महज 2 सीटें जीतना पार्टी के लिए किसी सदमे से कम नहीं है। यही नहीं बल्कि पार्टी का वोट प्रतिशत भी घटकर 2 .33 प्रतिशत रह गया है। यहां यह भी बताना जरूरी है कि प्रियंका के नेतृत्व में ही कांग्रेस ने 2019 का लोकसभा चुनाव लड़ा था जिसमें राहुल गांधी अपनी परंपरागत सीट अमेठी भी गवां बैठे थे। इस सीट से राहुल गांधी भाजपा की स्मृति ईरानी से चुनाव हार गए थे। अब उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के पास एक रायबरेली की लोकसभा सीट और मात्र दो विधानसभा सीटें ही रह गई हैं।

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